बिहार में मुद्दों की भरमार, पर भुनाने में नाकाम रहा विपक्ष

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राहुल गांधी व तेजस्वी यादव की फाइल फोटो
राहुल गांधी व तेजस्वी यादव की फाइल फोटो

पटना। बिहार में मुद्दों की कमी नहीं है। इसे विपक्ष की कमजोरी कहिए कि वह भुनाने में नाकाम दिखता है। इसकी मूल वजह है विपक्ष में कई दलों की भरमार। सबको खुश करने के चक्कर में आखिर-आखिर तक विपक्षी दलों में खटपट होती रही। राजद अपनी भूमिका महागठबंधन में अपनी सर्वोपरि भूमिका बनाने में लगा रहा। कांग्रेस की स्थिति पहले से बेहतर हो सकती थी, लेकिन गठबंधन धर्म निभाने के चक्कर में उसे सबकी सुननी और सहनी पड़ी।

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भागलपुर में कीर्ति झा आजाद को वह न उतार सकी। पप्पू यादव को राजद की जिद के कारण वह अपने साथ नहीं ला सकी। महागठबंधन के कुछ दलों पर खुलेआम टिकट बेचने के आरोप लगे। रालोसपा नेता उपेंद्र कुशवाहा ने खुद ही दो सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए सीटों की अधिकाधिक संख्या हासिल करने में महागठबंधन पर दबाव बनाये रखा। सच कहें तो सीटों के बंटवारे में राजद ने मनमाफिक सीटें हासिल कीं और कांग्रेस को उसके बिहार में कमजोर होने का एहसास भी कराया। मुकेश सहनी की वीआईपी, जीतन राम माझी के हम और रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा को जितनी सीटें मिलीं, उतनी की वे हकदरा नहीं थीं।

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जहां तक मुद्दों की बात है तो सृजन घोटाला, शौचालय घोटाला, अपराधों में लगातार हो रही वृद्धि जैसे मुद्दे बिहार में विपक्ष के पास थे, लेकिन राज्य स्तर पर इन मुद्दों को विपक्ष कारगर हथियार नहीं बना पाया। केंद्रीय स्तर पर नोटबंदी, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, रिजर्व बैंक में घमासान ऐसे मुद्दे थे, जिन्हें विपक्ष हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता था, लेकिन वे भी शिद्दत से चर्चा में नहीं हैं।

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उम्मीदवारों के नामों की समय पर घोषणा करने में भी विपक्ष पीछे रहा। इस मामले में एनडीए ने अच्छा काम किया। समय से पहले सीटों की संख्या फरिया ली। ससमय उम्मीदवारों के नामों की घोषणा हो गयी। रणनीति बना कर उनके स्टार प्रचारक भी मैदान में पहले कूद गये। यानी प्रचार के मामले में भी विपक्ष बेजान पड़ा रहा।

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इन सबसे बड़ी समस्या विपक्ष की यह रही कि महागठबंधन का नेतृत्व करने वाला राजद खुद ही घरेलू झगड़ा से परेशान है। राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद के दोनों बेटों में घमासान मचा है। तेज प्रताप यादव राजद में अलग मोरचा बनाने को आतुर हैं। भाई वीरेंद्र को पाटलिपुत्रा सीट से उम्मीदवार न बना कर राजद ने मीसा भारती को मैदान में उतारा। वीरेंद्र लंबे समय से टिकट की आस में बैठे थे। राजद के भीतर के घमासान ने विपक्ष को कमजोर किया है, इसे मानने में किसी को इनकार नहीं हो सकता है।

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