विश्वविद्यालय शिक्षक नियुक्ति में फैसला बदलने से कोर्ट का इनकार

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नयी दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार करने की डींग हांकने वाले सियासी दलों ने विश्वविद्यालय में शिक्षक नियुक्ति में उसके फैसले को खारिज कर दिया है और केंद्र सरकार से इस फैसले को पलटने की मांग की है। देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी वर्ग को आरक्षण देने के लिए नए नियम 13 प्वाइंट रोस्टर लागू किये जाने का चौतरफा विरोध हो रहा है। इसी नये नियम को लेकर शनिवार को राजद मुखिया लालू यादव ने भी ट्वीटर हैंडल पर विरोध जताया था। उन्होंने इसे मनुवादियों की साजिश करार दिया था।

नये 13 प्वाइंट रोस्टर को  लागू करने का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया था। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सही ठहराए जाने को लेकर विरोध शुरू हो गया है। साल 2013 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट से यह फैसला आया था तो आरक्षण समर्थित छात्र संगठनों ने आंदोलन किये थे। बाद  में जब मामला सुप्रीम कोर्ट गया तो आंदोलन थम गया था। उस समय शरद यादव ने आंदोलन का समर्थन दिया था।

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इस फैसले को आरक्षण के सिद्धांत के खिलाफ बताते हुए केंद्र सरकार के सहयोगी दल समेत तमाम विपक्षी दल सरकार से इस फैसले को पलटने के लिए संविधान में संशोधन की मांग कर रहे हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 200 प्वाइंट रोस्टर को खारिज कर 13 प्वाइंट रोस्टर लागू करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है।

एक दलित शिक्षक ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हमारी उम्मीद खत्म हो गई है। एक तो विश्वविद्यालयों में नौकरियों के लिए विज्ञापन नहीं निकलते हैं और अगर 13 प्वाइंट रोस्टर के हिसाब से विज्ञापन आएंगे भी, तो अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों की नियुक्ति संभव नहीं है। क्योंकि इस रोस्टर के दायरे में वे कभी आ ही नहीं पाएंगे।

क्या है 13 प्वाइंट रोस्टर 

देश के विश्वविद्यालयो में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए 200 प्वाइंट रोस्टर के तहत आरक्षण की व्यवस्था थी। इस व्यवस्था के तहत विश्वविद्यालय को एक यूनिट माना जाता था। जिसके तहत 1 से 200 पद के लिए 49.5 फीसदी आरक्षित वर्ग और 50.5 फीसदी अनारक्षित वर्ग के हिसाब से भर्ती की व्यवस्था की गई थी। यूनिवर्सिटी को एक यूनिट मानने से सभी वर्ग के उम्मीदवारों की भागिदारी सुनिश्चित हो पाती थी।

नए नियम यानी 13 प्वाइंट रोस्टर के तहत विश्वविद्यालय को यूनिट मानने के बजाय विभाग को यूनिट माना गया है। जिसके तहत पहला, दूसरा और तीसरा पद सामान्य वर्ग के लिए रखा गया है, जबकि चौथा पद ओबीसी कैटेगरी के लिए, पांचवां और छठां पद सामान्य वर्ग के लिए है। इसके बाद 7वां पद अनुसूचित जाति के लिए, 8वां पद ओबीसी, फिर 9वां, 10वां, 11वां पद सामान्य वर्ग के लिए, 12वां पद ओबीसी के लिए, 13वां फिर सामान्य के लिए और 14वां पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होगा। दलित युवको का मानना है कि 13 प्वाइंट रोस्टर के लागू होने की स्थिति में आदिवासी छात्रों के लिए कभी मौका ही नहीं मिल पाएगा।

किसी भी विभाग में इतने पैमाने पर नौकरियों के लिए अधिसूचना जारी नहीं होती है। 14वें नंबर तक आते-आते अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण निष्क्रिय हो जाता है। विभाग को यूनिट मानने पर कभी भी एक साथ 14 पद आएंगे, यह मुमकिन नहीं लगता है। उन्होंने कहा कि अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए एक पद भी नहीं मिल पाएगा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्लय जैसे तमाम विश्वविद्यालयों में कितने ऐसे विभाग हैं, जिनमें मात्र एक या दो या अंतिम 3 प्रोफेसर ही विभाग को संचालित करते हैं। वहां पर कभी भी ST/SC/OBC की नियुक्ति नहीं हो पाएगी।

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