भाजपा की हालत- दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम

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  • विजय झा

कमोबेश यही स्थिति आज भाजपा की है। भाजपा ने लगातार नए Vote Bank की तलाश में अपने स्थायी Vote Bank- सवर्णों को नाराज कर दिया है। माना कि SC-ST Act मूल रूप से कांग्रेस ने थोपा था, लेकिन जब Supreme Court ने उसमें बदलाव लाए तो कोई कारण नहीं था कि भाजपा उसे मूल रूप में वापस लाती। खेल सीधा Supreme Court के फैसले पर खेला जाना चाहिए था, लेकिन तब भाजपा के नीतिकारों ने इसे एक मौक़ा समझा दलित Vote Bank में सेंध लगाने का और Supreme Court के फैसले को पलट दिया।

उसके बाद केंद्र के दबाव में योगी आदित्यनाथ ने चंद्रशेखर की बाकी बची सजा माफ़ कर दी। इसे कहते हैं भस्मासुर को मुक्त करना। चंद्रशेखर ने जेल से निकलते ही घोषणा की कि वह मोदी को बगैर अपदस्थ किये नहीं रहेगा। शुरुआत में बसपा और भीम आर्मी में तनातनी बनी, लेकिन तभी एक और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने मायावती को मनाया कि चंद्रशेखर जरूरी है। जिस तरह मायावती ने 25 सितम्बर को अपने को भारत का भावी प्रधानमंत्री बताया है, उन्हें हलके में लेना भारी राजनैतिक भूल होगी।

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याद रखें माया के वर्तमान लोकसभा में शून्य सांसद हैं, फिर भी वह हुंकार मार रही हैं। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी से करीब-करीब गठबंधन को मना ही कर दिया है। क्या माया जैसी राजनीति की चतुर खिलाड़ी बगैर किसी आधार के इतना कुछ कर रही है? मेवाणी, चंद्रशेखर और माया की गुटबंदी अब भाजपा के लिए नया सरदर्द बनने जा रही है। कम से कम उत्तर प्रदेश में तो भाजपा के लिए आसार अच्छे नहीं हैं।

हालाँकि इस गुटबंदी में भाजपा के लिए एक संतोषजनक सत्य यह है कि माया चंद्रशेखर को वह महत्त्व नहीं दे रही हैं, जो उसे मिलना चाहिए। इस वज़ह से चंद्रशेखर कभी भी बिदक सकते हैं। पर माया का इतिहास रहा है- अपने लाभ के लिए किसी भी सीमा तक गिर सकती हैं। यहाँ तो दलित उत्थान और एकता का नारा होगा, बाद में बेशक़ माया चंद्रशेखर को उखाड़ फेंकें। वैसे यही कुछ वह मेवाणी के साथ भी करेंगी, लेकिन फिलहाल यह गुटबंदी अमित शाह का सरदर्द है।

अमित शाह के साथ समस्या यह है कि वह वास्तव में अपने को चाणक्य का अवतार समझ बैठे हैं। शाह इस बात को बेशक झुठलाएं, लेकिन सत्य यही है कि भाजपा को पुनः आडवाणी ने खड़ा किया है। अटल जी के संन्यास के बाद आडवाणी ने शक्तिशाली Team का निर्माण किया, जो विरासत में नितिन गडकरी और राजनाथ सिंह जैसे प्रभावी संगठनवादी लोगों को मिला। राजनाथ बेशक एक कामयाब गृहमंत्री न बन पाए हों, लेकिन संगठन पर उनकी पकड़ बेहद मज़बूत थी। समस्या तब हुई, जब राजनाथ के संगठन में शाह को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बना दिया गया। अव्वल तो मोदी लहर, फिर लोगबाग केंद्र और राज्य दोनों सरकारों से असंतुष्ट और उस पर राजनाथ के बढ़िया संगठन का साथ। उत्तर प्रदेश में बाकी लुट ही गए। एकाएक शाह का कद बढ़ गया और राजनाथ के गृहमंत्री बनने से रिक्त हुआ अध्यक्ष पद मोदी की मेहरबानी से शाह की झोली में जा गिरा। शाह कभी जीतते रहे, कभी हारते रहे, लेकिन फिर पूर्वोत्तर राज्यों की जीत ने शाह का कद और बढ़ा दिया। वहाँ किसी ने यह गौर नहीं किया कि राम माधव भाजपा में आधिकारिक प्रवेश से पहले ही पूर्वोत्तर में जमे हुए थे और लगातार जनसंपर्क कर रहे थे। जीत का सेहरा हमेशा कप्तान के सर बंधता है। पूर्वोत्तर की सफलता ने शाह की दिल्ली और बिहार वाली पिटाई भुला दी।

