यूपी इन्वेटर्स मीटःकिसानों-किसानी पर बेमानी चर्चा

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लखनऊ में ‘इन्वेस्टर्स समिट’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तर प्रदेश के गन्ना, आलू, धान, गेहूं, सब्जियों और फल के रिकॉर्ड उत्पादन पर गर्व जताते हुए उद्योगपतियों को यूपी में पैसा लगाने के लिए लुभा रहे थे. उस समय इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के आलीशान सभागार में बैठे-बैठे मुझे फ्लैशबैक में विधानसभा के सामने गन्ना जलाते किसानों की तस्वीरें दिख रही थीं और मुख्यमंत्री के घर के सामने बिखरे और कुचले हुए आलू का दर्दनाक मंजर दिखाई दे रहा था. मंच से गर्वोक्ति का ऐसा प्रपंच किसानों के साथ-साथ उनकी पीड़ा समझने वाले संजीदा लोगों को गहरे आक्रोश से भरता है, तन और मन को अंदर तक दहकाता है. किसानों को हम उनकी फसलों की लागत तो दे नहीं पाते और बड़ी-बड़ी बातें बोल-बोल कर उद्योगपतियों को लुभाते हैं…
मंचों से ऐसी ‘ऊंची’ बोलियां अभी और तेज होंगी… अब तो फिर लोकसभा चुनाव आने वाला है. अभी पिछले ही साल तो विधानसभा का चुनाव बीता है. इस बीच भी कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. यानि चुनाव चुनाव चुनाव…. सत्तर साल से हम केवल चुनाव ही देखते रह गए. अब तो नेता पर चुनाव का खुमार देखते ही मगज पर बुखार चढ़ जाता है. यह बुखार पूरी जन-जमात तक पहुंचे, यही कामना है, जबरदस्ती थोड़े ही है. यह जो मैं लिख रहा हूं उसमें गद्य भी है, पद्य भी है, कविता भी है और अकविता भी… सब गड्डमड्ड, भारतीय लोकतंत्र जैसा. है तो बहुत ही अजीब मेरा यह सोचना. लेकिन आज के प्रसंग में बहुत ही वाजिब और सटीक है. चूकी यह बहुत ही वाजिब और सटीक है, इसीलिए बहुत ही अजीबोगरीब है.
…कि मैं मरे हुए गन्ने और सड़क पर फेंकी गई फसलों की लाशें ढो रहा हूं,
कि मैं सियासत के गंदे पैरों से कुचली गई खेतों की मेड़ों को नमामि-गंगे से धोने का जतन कर रहा हूं,
कि मैं उन खेतों में नाखून से हल चला कर लोकतंत्र के बीज बोने की कोशिश कर रहा हूं,
अजीब तो हूं ही मैं…
कि मेरी भृकुटियां बगावत करती हैं,
कि मेरे नथुने राष्ट्र-समाज को नष्ट करने वाले नेताओं को देख कर फड़कने लगते हैं,
कि मेरे पैने नाखून खेत कोड़ना छोड़ कर मुंह नोचने के लिए उद्धत होने लगते हैं,
कि नेताओं के चेहरे और चोंचले मेरी आंखों के आगे जादू नहीं जगाते, असली और खौफनाक दिखते हैं,
कि जब भी फर्जी लोकतंत्र के बेमानी मतदान का वक्त आता है,
तो अपने ही खिलाफ मैं आंदोलन के लिए निकल पड़ता हूं,
अपने ही मत और अपने ही अधिकार के खिलाफ खड़ा हो जाता हूं,
मत का मतलब और अधिकार के औचित्य पर सवाल उठाने लगता हूं,
अजीबोगरीब तो हूं ही मैं.
मेरे उपजाए गन्ने से उनके जीवन में शक्कर की सुरसुराहट हो..!
मेरे खेत की सब्जियां कौड़ियों में उखड़ जाएं, उनकी बेशकीमती प्लेटों में वेश्या की तरह सज जाएं..!
मेरे खेत का अनाज उनके दलाल-स्टोर में बंधक बन जाए, उनकी कमाई, हमारी गंवाई का जरिया बन जाए..!
हमारी फसलें उनके पेट में पकें, हमारे पेट लोहार की धधकती भट्ठी की तरह तपें..!
हमारे पशुओं का दूध उनकी नस्लों को सुधारे, हमारी नस्लें स्वर्ग सिधारे..!
हम अपनी कसी मुट्ठियों में बंद वोट के बारूद से कब फाड़ेंगे छद्म-लोकतंत्र का फर्जी अंतरिक्ष..!
कब पूरा होगा अपनी जगती आंखों का सपना, तमाशबीन बन कर कब तक यूं ही होगा तकना..!
कहते हैं कि बसंत आ चुका है और होली आने वाली है…
होली जब भी आए, होलिका की आग भीतर चटख-चटख कर लगातार दहक रही है.
काश ऐसा हो कि नेता गांवों में वोट मांगने निकले तो बिन जुते खेतों में दफ्न अनाज की लाशें
अचानक एक साथ उठ खड़ी हों,
जले हुए गन्ने की आत्माएं एक साथ अचानक हुंकार कर उठें,
कि नेता राजनीति ही नहीं अपनी नस्ल तक भूल जाए.
ऐसा ही सोचता हूं, ऐसा ही मनाता हूं, अजीब और गरीब तो हूं ही मैं…
– प्रभात रंजन दीन
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