बलिया में वीरेंद्र सिंह मस्त की अभी से दिखने लगी है मस्ती

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बलिया के BJP प्रत्याशी वीरेंद्र सिंंह मस्त
बलिया के BJP प्रत्याशी वीरेंद्र सिंंह मस्त

बलिया। बलिया में वीरेंद्र सिंह मस्त की मस्ती अभी से दिखने लगी है। जैसा मैंने जाना-देखा और समझा, पगड़ीवाले वीरेंद्र सिंह मस्त को। जैसी पड़ताल की उनके अंदाज की। उससे यही साबित हो रहा है कि क्षेत्र बदलने के बावजूद वीरेंद्र सिंह की मस्ती में कोई कमी नही आई है। वह बलिया में भी बिंदास चुनाव प्रचार में लगे हैं।

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आइए, थोड़ा मस्त जी के बारे में भी जान लें। अमेरिकी दूतावास ने शोध में पाया कि किसानों की समस्या पर भारतीय संसद में सबसे ज्यादा बोलनेवाला व्यक्ति वीरेंद्र सिंह मस्त हैं। सब कुछ तय हो गया। अमेरिका जाना है। वहां के कई विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों-संस्थानों में ऋषि-कृषि, रसायनमुक्त खेती पर भारतीय पद्धति के बारे में बताना था। वहां भाशण देने के भी पैसे मिलते हैं। जाने का समय नजदीक आया। दूतावास से अफसर आये। वीजा की औपचारिकता पूरी करनी थी। पगड़ी पहने ही वे गये। उनसे कहा गया- वीजा में फोटो के लिए पगड़ी उतारनी होगी। फौरन उन्होंने कहा- नहीं, मैं पगड़ी नहीं उतार सकता। मैं किसान हूं। और यह हमारे आन-बान-शान का प्रतीक है।

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सोचिए, जिस अमेरिका जाने को बड़े-बड़े लोग लालायित रहते हैं। पैसे तक देते हैं। क्या-क्या नहीं करते। उसे उन्होंने नकार दिया। यह उनकी मस्तानगी का एक नमूना है। ऐसा नहीं कि उन्होंने विदेश यात्राएं नहीं की हैं। वे चीन गये हैं। राष्ट्रपति कोविंद की पहली विदेश यात्रा में वीरेंद्र सिंह को ही पीएम मोदी ने दक्षिण अफ्रीका भेजा था। पर, उन्होंने अमेरकी अधिकारियों से सीधे इनकार कर दिया। ऐसा ही गांधीजी ने द. अफ्रीका में किया था। वहां की कोर्ट में अपनी काठियावाड़ी पगड़ी उतारने से इनकार कर दिया था। अपनी परंपरा और स्वाभिमान के खिलाफ उन्हें कोई काम पसंद नहीं।

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ऐसा कोई कर सकता है तो बागी बलिया की माटी का लाल। बलिया ऋषि-मुनियों की तपःस्थली, क्रांतिकारियों की धरती, साहित्यकारों की सृजनभूमि, विश्वप्रसिद्ध राजनेताओं की कर्मभूमि-जन्मभूमि रही है। उसी बलिया के मुरली छपरा ब्लाक में दोकटी गांव है। पिता किसान, पर राजनीतिक-सामाजिक सूझ-बूझ वाले आध्यात्मिक प्रवृत्ति के। यूं कहे पूरा परिवार ही इसी परिधि में। इसी घरती की धूल में जन्मे-पले और बढ़े वीरेंद्र सिंह। खपड़िया बाबा ने बालपन में ही इन्हें पहचान लिया था। वे प्यार से मस्त नाम से बालक वीरेंद्र को बुलाते। बड़ा स्नेह करते। तब ये हो गये वीरेंद्र सिंह मस्त।

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प्रारंभिक शिक्षा गांव पर ही पेड़ की छांव में हुई। फिर महामना के बनारस हिंदू विवि से पढ़ाई की। संघ के स्वयंसेवक से देश सेवा की शुरुआत किशोरावास्था में ही हो चुकी थी। भाजयुमो के जिलाध्यक्ष। फिर भारतीय जनता पार्टी के जिला अध्यक्ष, उप्र किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष से भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष। स्वदेशी आंदोलन के लिए देश भर में अलख जगाते रहे। मात्र 35 साल की उम्र में 1991 में 10वीं लोकसभा के लिए चुने गये। वह भी मिर्जापुर से। हराया किसे तो दस्यसुंदरी फूलन देवी को। दूसरी बार फिर फूलन देवी को वहीं से हराया।

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2014 में भदोही से सांसद बने। पार्टी ने किसान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का भार सौंपा। सच्चे किसान को पहली बार किसी पार्टी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था। किसानों की खुशहाली की तकनीक स्वदेशी खेती, ऋषि-कृषि, रसायनमुक्त खेती। देश के इतिहास में में पहली बार अलग कृषि बजट पेश हुआ। ग्रामीण विकास के लिए सबसे अधिक राशि बजट में शामिल हुई। संसद में इनकी मुखरता पर पीएम नरेंद्र मोदी बराबर मुस्कराते हैं।

