रामायण और महाभारत की रचना की पृष्ठभूमि कैसे बनी

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रामायण और महाभारत की रचना की पृष्ठबूमि कैसे बनी, इन्हें लिखने का प्रस्ताव किसने दिया, किन लोगों ने इसका रचना की, इस पर शोधपरक अंदाज में प्रकाश डाला है अशोक त्रिपाठी ने।
रामायण और महाभारत की रचना की पृष्ठबूमि कैसे बनी, इन्हें लिखने का प्रस्ताव किसने दिया, किन लोगों ने इसका रचना की, इस पर शोधपरक अंदाज में प्रकाश डाला है अशोक त्रिपाठी ने।

रामायण और महाभारत की रचना की पृष्ठबूमि कैसे बनी, इन्हें लिखने का प्रस्ताव किसने दिया, किन लोगों ने इसका रचना की, इस पर शोधपरक अंदाज में प्रकाश डाला है अशोक त्रिपाठी ने। आप भी पढ़ें

साहित्य का विद्यार्थी होने के कारण जब मैंने रामायण और महाभारत  का अध्ययन किया तो ऐसा महसूस हुआ कि रामायण को भारत वर्ष की जनता ने जितना गर्व, अहंकार और आदर के साथ स्वीकार किया, महाभारत उतना गौरवान्वित एवं आदरणीय नहीं हो सका। क्या यह महाभारत या उसके रचनाकार महर्षि व्यास के साथ अन्याय तो नहीं?  हम यह भी जानते हैं कि प्रत्येक देश का नागरिक अपने-अपने देश के महापुरुषों या अन्य किसी को भी अपना आदर्श मानता है या मान सकता है।

भारत वर्ष में भी पितृ भक्ति तथा मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में राम, भ्रातृ प्रेम में भरत, सेवक तथा संकट मोचक के रूप में हनुमान की उपमा दी जाती है। इन्हें बहुसंख्यक भारतीय अपना आदर्श मानने का तथा कथित ढोंग भी रचाते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि हम महाभारत के किसी चरित्र यानी भीष्म, द्रोण, विदुर, युधिष्ठिर, कर्ण, भीम, अर्जुन कोई भी हमारे आदर्श नहीं हैं। यहां तक कि श्री कृष्ण के बारे में भी पुराणों की कथा सुनाने वाले शुकदेव जी भी लोगों को सावधान करते हुए कहते हैं कि कृष्ण को कोई भी अपना आदर्श मानकर उनका अनुसरण न करे। इससे भला होना तो दूर, विपत्ति बढ़ेगी। “ने तद समाच रेज्जातु, मनसापि ह्य नीश्वरः।”

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विद्वानों का एक वर्ग इसके लिए महाभारत के चरित्रों का बड़ा ही जटिल होना बताया है। उस महाकाव्य का हर चरित्र अपनी जटिलता के कारण ही भारतीय गृहस्थ-जीवन में अपने आपको स्थापित करने में सफल नहीं हो सका। क्या यह सत्य है?

विद्वानों का एक वर्ग “महाभारत” के पात्रों को भारतीय गृहस्थ जीवन के अनुकूल नहीं मानता। और यही कारण है कि उसके पात्र भारतीय जनमानस में वो स्थान नहीं पा सके, जो रामायण के पात्रों को प्राप्त हुआ। महाभारत के जितने भी पात्र हैं, वे जटिल हैं। विद्वानों का यह वर्ग आखिर ऐसा क्यों मानता है? इसके लिए आरम्भ से विवेचन समीचीन होगा।

कहा जाता है कि रामायण और महाभारत को काव्य रूप में सृजन करने की योजना परमपिता ब्रह्मा की थी। इसके लिए उन्होंने तत्कालीन दो महर्षियों का चयन किया। एक थे महर्षि बाल्मीकि, जिनको उन्होंने “रामायण” महाकाव्य की रचना के लिए प्रेरित किया और महर्षि मान भी गए। परमपिता ने महर्षि बाल्मीकि को यह सुझाव दिया कि मानवलोक के श्रेष्ठ पुरुष “श्रीराम” के जीवनचरित पर एक ऐसी रचना का सृजन हो, जो युग-युगों तक मानव-मन में बस जाए। महर्षि बाल्मीकि ब्रह्मा जी के सुझाव को आदेश मानकर “रामायण” की रचना में तल्लीन हो गए। यही (एक महाकाव्य लिखने का) प्रस्ताव परमपिता ने महर्षि व्यास को भी दिया, लेकिन महर्षि व्यास ने यह कहते हुए उन्हें निरुत्तर कर दिया कि उन्होंने (व्यास ने) एक महाकाव्य लिखने की योजना पहले ही बना ली है :  “कृतं मये दंग भगवन, काव्यं परम पूजितं।”

परमपिता ब्रह्मा के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने सोचा कि मैंने तो महर्षि बाल्मीकि से “राम” के जीवन-चरित को आधार बनाकर रामायण लिखने का सुझाव दिया था। अब भला महर्षि व्यास ने किस महाकाव्य को लिखने का मन बना लिया है? इस महाकाव्य का नायक कौन होगा, नायिका कौन होगी, खलनायक कौन होगा? और बाकी पात्र कैसे होंगे? कहानी की गति कैसी होगी? इस तरह के कई प्रश्न परमपिता ब्रह्मा के मन में उठने लगे। महर्षि व्यास ने उनकी शंका का समाधान करते हुए कहानी का सारांश बता दिया। साथ ही, उन्होंने उनको आश्वस्त करते हुए कहा कि कि उन्होंने जिस कथानक को अपने महाकाव्य के लिए चयन किया है, उसके  काफी घटनाओं को उन्होंने खुद देखा है और उन घटनाओं से उनका आत्मिक संपर्क है। इसलिए उन्हें दिक्कत नहीं होगी। उन्होंने ब्रह्मा जी को यह भी बताया कि इस  महाकाव्य में उन्होंने इतिहास, भूगोल चिकित्सा-प्रणाली, न्यायशास्त्र से लेकर लोक-शिक्षा, नृतत्व और यहां तक कि युद्ध विज्ञान को भी स्थान दिया है। लेकिन इस महान ग्रन्थ को लिखने के लिए उनके पास योग्य लेखक नहीं हैं। उन्होंने ब्रह्मा जी को यह भी बताया कि यह ग्रन्थ सम्पूर्ण हो जाने के उपरांत सिर्फ महान ही नहीं, बल्कि भारी भी होगा- “महत्वाद भारव त्वा च्य, महाभारत मुच्यते।”

(अब क्या होगा? क्या परमपिता ब्रह्मा उन्हें दे पाएंगे योग्य लेखक? कौन होगा महान ग्रन्थ महाभारत का लेखक, यह अगले अंक में)

 

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