उपेंद्रनाथ अश्क न सिर्फ साहित्यकार थे, बल्कि एक संपादक भी थे

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उपेंद्रनाथ अश्क न सिर्फ सशक्त साहित्यकार थे, बल्कि एक सही संपादक भी थे। संपादन भी सिखाते थे उपेंद्रनाथ अश्क। प्रो. कृपाशंकर चौबे को उन्होंने कई पत्र लिखे थे। (दायें प्रो. कृपाशंकर चौबे और बायें उपेंद्रनाथ अश्क)
उपेंद्रनाथ अश्क न सिर्फ सशक्त साहित्यकार थे, बल्कि एक सही संपादक भी थे। संपादन भी सिखाते थे उपेंद्रनाथ अश्क। प्रो. कृपाशंकर चौबे को उन्होंने कई पत्र लिखे थे। (दायें प्रो. कृपाशंकर चौबे और बायें उपेंद्रनाथ अश्क)
उपेंद्रनाथ अश्क न सिर्फ सशक्त साहित्यकार थे, बल्कि एक सही संपादक भी थे। संपादन भी सिखाते थे उपेंद्रनाथ अश्क। प्रो. कृपाशंकर चौबे को उन्होंने कई पत्र लिखे थे। उनके पत्रों से यह बात स्पष्ट हो जाती है। 14 दिसंबर को उपेंद्रनाथ अश्क का जन्मदिन था। प्रो. कृपाशंकर चौबे ने उन्हें सलीके से याद किया है। 
  • प्रो. कृपाशंकर चौबे
उपेंद्रनाथ अश्क (14 दिसंबर 1910-19 जनवरी 1996) ऐसे साहित्यकार थे जो अपने आत्मीय पत्रकारों को पत्र लिखकर संपादन भी सिखाते थे कि कविता को कैसे छापना है, किस तरह की टिप्पणी देनी है। 26-09-1989 को मुझे लिखे पत्र में उन्होंने बताया था कि कविता में किस पंक्ति के बाद स्पेस देना है। इसी तरह दो कविताएं भेजते हुए 30-11-94 को मुझे लिखे पत्र में उपेंद्रनाथ अश्क ने कविता का भाष्य भी कर दिया था, “पहली कविता उन नैतिक मूल्यों की निर्मल जलधारा की है जिनपर हमारा देश दो-चार दशक पहले तक चलता रहा। लेकिन उस जलधारा पर भ्रष्ट मूल्यों की रेत छाई जा रही है, उसी भ्रष्टाचार की समस्या, चाटुकारिता, छल-फरेब के मूल्य इस पर रेत बिछा रहे हैं और यहाँ पर सीपियों तथा घोंघों की तरह फैले हैं। कवि निराश नहीं है, वह जानता है कि यह दौर भी बीत जाएगा, फिर, क्रान्ति होगी और कोई भागीरथ नैतिक मूल्यों के पतितपावनी इस देश में बहाएगा। दूसरी कविता आसान है समझ जाओगे। दिसम्बर और जनवरी में किसी हप्‍ते छाप देना। केवल एक नोट दे देना कि अश्क जी 14 दिसम्बर को 85वें में कदम रख रहे हैं, शरीर छीज गया है लेकिन मस्तिष्क पहले से ज्यादा क्रियाशील है, आँखों की मन्द ज्योति और पुराने दमे से जुझते हुए अपने उपन्यास का अन्तिम और सातवाँ खंड पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। लेटे-लेटे कविताएँ और ग़ज़लें लिखते हैं। हम उनकी ताजा कविताएँ उनके जन्मदिवस के उपलक्ष्य में छाप रहे हैं। कविताएँ छापो, पहली कविता पाठकों की समझ में आ जाए, तो जैसा कि मैंने लिखा है एक व्याख्यात्मक नोट उस पर लिख दो ताकि कविता पाठकों को समझ में आ जाए। मेरे हक में दुआ करो कि मैं जल्दी स्वस्थ हो जाऊँ, अपनी ज़ि‍न्दगी में उपन्यास लिख ले जाऊँ।”
पत्र में जिस उपन्यास की चर्चा उन्होंने की थी, वह ‘गिरती दीवारें’ है। उसके लेखन में अश्क जी को बहुत दिक्कत पेश आई थी। असल में उन्हें जीवन के आखिरी वर्षों में माफिया से त्रस्त रहना पड़ा था। इलाहाबाद के एक माफिया ने अश्क जी के लिए आबंटित जगह को अपनी आपराधिक सरगर्मियों का अड्डा बनाना चाहा था। तब अश्क जी बेतरह परेशान हो गए थे। मामला संज्ञान में आने पर शासन ने अश्क जी को सुरक्षा मुहैया कराने की बात की तो 11-03-1989 को मुझे लिखे पत्र में अश्क जी ने कहा था, “यदि भुक्‍खल महाराज के लोग पिस्‍तौल वग़ैरा लेकर बरबस मेरा कॉटेज खाली कराने को न आते, यदि मेरे पड़ोस में 1 नम्बर के बँगले को इसी तरह 25,000 में खरीदकर इन लोगों ने सरदार प्रीतम सिंह भाटिया को उसे 90,000 में खरीदने पर विवश न किया होता, उनके इनकार करने पर उनके घर-मकान जलवा न दिया होता और यदि उनके लोग मेरे गोदामों के बगल में न बसे होते, उन्होंने हमारी नाली न काट दी होती और हमें नित्य परेशान न करते तो मैं यूँ अशान्त न रहता और शायद उपन्यास लिख ले जाता। चार वर्षों से लाख कोशिश करने पर मैं कुछ परिच्छेद भी नहीं लिख सका।”
