शहीद दिवस पर विशेषः जरा याद करो सरदार भगत सिंह की कुर्बानी 

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  • प्रेमकुमार मणि 

23  मार्च वह दिन है, जिस रोज भगत सिंह शहीद हुए थे। 28  सितम्बर 1907  को पंजाब  सूबे के बांगा में एक किसान परिवार में जन्मे भगत सिंह को बस 23  साल की उम्र में 1931  में अंग्रेजी राज के तहत लाहौर जेल में फांसी दे दी गयी थी। वह हिंदुस्तानी समाजवादी  प्रजातान्त्रिक सेना के मुखिया थे।

मेरे पास फटी-चिटी अवस्था में एक कॉपी है, जिसे बचपन से संभाल कर मैंने रखा है। इस पर हाथ से लिखा हुआ एक नाटक है- सरदार भगत सिंह। लेखक हैं- रणधीर सिंह साहित्यालंकार। यह संभवतः नाटक की पाण्डुलिपि है। इसे क्रांति  प्रकाशन, 182, सूता पट्टी, कलकत्ता ने प्रकाशित किया था। मुद्रक – एन एम सुरान, सुरान प्रिंटर्स वर्क्स, 402, अमरचितपुर रोड, कलकत्ता थे। कीमत थी एक रुपये। यह किताब भगत सिंह की शहादत के कुछ ही समय बाद लिखी गयी थी और इसके लेखक स्वयं भगत सिंह की सेना में थे। यह किताब  दिवंगत  पिताजी ने संजो कर रखी हुई थी। इसका मंचन उन्होंने किया था और माँ के अनुसार स्वयं सैंडर्स की भूमिका  की थी। मेकअप में बाल को अंग्रेजों के समान भूरा करने के लिए किसी केमिकल का प्रयोग किया गया और इसके नतीजतन उनके बाल एक लम्बे समय तक लिए विनष्ट हो गए।

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आज मैंने वह कॉपी निकाली। उसे सहलाया। उसके कुछ अंशों का मौन पाठ किया। और इस प्रकार भगत सिंह मेरे ख्यालों में छलछला आये। मन ही मन उन्हें उन्हें प्रणाम किया। शैलेन्द्र की  पंक्तियाँ  भी आधी-अधूरी ही सही, स्मृति में उभरीं, जो उन्होंने भगत सिंह को सम्बोधित करते हुए लिखा है- भगत सिंह तुम जन्म लेना काया भारतवासी की, देश भक्ति के लिए आज भी सजा मिलेगी फांसी की। देशभक्ति की बात करोगे तुम गद्दार कहाओगे, बम्ब-सम्ब की छोडो, भाषण दिया कि पकडे जाओगे।

क्या सचमुच भगत सिंह आज होते तो अर्बन नक्सली के नाम पर उन्हें जेल में हमने नहीं रखा होता? कल्पना कीजिए भगत सिंह आज किन स्थितियों में होते। शायद वह चुप नहीं बैठते और न ही सरकार चुप बैठती। फिर तो उन्हें सजा मिलनी ही थी। आज़ाद भारत में उनके मित्र बटुकेश्वर दत्त  हमारे ही शहर पटना में रहे। वह एक वर्ष से भी कम समय के लिए विधान परिषद के सदस्य बनाये गए। किसी खाली सीट पर बनाये गए होंगे। उन्हें रिपीट नहीं किया गया। जब मैं उस परिषद का सदस्य बना, तब उनके बारे में कुछ जानकारी इकट्ठी करनी चाही। वहां कुछ भी नहीं मिला। उनके साथ सदस्य रहे इंद्र कुमार जी (अब  दिवंगत) ने बतलाया था कि उनका और मेरा चेयर पास-पास ही था। बहुत तरह  की बातें करते थे। उनका आर्थिक संकट बहुत था। उनके अनुसार बटुकेश्वर दत्त जीवन यापन के लिए दानापुर से पटना तक मिनी बस चलाते थे। सरकार ने इतनी ही मदद की थी कि लइसेंस लेने में उन्हें रिश्वत नहीं देनी पड़ी। वह भी शिकायत करने के बाद। बटुकेश्वर जब बीमार हुए, तब भगत सिंह की माँ ने लम्बे समय तक अस्पताल में रह कर उनकी सुश्रुषा की।

भगत सिंह की उम्र भले ही कम हो, वैचारिक रूप से वह सजग थे। उतनी कम उम्र में भी उन्होंने जवाहरलाल नेहरू  और सुभाष बोस के वैचारिक भेद को समझ लिया था। उन्होंने नेहरू के नजदीक स्वयं को पाया था। जिस नाटक की ऊपर चर्चा की है, उसमें एक दृश्य है कि पुलिस इंस्पेक्टर भगत सिंह से पूछताछ कर रहा है। यह पूछे जाने पर कि आप ने हिंसा का रास्ता क्यों अपनाया? वह कहते हैं- ” लेकिन मैं पूछता हूँ, हमें हिंसा केलिए किसने मजबूर किया? अहिंसा की दुहाई देने वाले इंस्पेक्टर, अपने आका अंग्रेजों से पूछो कि हमें हिंसावादी किसने बनाया? इसकी तमाम जिम्मेद्दारी अंग्रेजी सरकार और आप जैसे उसके टुकड़खोर नौकरों पर है, जिसने हज़ारों के खून से अपना श्रृंगार किया है। ….आप पूछो जालियांवाला बाग की खून से भींगी उस जमीन से जो अब भी लाल है। जहाँ हज़ारों नर-नारियों और बच्चों ने तड़प-तड़प कर जानें दीं। उन्ही बातों ने हमें मजबूर किया है कि लम्बी-लम्बी बातों  के बदले हमारे हाथ में बम और रिवाल्वर हैं। इसमें हमारा दोष कितना है? ”

भगत सिंह, हम आपको कैसे भूल सकते हैं भला। आज के रोज आपने फांसी के फंदे से इंकलाब का जो सिंहनाद किया था, उसकी अनुगूँज सदियों रहेगी। टुकड़खोर आज भी हैं, हिंसक सरकारें आज भी हैं। नहीं हैं तो आप जैसे भगत सिंह। (फेसबुक वाल से)

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