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दरअसल राष्ट्रऋषि दत्तोपंत ठेंगड़ी और संघ में रज्जू भैया के नाम से प्रसिद्ध प्रो राजेंद्र सिंह ने इनकी प्रतिभा को निखारा। भैरों सिंह शेखावत भी इनमें शामिल हैं। सादा जीवन, उच्च विचार। ईर्ष्या-द्वेष, राग-मोह, दिखावा से दूर इनकी अलग प्रकृति है। अलग स्वभाव है। इससे लोगों को प्रेरणा मिलती है। कई बार सांसद रहे। निर्भीकता तो पूछिये मत। कभी बॉडीगार्ड नहीं देखा। हाउसगार्ड नहीं। तामझाम से कोसों दूर। मस्त को डर किसका। उनके साथ होते हैं कार्यकर्ता।

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कथनी-करनी में कोई अंतर नहीं। न्यायप्रिय इतने कि गलती होने पर अपने करीबियों को भी बड़े प्रेम से जता देना, नहीं माने तो चेताना भी और अंत में तो कार्रवाई निश्चित। वो अलग माटी के बने हैं। आज सांसद मिलने से कतराते हैं। दिल्ली हो या भदोही या दोकटी- कोई मिलने आया तो धधा के मिलना, ऐसा जैसे मानो बरसों पुरानी जान-पहचान हो, क्या बूढ़ा-क्या जवान। न नाम, उम्र की कोई सीमा, न पद का कोई बंधन। गुड़-पानी लावs। फिर घर-परिवार की बात। अंत में कईसे चलल ह।

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सहज-सरल, मृदुभाषी, मिलनसार। कोई भी फोन करता है तो सीधी बात। कोई बिचौलिया नहीं। जमीन पर बैठ कर सादा भोजन। कहीं की भी यात्रा हो एक झोले में दो कुर्ता-पायजामा। पॉकेट में पैसा नहीं रखते। संतों की तरह जहां चल दिये, वहां कोई न कोई रहता है। कोई व्यसन नहीं। कम खाना, गम खाना, रहम खाना के सिद्धांत पर मस्त जी चलते हैं। नियमित ध्यान-साधना, कसरत। इन सबके बीच कैसे पढ़ने का समय निकाल लेते हैं, पता नहीं चलता। आप दुनिया के किसी मुद्दे पर उनसे बातें कर सकते हैं। भारतीय संस्कृति, परंपरा, इतिहास, दर्शन, प्रचीन ज्ञान-विज्ञान लगता ही नहीं है कि ये वही मस्त जी हैं, जो ठेठ गंवई भाषा में अभी बात कर रहे थे गांव-क्षेत्र के लोगों से और अभी किसी विश्वविद्यालय के विद्वान या किसी विषय विशेषज्ञ से बात हो रही है।

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संसद में इनके बेहतर प्रदर्शन को देखते हुए फेम इंडिया ने इन्हें देश का सर्वोत्तम सांसद चुना। यह सब उनके भदोही में किये गये कार्यों के काऱण हुआ। इनके प्रयास से जेपी की जन्मभूमि सिताबदियारा में 500 करोड़ की लागत से देश का अनोखा जेपी राष्ट्रीय स्मारक सह संग्रहालय का निर्माण संभव हुआ। वे जेपी फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। संसद जब चलता है तो शुक्रवार को बंद होते ही शाम को ट्रेन पकड़ना और शनिवार को भदोही के स्वदेशी आश्रम की कुटिया में लोगों से मिलना-जुलना, उनकी बातें सुनना, उनकी समस्याओं का निदान करना। इसी में समय निकाल कर स्मारक का काम देखना। देश भर में किसान मोर्चा की रैली, सभाएं करना। यह दूसरे के बूते की बात नहीं। दिन में दिल्ली, रात में ट्रेन से भदोही या फिर मोर्चा के कार्यक्रमों में या फिर जेपी स्मारक के निर्माण की गुणवत्ता देखना। जब भदोही के एमपी थे, तब भी गांव आने पर बलिया के लोगों के लिए सिफारिशी पत्र हाथ से लिखना। टू द प्वाइंट बात करना। काम कइसे होई, एकरे से नू मतलब बा। एक बैठकी में 150-200। अधिकारियों को फोन करना।

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बड़ा सौभाग्य है बलिया का। अरसे बाद उसे राष्ट्रीय नेता मिला है। सौभाग्य वीरेंद्र सिंह के लिए भी है कि जिस बागी बलिया की माटी के लाल वे हैं, उसका कर्ज उतारने का स्वर्णिम अवसर आ गया है। जमीन से जुड़ा जमीन का नेता। समय आ गया है। बलिया, वीरेंद्र और नरेंद्र की तिकड़ी। फिर इतिहास बनाने की ओर अग्रसर है बलिया। बलिया के विकास को एक नया आयाम मिलेगा। नये क्षितिज पर दिखेगा बलिया।

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