सिमरिया, जहां हर घर की दीवार पर लिखी हैं काव्य पंक्तियां!

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  • सिमरिया से दिल्ली लौट कर गोपेश्वर सिंह 
  • आप ने कोई ऐसा गाँव देखा है, जिसके हर घर पर कविता की कोई न कोई पंक्ति लिखी हो। क्या आपने किसी ऐसे कवि का गाँव देखा है जिसके हर घर की दीवार पर उसकी ही काव्य पंक्तियाँ लिखी हुई हों। जी हाँ, मुझे तो ऐसा गाँव देखने का सौभाग्य मिला है। मैंने देखा है, यह गाँव राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का सिमरिया है। पिछले 24 सितम्बर को वहाँ के लोगों के आमंत्रण पर मैं सिमरिया में था- दिनकर जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर। अन्य आमंत्रित लोगों में कवि मदन कश्यप, लेखक प्रफुल्ल कोलाख्यान, समाज विज्ञानी डीएम दिवाकर और दिनकर पुत्र केदारनाथ सिंह प्रमुख थे। गाँव वालों की विशेष भागीदारी के साथ बाहर से भी बहुत सारे दिनकर प्रेमी लोगों का वहाँ जुटान था। मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के हिंदी विभागाध्यक्ष चंद्रभानु प्रसाद सिंह अपने दो दर्जन छात्रों के साथ उपस्थित थे।

बरौनी स्थित दिनकर चौक पर स्थापित दिनकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद सिमरिया गाँव के लिए शोभा यात्रा शुरू हुई। आगे-आगे बैंड बाजा और पीछे सैकड़ों लोगों की भीड़। भीड़ में शामिल लोग ‘राष्ट्रकवि दिनकर अमर रहें’ और ‘महाकवि दिनकर अमर रहें’ के नारे लगा रहे थे। सिमरिया गाँव तक पहुँचते-पहुँचते भीड़ और बढ़ गई। गाँव की सड़कों से गुजरते हुए वह शोभा यात्रा दिनकर जी के घर पहुंची जहाँ उनके छोटे पुत्र केदारनाथ सिंह ने शोभा यात्रा का स्वागत किया। उसके बाद उन्होंने सबको दिनकर जी की प्रिय मिठाई जलेबी खिलाई। जलेबी खाकर हम सभी ‘दिनकर अमर रहें’ के नारे लगाते हुए दिनकर पुस्तकालय पहुंचे। पुस्तकालय के बड़े-से दिनकर सभागार में लगभग चार घंटे का कार्यक्रम हुआ। वहाँ दिनकर पुत्र केदारनाथ सिंह ने चादर ओढ़ाकर और माला पहनाकर मेरा स्वागत किया। दिनकर से संबंधित मेरी पुस्तक ‘कल्पना का उर्वशी विवाद’ के लेखक के रूप में मुझे याद किया गया।  मुझे सबकुछ अच्छा-अच्छा लगा।

पहली बार मैं सिमरिया 1993 में गया था. अवसर दिनकर जयंती का ही था। तब न तो दिनकर पुस्तकालय था न दिनकर सभागार। एक स्कूल के मैदान में शामियाना लगाकर सामान्य तरीके से दिनकर जयंती मनाई गई थी। वक्ता के तौर पर मैनेजर पाण्डेय भी थे और मैं भी। इन पच्चीस वर्षों में सिमरिया और वहाँ का सांस्कृतिक वातावरण इतना बदल चुका है कि बाहर वालों को सहसा विश्वास नहीं होगा। एक अर्थ में यह भारत का इकलौता ग्राम है। वहाँ जो आज पुस्तकालय और सभागार है वह जन सहयोग से बना है और चल रहा है। वहाँ जो हर साल आयोजन होता है वह भी जन सहयोग से होता है। सरकारी आयोजन भी होता है, जिला मुख्यालय बेगूसराय में। इस साल भी 23 सितम्बर को बेगूसराय में वह आयोजन हुआ जिसमें कवि अरुण कमल, बदरी नारायण आदि साहित्यकार शामिल हुए। सिमरिया का दिनकर जयंती समारोह एक दिन बाद होता है, जन सहयोग से होता है और इसमें किसी नेता-नेती को नहीं बुलाया जाता। वहाँ के लोगों ने बताया कि जब से इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम होने लगे हैं तब से सिमरिया और आस-पास के गाँव में अपराध कम हो गए हैं। मैंने यह भी देखा कि सभागार में लगभग पाँच हजार श्रोता थे। मैंने यह भी देखा कि जब मैं बोल रहा था तब लोग ध्यान से सुन रहे थे और सभागार में शान्ति थी। शोभा यात्रा में घूमते हुए मैंने यह भी देखा कि गाँव का एक भी घर ऐसा नहीं था जिसकी दीवार पर दिनकर की काव्य पंक्तियाँ न लिखीं हों। इस अवसर पर बेगूसराय जनपद के लिखने-पढ़ने वाले लोगों को सम्मानित किया जाता है। आस-पास के विद्यालयों में दिनकर काव्य प्रतियोगिता कराई जाती है और सफल विद्यार्थियों को पुरस्कृत किया जाता है। यह सब कुछ देखकर मैं विस्मित-विमुग्ध था। मैं सोच रहा हूँ कि काश भारत का हर गाँव सिमरिया होता। सिमरिया जाकर मैं अपने को बड़भागी समझाता हूँ। आमंत्रित किए जाने के लिए मैं मुचुकुन्द मोनू और उनके साथियों का आभारी हूँ। मैं सोचता हूँ कि आधुनिक हिंदी कविता के किसी कवि को ऐसा सौभाग्य क्यों नहीं मिला. दिनकर की जन्म धरती को बार-बार प्रणाम।

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अपने लगभग आधे घंटे के भाषण में मैंने वही बातें कीं जिनकी चर्चा मेरी  पिछली पोस्ट में थी। एक नई बात मैंने वहाँ यह की कि दिनकर भी प्रगतिशील कवि थे, लेकिन उनकी प्रगतिशीलता आयातित नहीं, भारतीय नवजागरण की उपज थी।

(लेखक दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिन्दी के प्रोफेसर हैं और बिहार के गोपालगंज जिले के निवासी हैं। यह लेख उनके फेसबुक वाल से साभार लिया गया है)

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