उपेंद्रनाथ अश्क जी मानते थे कि पुलिस सुरक्षा समस्या का समाधान नहीं है। 11-03-1989 के ही पत्र में उन्होंने मुझे लिखा था, “मेरी समस्‍या सिक्‍योरिटी से हल नहीं हो सकती। सिक्‍योरिटी जब इन्दिराजी, ललित माकन और दूसरों की रक्षा नहीं कर सकी तो मेरी ही रक्षा कैसे कर सकती है? फिर यहाँ तीन-तीन गेट हैं। पुलिस कहाँ-कहाँ बैठेगी, मुझसे दूर-दूर के अहिन्‍दी प्रदेशों से लोग मिलने आते हैं, पुलिस बेकार उन्‍हें तंग करेगी और पुलिस द्वार पर बैठी हो तो घरवालों पर भी जोर पड़ता है। उनके चाय-नाश्‍ते की व्‍यवस्‍था तो करनी ही पड़ती है। होगा यह कि जो थोड़ी-बहुत शान्ति है, वह भी नष्‍ट हो जाएगी। एक बार अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से जीतकर लोकसभा में गए थे तो चूँकि ‘बच्‍चन फैन क्‍लब’ के तत्‍कालीन मन्‍त्री उमेश नारायण शर्मा एडवोकेट मेरे घर के निकट ही भुक्‍खल महाराज के बरबस हथियार बँगले (नम्‍बर 90) में रहते थे; भुक्‍खल महाराज के एडवोकेट थे, तत्‍कालीन एस.एस.पी. उमाशंकर वाजपेयी ने उन्‍हें भुक्‍खल महाराज में और हम में समझौता कराने के लिए कहा था। भुक्‍खन महाराज ने भी उन्‍हें ही मध्‍यस्‍थ नियुक्‍त किया था। मैंने अमिताभ बच्‍चन को पत्र लिखा और अनुरोध किया था कि वे उमेश नारायण शर्मा से कहकर मेरा मामला सुलटवा दें, ताकि मैं शान्ति से अपना लिखना जारी रख सकूँ। बच्‍चन न उमेशनारायण को कुछ कह सके, न भुक्‍खल महाराज को, जैसा कि अब सरकार कह रही है। उन्होंने मेरी सुरक्षा-व्‍यवस्‍था के लिए एस.एस.पी. को लिखा था। मैंने इनकार कर दिया, क्‍योंकि जैसा मैंने उपर्युक्‍त पंक्तियों में लिखा है, वह समस्‍या का हल नहीं है। इस समस्‍या के तीन ही समाधान हैं- 1.भुक्‍खल महाराज के वे लोग (राजकुमार मिश्र, उनके भाई तथा अन्‍य) जिन्‍होंने मकान लिया है (बाकायदा तो खरीद हुई नहीं, एक काग़ज़ लिखवा लिया है कि समय-समय पर इतना रुपया दिया है कि मकान लिया है और वही काग़ज़ सुनता हूँ रजिस्‍ट्री कर लिया है) हमसे किराया ले लें, चाहे तो कुछ बढ़ा लें और हमारी जान बख्‍श दें। 2. वह कॉटेज और उसके साथ के सागर पेशा क्‍वार्टर जिनके लिए उन्‍होंने 32,500 (बत्तीस हज़ार पाँच सौ) रु. दिया और जो खरीदने के बाद पिस्‍तौल लेकर हमला करने के दूसरे ही दिन बेचने आए थे। मुझे मुनासिब और न्‍याय संगत दाम पर बेच दें। तब मैं ख़रीदने के काबिल नहीं था, लेकिन मैं जे़वर वगैरह बेचकर और थोड़ा कर्ज़ बड़े भाई से लेकर खरीद लूँगा। 3. चूँकि अब भुक्‍खल महाराज मुझसे बहुत नाराज हैं और मकान नहीं बेचना चाहते, तब जैसा कि सरकार इस छोटी-सी जगह (जो मेरे ही बँगले का पिछवाड़ा है, जिसे मेरे पहले मकान मालिक ने पड़ोसी विश्‍वकर्मा बन्‍धुओं को बेच दिया था और चूँकि वह कॉटेज मेरी पत्‍नी के नाम एलॉट थी, इसलिए तब से हमारा गोदाम है) अधिग्रहण करके किस्‍तों पर मुझे दे दें। मैं किस्‍तों में दाम चुका दूँगा। सरकार हिन्‍दी का इतना शोर मचाती है, लाखों के इनाम बाँटती है। मैंने साठ वर्ष तक अनवरत हिन्‍दी की सेवा की है। क्‍या सरकार इतना भी नहीं कर सकती?”
