जनतंत्र के सबसे बड़े समर में आजमाये जाएंगे हर तरह के दांव

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  • कृष्ण किसलय

निर्वाचन आयोग की ओर से आम चुनाव की घोषणा होते ही दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र के समर का शंखनाद हो चुका है। चुनाव की रणभेरी बजने के साथ ही देशभर में चुनाव आचार संहिता लागू हो चुकी है और अब सरकारों की ओर से किसी नई योजना की घोषणा नहीं हो रही। 17वीं लोकसभा के लिए कुल 543 सीटों पर 7 चरणों में मतदान 11 अप्रैल, 18 अप्रैल, 23 अप्रैल, 29 अप्रैल, 06 मई, 12 मई, 19 मई को होगा और मतों की गणना 23 मई को होगी। 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदान एक चरण में होगा। आंध्र प्रदेश, अरुणाचल, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, केरल, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, पंजाब, सिक्किम, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तराखंड, अंडमान-निकोबार, दादर एवं नागर हवेली, दिल्ली, पुदुचेरी और चंडीगढ़ में एक ही चरण में मतदान होगा। सभी की नीति सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाने की हो गयी है। गठबंधन सरकार के मद्देनजर ही भाजपा ने बिहार में जीती हुई सीटें भी जदयू को दे दी हैं। बिहार में भाजपा, जदयू को 17-17 और लोजपा को छह सीटें मिली हैं, जबकि 2014 में बीजेपी ने 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारकर 22 पर और जदयू ने सभी 40 सीटों पर लड़कर दो सीटों पर ही जीत हासिल की थी। इस तरह भाजपा ने 13 सीटों का त्याग किया है, जिनमें पांच पर तो उसके सांसद हैं।

पहले चरण में 20 राज्यों की 91 सीटों पर, दूसरे चरण में 13 राज्यों की 97 सीटों पर, तीसरे चरण में 14 राज्यों की 115 सीटों पर, चौथे चरण में 09 राज्यों की 71 सीटों पर, पांचवें चरण में  07 राज्यों की 51 सीटों पर, छठवें चरण में 07 राज्यों की 59 सीटों पर और सातवें अंतिम चरण में 08 राज्यों की 59 सीटों पर मतदान होगा। 12 राज्यों की 34 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ ही होगा। सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश, 40 सीटों वाले बिहार और 42 सीटों वाले पश्चिम बंगाल में मतदान सात चरणों में होगा। इस बार सभी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट मशीन होगी, सीसीटीवी कैमरा लगेगा और मतदान के साथ पूरी चुनावी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी होगी। वीवीपैट के ऐप से मतदाता जान सकेगा की उसका मत उसकी पसंद के उम्मीदवार को ही पड़ा। इस बार देशभर में करीब 10 लाख पर मतदान केेंद्रों पर मतदान होगा। जबकि 2014 में मतदान केंद्रों की संख्या करीब 09 लाख थी।

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इस बार चुनाव की महत्वपूर्ण बात यह होगी कि सूचना तकनीक की बेहतर जानकारी से लैस 15 करोड़ युवा देश के राजनीतिक भाग्य का फैसला फोन (स्मार्ट मोबाइल हैंडसेट) के जरिये करेंगे। यही कारण है कि कई तरह के ऐप, विभिन्न यू-ट्यूब चैनल, फेसबुक पर चुनावी पेज आदि सक्रिय हैं। दूसरी बात यह कि  इस बार भारत का आम चुनाव इतना खर्चीला होगा कि यह दुनिया के सबसे महंगे चुनाव का रिकार्ड बनाएगा। देश में 2014 में चुनाव पर करीब 35 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे। दुनिया के सबसे पुराने लोकतांत्रिक देश अमेरिका में भी गत राष्ट्रपति व संसदीय चुनाव पर करीब 46 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।

देश के मतदाता सोच-समझ कर ही मत देने का फैसला करेंगे, क्योंकि वे परिपक्व हो चुके हैं और राजनीतिक दलों को अच्छी तरह पहचानने भी लगे हैं। देश में आजादी के दो दशक बाद 1967 में हरियाणा में गया लाल नाम के विधायक ने एक पखवाड़ा में तीन बार दल बदला था। तभी से दलबदलुओं के लिए ‘आया राम, गया राम की कहावत प्रचलित है।

