भाजपा के लिए मंथन और विपक्ष के लिए एकजुटता का वक्त

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नयी दिल्ली। दो दिनों में भाजपा को तीन झटके। एक से उबर नहीं पायी कि लगातार दो और झटके भाजपा को पिछले 24 घंटे में झेलने पड़े हैं। केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने कल दोपहर न सिर्फ मंत्री पद छोड़ा, बल्कि राजग से भी नाता तोड़ दिया। भाजपा की एक सांसद ने पहले ही आरोप लगाते हुए रिश्ता तोड़ लिया था। कल ही शाम को रिजर्व बैंक के गवर्नर ऊर्जित पटेल के इस्तीफे की खबर आयी। अगले दिन मंगलवार भाजपा के लिए अमंगलकारी साबित हुआ। पिछले चार साल से लगातार विजय हासिल करने वाली भाजपा ने मंगलवार को तीन राज्यों में अपनी सरकार गंवा दी। यह भाजपा के लिए मंथन का वक्त है और विपक्ष को अपनी एकजुटता दिखा कर 2019 की तैयारी में जुट जाने का तकाजा है।

पांच विधानसभा चुनावों के अवांछित परिणाम भाजपा के अहंकार की उपज हैं। सत्ता में आते ही उसने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया। विपक्ष के सफाये की रणनीति पर काम की। अपने वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी की। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा को अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी ने नाकारा मान लिया। यह भाजपा का अहंकार ही तो है। जम्मू कश्मीर में भाजपा के गवर्नर ने जिस तरह सरकार बनाने का दावा खारिज कर राष्ट्रपित शासन की सिफारिश की, वह सत्ता का दुरुपयोग ही तो था।

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देश में सवर्ण-दलित, हिन्दू-मुसलमान, सामूहिक पिटाई से होने वाली मौतें, शहरों-स्टेशनों के नाम परिवर्तन जैसी हरकतें भाजपा शासन की चार साल की ऐसी नकारात्मक गतिविधियां रही हैं, जिससे भारतीय जनमानस कभी स्वीकार नहीं कर सकता। भाजपा को यह मुगालता हो गया था कि उसके अजेय घोड़ा सरपट दौड़ता ही रहेगा। भाजपा ने अतीत से भी नहीं सीखा कि 1977 में जितनी नफरत से इंदिरा गांधी को जनता ने परास्त किया था, तीन साल बाद ही उतने ही आदर से उन्हें कुरसी पर विराजमान कर दिया था।

चुनावों में प्रधानमंत्री ने जिस अमर्यादित भाषा का प्रयोग अपने भाषणों में किया, वह भारतीय संस्कारों के निहायत खिलाफ था। भाजपा भारतीय संस्कार और भारतीयता की बात जरूर कहती है, लेकिन सोनिया गांदी के बारे में उनकी टिप्पणी कितनी घृणित रही कि उसका खामियाजा जनता ने चखा दिया।

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भाजपा को अपने आचरण, कर्म और पार्टीजनों के वरिष्ठों से व्यवहार की रणनीति में व्यापक परिवर्तन करना होगा। विपक्ष के लिए यह एक अवसर के रूप में आया है। अगर उसने एकजुट न होकर यह अवसर गंवा दिया तो शायद वर्षों लग जाएंगे, लिपक्ष को अपनी हालत सुधारने में।

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