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कल से पितृ पक्ष है। पितरों का तर्पण कल से शुरू होगा। पितृपक्ष में कुश की जरूरत पड़ती है।गया में पिंडदान का काफी महत्व है
कल से पितृ पक्ष है। पितरों का तर्पण कल से शुरू होगा। पितृपक्ष में कुश की जरूरत पड़ती है। शहरों में संकट है। जल्दी मिलता नहीं। आइए, इसी बहाने जानें उसका महत्‍व   राम धनी द्विवेदी कल से पितृपक्ष है। इसमें सनातनी लोग अपने पितरों का तर्पण करते हैं। तर्पण दोपहर के समय किया जाना चाहिए। तर्पण में सबसे महत्वपूर्ण जो चीज...
एनएसएस द्वारा गणतंत्र दिवस परेड चयन शिविर 2022 का आयोजन 6 सितम्बर को किया कोलकाता विश्वविद्यालय में किया गया।
कोलकाता। भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय की इकाई राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के स्वयंसेवक एवं स्वयंसेविका के लिए पूर्व गणतंत्र दिवस परेड चयन शिविर 2022 का आयोजन 6 सितम्बर को किया कोलकाता विश्वविद्यालय में किया गया। आयोजित शिविर में विश्वविद्यालय, की एनएसएस इकाई से जुड़े स्वयंसेवक शिविर में शामिल हुए। गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ में आयोजित...
कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (किस) को साक्षरता यूनेस्को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता पुरस्कार 2022 पर सर्वोच्च वैश्विक मान्यता से सम्मानित किया गया है।
भुवनेश्वर। कलिंग सामाजिक विज्ञान संस्थान (किस) को साक्षरता यूनेस्को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता पुरस्कार 2022 पर सर्वोच्च वैश्विक मान्यता से सम्मानित किया गया है। इस पुरस्कार में 20,000 अमेरिकी डॉलर, एक पदक और एक प्रशस्ति पत्र दिया जाता है। इसे 8 सितंबर 2022 को कोटे डी आइवर में यूनेस्को द्वारा आयोजित एक वैश्विक पुरस्कार समारोह में प्रदान किया गया। राष्ट्र-निर्माण के उद्देश्य...
कुम्हड़ा आमतौौर पर पुरुष ही काटते हैं। साबूत कुम्हड़ा औरतें नहीं कभी नहीं काटतीं। आइए, जानते हैं ऐसा क्यों होता है।
कुम्हड़ा आमतौौर पर पुरुष ही काटते हैं। साबूत कुम्हड़ा औरतें नहीं कभी नहीं काटतीं। आइए, जानते हैं ऐसा क्यों होता है। रामधनी द्विवेदी  इस बार बाजार से सब्जी के साथ हरा कद्दू (कुम्हड़ा) भी आ गया था। लगभग दो किलो का साबूत। इसमें दो दिन सब्‍जी बन जाती। शाम को उसे काटने के पहले दिव्‍या ने कहा- पापा काट देते तो...
आचार्य नरेन्द्र देव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की राजनीतिक नैतिकता का दिलचस्प उदाहरण है। हालांकि नयी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों को वह नहीं पचेगी।
आचार्य नरेन्द्र देव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की राजनीतिक नैतिकता का दिलचस्प उदाहरण है। हालांकि नयी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों को वह नहीं पचेगी। लेकिन नई पीढ़ी के बीच के आदर्शवादियों को वह ‘नैतिक कथा’ सुनाना जरूरी है। सुरेंद्र किशोर आचार्य नरेंद्र देव की नैतिकता राजनीतिज्ञों को बड़ी सीख देती है, पर आज के समय में मानेगा कौन. एक समय ऐसा भी...
नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगातार अपने बेढंगे बोल के कारण मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक अक्सर चर्चा में आते रहे हैं.
ओमप्रकाश अश्क नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगातार अपने बेढंगे बोल के कारण मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक अक्सर चर्चा में आते रहे हैं. इस बार उन्होंने नरेंद्र मोदी से ‘अग्निवीर’ योजना वापस लेने की मांग की है. एक निजी चैनल से इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मैं प्रधानमंत्री मोदी से हाथ जोड़कर अपील करता हूं कि वे इस...
दया पवार की आत्मकथा अछूत महार समाज के संघर्ष की गाथा है 
राम धनी द्विवेदी दया पवार की आत्‍मकथा अछूत पढ़ते समय ऐसा लगा कि दूसरों की पीड़ा हम उस गहराई तक अनुभव नहीं कर सकते, जितना भोगने वाले ने किया है। भूख का डंक भूखा ही अनुभव कर सकता है। सामाजिक अपमान होने पर कोई किस तरह अंदर ही अंदर मरता है, इसे वही जान सकता है, जिसका कभी वैसा...
सांस्कृतिक संगठन 'कोरस' ने शनिवार को अपने दस दिवसीय थियेटर वर्कशॉप का समापन संस्थापक संस्कृतिकर्मी महेश्वर स्मृति दिवस के रूप में किया।
पटना। सांस्कृतिक संगठन 'कोरस' ने शनिवार को अपने दस दिवसीय थियेटर वर्कशॉप का समापन संस्थापक संस्कृतिकर्मी महेश्वर स्मृति दिवस के रूप में किया। इस अवसर पर पटना के हड़ताली मोड़ स्थित 11 नं. विधायक आवास पर आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत में संयोजक समता राय ने महेश्वर का संक्षिप्त परिचय देते हुए कहा कि पटना के बीएन कॉलेज में प्रोफेसर...
25 जून भारतीय राजनीति में एक उल्लेखनीय तारीख है। इसी रोज 1975 में, तत्कालीन इंदिरा सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी। दरअसल वह आपातकाल नहीं, आतंककाल था।
प्रेमकुमार मणि  25 जून भारतीय राजनीति में एक उल्लेखनीय तारीख है। इसी रोज 1975 में, तत्कालीन इंदिरा सरकार ने इमरजेंसी लगाई थी। दरअसल वह आपातकाल नहीं, आतंककाल था। सब कुछ दस बजे रात्रि के बाद हुआ था, इसलिए देश की जनता को अगले दिन सुबह तब जानकारी मिली, जब ज्यादातर अख़बार नहीं प्रकाशित हुए। देश भर में अफवाहों का...
आपातकाल-पीड़ित लोगबाग हर साल इमरजेंसी की वर्षगांठ मनाते हैं। मनाना जरूरी भी है। क्योंकि 25 जून  1975 को इमरजेंसी लगाकर पूरे देश को एक बड़े जेलखाना में बदल दिया गया था। 23 मार्च 1977 को ही इसे समाप्त किया जा सका था, जब लोकसभा के आम चुनाव के बाद मोरारजी देसाई की सरकार बनी।
सुरेंद्र किशोर  आपातकाल-पीड़ित लोगबाग हर साल इमरजेंसी की वर्षगांठ मनाते हैं। मनाना जरूरी भी है। क्योंकि 25 जून  1975 को इमरजेंसी लगाकर पूरे देश को एक बड़े जेलखाना में बदल दिया गया था। 23 मार्च 1977 को ही इसे समाप्त किया जा सका था, जब लोकसभा के आम चुनाव के बाद मोरारजी देसाई की सरकार बनी। जिन्होंने आपातकाल (इमरजेंसी) लगाया,...