180 दागी सांसद लोकसभा में, सेवा से धंधा बनी राजनीति दल बदल के कारण ही 1967 के बाद के वर्षों में केंद्र और राज्यों में मिलीजुली सरकारें बननी शुरू हुईं और सभी राजनीतिक दलों को गठबंधन की सरकारों में भागीदार बनना, भागीदारी वाली सरकार चलाना सीखना पड़ा है। आजादी के बाद आरंभिक दौर में उम्मीदवार महत्वपूर्ण होते थे। उनके गुण-दोष, योग्यता-अयोग्यता परखी जाती थी। उम्मीदवार जनता के साथ संवाद करते थे, जनता की बात सुनते थे, जनता के साथ खड़े होते थे। धीरे-धीरे राजनीति में आपराधिक छवि की दखल बढ़ती गई। 1996 में देश की संसद में 40 सांसदों पर आपराधिक मुकदमे थे। 2004 में 125, 2009 में 157 और 2014 में 180 दागी सांसद लोकसभा में पहुंचे थे। पहले दबंग नेता भी जनता के साथ बने रहने का प्रयास करते थे, मगर आर्थिक उदारीकरण के बाद सत्ता के बाजार में पैसा का प्रवाह बढ़ा तो बाहुबल के साथ धनबल की दखल बढ़ गई। पहले पार्टियां उम्मीदवार को आर्थिक मदद देती थी। अब उम्मीदवार पार्टी को चंदा दे रहे हैं। पैसे ने राजनीति का चरित्र बदल दिया। राजनीति संवाद से समर में तब्दील हो गई, सेवा से धंधा बन गई, इन्वेस्ट मार्केट बन गई। सभी संगठित पार्टियों ने चंदा लेने और बांटने का तंत्र विकसित कर लिया है।

सीटों के तालमेल में भाजपा ने महाराष्ट्र में भी शिवसेना से समझौते में बेहद लचीला रुख अपनाया है। महाराष्ट्र में भाजपा 25 सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ेगी और शिवसेना 23 पर। दोनों विधानसभा का चुनाव भी मिलकर लड़ेंगे। तमिलनाडु में भी एआईडीएमके से गठबंधन में भाजपा को 5 सीटें ही मिली हैं।  इससे यह भी जाहिर है कि भाजपा के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव 2014 के लोकसभा चुनाव के मुकाबले एकदम अलग है। तीन राज्यों में बीते विधानसभा चुनावों में सत्ता खोने के बाद भाजपा को लग रहा है कि नरेंद्र मोदी के आकर्षण और अमित शाह के प्रबंधन पर ही निर्भरता भारी पड़ सकती है। भाजपा की यही सोच है कि ज्यादा सीटें लेकर हार जाने से अच्छा सहयोगी दलों के साथ सरकार बनाना है। कांग्रेस का जोर भी छोटे-बड़े राज्यों में गठबंधन पर ही है और उसे पिछले साल तीन राज्यों में सफलता भी मिली है।

लोकसभा चुनाव में राजनीतिक दृष्टि कोण से 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश के बाद 40 सीटों वाले बिहार का ज्यादा रणनीतिक महत्व है। बिहार के सियासी मिजाज को मौटे तौर पर इस तथ्य से समझने की जरूरत है कि यहां 1944 से 1990 तक राज्य सरकार की सत्ता कांग्रेस के पास थी। हालांकि इस बीच चार छोटी अवधि के लिए गैर कांग्रेसी सरकारें भी रहीं। श्रीकृष्ण सिंह 1961 तक लगातार मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद 29 सालों में कांग्रेस के 23 मुख्यमंत्री बने और पांच बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। 1990 के बाद कांग्रेस हाशिये पर चली गई और सत्ता लालू प्रसाद के पास आ गई। अब 2005 से सत्ता नीतीश कुमार के पास है। गठबंधन की राजनीति से ही कांग्रेस में 2015 से फिर जान आई है।

बिहार में प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह के बाद एक हद तक कर्पूरी ठाकुर का कद ही राष्ट्रीय स्तर का था। बिहार की राजनीतिक पहचान में तब जबर्दस्त उछाल आई, जब 1990 में लालकृष्ण आडवाणी के रथ को समस्तीपुर में रोक कर और उन्हें गिरफ्तार कर लालू प्रसाद धर्मनिरपेक्षता के हीरो बन गए। नब्बे के दशक के बाद बिहार में उर्वर रही वामपंथी जमीन कमजोर हो गई, क्योंकि वामपंथी दलों का जनाधार मंडलवाद के कारण टूट गया। 1991 में बिहार में भाकपा के 8 सांसद हुआ करते थे। मतदाता जातीय आधार पर लालू प्रसाद और अन्य नेताओं से जुड़ गए। जनता दल में लालू प्रसाद का कद बढ़ा तो शरद यादव, जार्ज फर्नांडीस, नीतीश कुमार जैसे प्रमुख नेता घुटन महसूस करने लगे। नीतीश कुमार और जार्ज फर्नांडीस ने 1994 में लालू प्रसाद से किनारा कर समता पार्टी बना ली। शरद यादव 1997 में चारा घोटाला में लालू प्रसाद का नाम आने पर अलग हो गए। लालू प्रसाद ने नई पार्टी राष्ट्रीय जनता दल बनाकर अपनी राह के अवरोध दूर किए। बिहार में राजग सरकार बनने पर नीतीश कुमार का कद बड़ी तेजी से बढ़ा और बिहार को राष्ट्रीय स्तर पर तरजीह मिली।

