दिलदार शायर कैफी आजमीः दबा-दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं

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जयंती पर विशेष नवीन शर्मा झुकी-झुकी सी नज़र बेकरार है कि नहीं/ दबा-दबा सा सही, दिल में प्यार है कि नहीं...इस लाजवाब ऑलटाइम फेवरेट रोमांटिक...
रवींद्र नाथ टैगोर

शक्ति चाहे किसी भी रूप में हो विवेकहीन होती हैः रवींद्रनाथ ठाकुर

शक्ति चाहे किसी भी रूप में हो विवेकहीन होती है। कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने 12 अप्रैल 1919 को महात्मा गांधी को लिखे पत्र में...

रेवती नक्षत्र में शरद पूर्णिमा बुधवार को, लक्ष्मी पूजें, धन पाएं

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आश्विन माह के पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन से शरद ऋतु  का आरंभ भी माना गया है।...
कोरोना की पहुंच पेट के बाहर तक ही नहीं रही, पैठ अंदर तक हो गई है। कोरोना साथ लिए आ रहे हैं शिशु। ऐसे में सहज सवाल- कौन है कोरोना से सुरक्षित? पढ़िए, कोरोना डायरी की इक्कीसवीं किस्त वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष मानव की कलम से।

कोरोना संक्रमण शहरों से बढ़ा अब गांवों की ओर……

डॉ. संतोष मानव कोरोना संक्रमण शहरों से अगर गांवों तक पहुंच गया, तो क्या होगा? हाहाकार और क्या? इस हाहाकार के लक्ष्ण दिखने भी...
एक झोपड़ी में आग सेंकती देवघर की डीसी नैंसी सहाय की मां

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर एक यात्रा प्रसंग और 4 महिला पात्र

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर यह निजी यह यात्रा प्रसंग बरबस याद आ गया। इसलिए कि इस कहानी में चार महिला पात्रों का जिक्र है।...
25 जून भारतीय राजनीति में एक उल्लेखनीय तारीख है। इसी रोज 1975 में, तत्कालीन इंदिरा सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी। दरअसल वह आपातकाल नहीं, आतंककाल था।

इंदिरा गांधी का चुनाव भ्रष्ट तरीके के आरोप में आज ही रद हुआ था

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इंदिरा गांधी का चुनाव भ्रष्ट तरीके अपनाने के आरोप में 12 जून, 1975 को रद हुआ था। यही जजमेंट इमरजेंसी का कारण बना। इसलिए...
गांधीजी ने बकरे की बलि रोकने पर लोगों को विवश कर धर्म की शिक्षा दी थी। चंपारण सत्याग्रह के दिनों की बात है। गांधीजी वहीं एक गांव में रुके हुए थे।

गांधीजी ने जब बकरे की बलि रोकने पर लोगों को विवश कर दिया

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निराला गांधीजी ने बकरे की बलि रोकने पर लोगों को विवश कर धर्म की शिक्षा दी थी। चंपारण सत्याग्रह के दिनों की बात है।...

जयंती पर विशेष- हीरो से भी ज्यादा पैसे लेते थे खलनायक प्राण 

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नवीन शर्मा हिंदी सिनेमा के सौ साल से लंबे इतिहास में वैसे तो दर्जनों खलनायक हुए हैं। उनमें से प्राण एक खास स्थान रखते...
मलिकाइन के पाती

अपने ही घर में बेगाने हो जाने की मजबूरी का नाम है घुसपैठ

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सुरेंद्र किशोर सन 1979-1985 के असम आंदोलन के दौरान 855 आंदोलनकारियों की जानें गयी थीं। इतनी कुर्बानियां देने के बाद  1985 में प्रधानमंत्री राजीव...

मलिकाइन के पाती- कोउ नृप होई हमें का हानी, चेरी छोड़ ना होखब रानी

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पांव लागीं ए मलिकार। कबहूं रउरा के पाती टाइम पर नइखीं पठा पावत। कई बेर त लिखनीहार खोजे के परत बा आ कबो कवनो...