उसी पत्र में उपेंद्रनाथ अश्क जी ने लिखा था, “क्‍या उत्तर प्रदेश की ‘हिन्‍दी प्रेमी’ सरकार को इस पर शर्म नहीं आएगी कि डॉ. सम्‍पूर्णानन्‍द ने जिस अहिन्‍दी भाषी लेखक को बिना माँगे अनुदान देकर उत्तर प्रदेश में बुलाया, तत्‍कालीन चीफ़ सेक्रटरी भगवान सहाय ने तत्‍कालीन जिलाधीश को लम्‍बा पत्र लिखकर वर्तमान कॉटेज एलॉट करवा के बसाया,  मेरी पत्‍नी को ऋण दिया,  प्रकाशन को रजिस्‍टर्ड किया,  काग़ज़ का लाइसेंस दिया और जिस  अहिन्‍दी भाषी लेखक ने उस ऋण को चुकाने के लिए 60 वर्ष तक अनवरत हिन्‍दी की सेवा करके लगभग 100 ग्रन्‍थ सभी विधाओं में लिखकर इलाहाबाद का नाम देश-देशान्‍तर में रौशन किया, उसको एलॉट की गई उस जगह को (जिसे स्‍मारक स्‍वरूप आनेवाली पीढ़ि‍यों के लिए सुरक्षित होना चाहिए) एक कुख्‍यात अपराधी बरबस छीनकर वहाँ अपनी आपराधिक सरगर्मियों का अड्डा बनाए। मैं आज चार वर्षों से परेशान हूँ। पंडित गोविन्‍दवल्‍लभ पन्‍त की सरकार ने मुझे उस वक्‍त जब मैं पंचगनी (महाराष्‍ट्र) के सेनेटारिया की यक्ष्‍मा से पीड़ि‍त था, बिन माँगे कवि निराला के साथ 5000 का अनुदान दिया और मैं यहाँ आया तो हर तरह से मेरी पत्‍नी की सहायता की। मैंने पंचगनी में बैठे अनुदान का पूरा रुपया माँगा तो सम्‍पूर्णानन्‍द जी ने अपने हाथ से प्‍यारा पत्र लिखकर मुझे पहले साल का पूरा रुपया वहाँ निकटस्‍थ ख़जाने में भिजवा दिया। मैं सोचा करता था कि मुझ उर्दू के पंजाबी लेखक पर जो केवल कुछ ही वर्ष पहले हिन्‍दी में लिखने लगा था, उत्तर प्रदेश सरकार ने कैसे इतनी कृपा की। बाद में डॉ. सम्‍पूर्णानन्‍द और पंडित गोविन्‍दवल्‍लभ पन्‍त से मिलने पर मैंने जाना कि वे लोग विद्वान, साहित्‍यप्रेमी, देशभक्‍त और हिन्‍दी के सच्‍चे हितैषी थे। उन्‍हीं की दूरदर्शिता का फल है कि उर्दू का मूर्धन्‍य लेखक 60 वर्षों तक अनवरत हिन्‍दी में लिखता रहा और उसने साहित्‍य की सभी विधाओं में दो-न-चार उत्‍कृष्‍ट ग्रन्‍थ रचे और देश-विदेश में हिन्‍दी के साथ इलाहाबाद का नाम गुँजाया। और आज हिन्‍दी की इतनी सेवा करने के बाद केन्‍द्र और प्रदेश में मुख्‍यमन्त्रियों और प्रधानमन्‍त्री से मिलने और सात दिन में मामले को सुलटा देने के वायदे पाने के बावजूद कुछ नहीं हुआ। मा‍फ़ि‍या सरगना ने मेरे पेट पर लात मार रखी है और अपने आतंक की तलवार मेरे सिर पर लटका रखी है।”
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