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बिहार में अपने दम-खम पर सरकार बनाने-चलाने में क्षेत्रीय पार्टियों के नाकाम होने पर गठबंधन की राजनीति शुरू हुई। कांग्रेस मुस्लिम, दलितों और जार्ज, नीतीश पिछड़ी जातियों के सहारे थे तो भाजपा को राम लहर पर भरोसा था। मगर लालू प्रसाद ने माई समीकरण (यादव, मुस्लिम) से चुनाव का मैदान मार लिया। 2003 में समता पार्टी का विलय जदयू में हुआ तो नीतीश कुमार प्रखर नेता के रूप में उभरे। भाजपा-जदयू ने मिलकर चुनाव लड़ा तो वोट प्रतिशत बढ़ गया। 2014 में भाजपा से अलग होने पर जदयू को करारा झटका लगा। इस बार लोकसभा चुनाव में दोनों दल साथ हैं। 1989 की राम लहर में भाजपा बिहार में तीन  ही सीट जीत सकी थी। 1999 में भाजपा-जदयू ने साथ मिलकर 40 में 29 सीटें जीती थीं, जिनमें भाजपा को 12 और जदयू को 17 सीटें मिली थीं।  2002 में गोधरा कांड के बाद रामविलास पासवान ने राजग से नाता तोड़ लिया था। 2004 में राजद-कांग्रेस और लोजपा की तिकड़ी ने भाजपा-जदयू को हाशिये पर धकेल दिया था और भाजपा को पांच, जदयू को छह सीटें ही मिल सकी थीं। तब राजद (लालू) की 22, लोजपा (पासवान) की चार और कांग्रेस की तीन सीटों पर जीत हासिल हुई थी।  2009 में भाजपा को 12 और जदयू को 20 सीटों पर जीत मिली। 2009 में कांग्रेस-राजद को बंटकर लडऩे का खामियाजा भुगतना पड़ा। 2014 की मोदी लहर में भाजपा  को   22, जदयू को 2, राजद को 4, कांग्रेस को 2, लोजपा को 6 और अन्य दलों को 4 सीटें हासिल हुईं।

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बिहार में इस बार चुनाव प्रचार का मुद्दा बदल गया है। समाजवादी विचारधारा की आखिरी पार्टी जदयू अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हुए ही प्रचार करने का प्रयास कर रही है, भले ही उसकी सरकार साझेदारी में है। भाजपा इस बार कांग्रेस के विरुद्ध अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का राग सीधे नहीं अलाप रही है, क्योंकि वह जानती है कि राज्य सरकार की अधिसंख्य योजनाएं किसी खास वर्ग के लिए नहीं, समाज के सभी वर्ग के लिएहै। भाजपा-जदयू के राजनीतिक मंच से डबल इंजन, सवर्ण आरक्षण, शराब बंदी, सात निश्चय, कन्या उत्थान की चर्चा हो रही है तो कांग्रेस, राजद, हम गठबंधन के दूसरे मंच से सांप्रदायिकता, पलटू सियासत पर भाषणबाजी जारी है। वाम दलों के तीसरे मंच का मुद्दा इन दोनों गठबंधनों से अलग तरह का है।

बिहार में ऊपरी तौर पर बात भले ही सुशासन और विकास की होती हो, मगर भीतरी तौर पर फैसला समाज में बहने वाली जातीय अंतरधारा ही करती है। जाति संख्या बल के गणित में सबसे मजबूत स्थिति में मुसलमान (15.12 फीसदी) और सबसे कमजोर पासी (0.94 फीसदी) हैं।  इसके बाद यादव (14.61), रविदास (5.66), पासवान (5.51), राजपूत (5.47), कोईरी (5.25), ब्राह्मण (5.20), भूमिहार (4.47), कुर्मी (4.16), मुसहर (2.88), तेली (2.62), मल्लाह (2.04), धानुक (1.67), चंद्रवंशी (1.36), बढ़ई-लोहार (1.26), नाई (1.26), नोनिया (1.24), कुम्हार (1.17), कायस्थ (1.07), तांती-बुनकर (1.03) और धोबी-रज्जक (0.99) हैं। 40 लोकसभा सीटों में छह अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। करीब 20 सीटों पर यादव, मुसलमान, राजपूत, भूमिहार की राजनीति होती है। 16वीं लोकसभा की 21 सीटों पर अभी इन्हीं चार जातियों का कब्जा है। तीन-चार सीटों पर अति पिछड़ी जाति, तीन-चार सीटों पर ब्राह्मण जाति की राजनीति होती है। अनेक सीटों पर कोईरी, कुर्मी के साथ बनिया और कायस्थ की भी राजनीति होती है।

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