बिहार तो अनदेखा करें, क्योंकि लालू और नीतीश दोनों ही शक्तिशाली हैं और जब दोनों साथ रहे, तब जो होना चाहिए था, वही हुआ। दिल्ली में 49 दिनों की सरकार के बाद भाग खड़े हुए केजरीवाल फिर से उठ खड़े हुए, लेकिन महज सात माह पूर्व तूफानी रूप से जीते मोदी की छवि को शाह भुना नहीं पाए। कहावत है- एक सफलता हजार असफलताओं को छुपा देती है।

शाह ने अब एक नया खेल शुरू किया- दूसरी पार्टियों से तोड़कर नेताओं को आयात करने का। उन्हें टिकट भी देना शुरू कर दिया, लिहाज़ा भाजपा के कैडर में असंतोष बढ़ने लगा। उस असंतोष से निपटने का शाह तरीका भाजपा की मूल भावनाओं के ऐन उलट था। शाह ने राज्य संगठनों को नेस्तनाबूद करना शुरू कर दिया। अपने चहेते बिठाने लगे। वे लोग संगठन के शीर्ष पर आ गए, जिनका मतदाताओं से कोई संपर्क कभी रहा ही नहीं। ऐसे लोग संगठन के कर्ताधर्ता बन गए, जो अपने सक्रिय कार्यकर्ताओं को पहचानते तक नहीं। प्रवक्ता घर से बयान देने लगे। प्रेस कांफ्रेंस की जगह प्रेस नोट्स ने ले ली।

शाह का अगला खेल अब भाजपा पर अधिक भारी पड़ रहा है। शाह ने नए Vote Bank की तलाश में पुराने और परखे हुए मतदाताओं की अनदेखी शुरू कर दी। सवर्ण, मध्य वर्ग और व्यापारी वर्ग भाजपा की शक्ति रहे हैं, लेकिन इन सबकी अनदेखी ने पूरे राजनैतिक समीकरण को उलट-पुलट कर रख दिया है। आज आलम यह है की भाजपा के कई नामचीन नेता, मुख्यमंत्री भी, यह कहने लगे हैं कि उन्हें सवर्णों के Votes की जरूरत नहीं है। मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है कि इंदिरा ने यही बयान गया (बिहार) में दिया था कि आप मुझे Vote नहीं भी देंगे तो भी मैं जीतूंगी। सन 1977 में चुनाव प्रचार के दौरान दिए गए इस बयान ने इंदिरा को धराशायी कर दिया। मोदी बेशक एक कामयाब और यदि सर्वे की मानें तो सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री हैं, पर सत्ता और मतदाताओं पर इंदिरा की पकड़ मोदी से बहुत बेहतर थी।

भाजपा जिन नामों, श्यामा प्रसाद मुखर्जी; दीन दयाल उपाध्याय; अटल बिहारी वाजपेयी या आडवाणी को अपने आदर्श बताती है, वे सभी सवर्ण थे या हैं। वाजपेयी ने भी आरक्षण की एक नीति बनाई थी, लेकिन कभी यह नहीं कहा कि सवर्ण मत हमें नहीं चाहिए। आज हालत यह है कि सवर्ण NOTA का पक्षधर हो रहा है। इसमें कांग्रेस और पाकिस्तान दोनों का हाथ संभव है, लेकिन क्या भाजपा ने यह विश्वास अपने मतदाताओं को दिलाया कि घबराओ मत, मैं आपके साथ हूँ। उलटे मखौल उड़ाने की कोशिश की जा रही है। सवर्णों में भय समा गया है। पता नहीं खबर सच है या महज अफवाह कि मोदी सरकार क़ानूनी तौर पर निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण शुरू करने जा रही है। अब तक इसका कोई खण्डन नहीं आया है। इसलिए, सच ही होगा। एक जगह बची थी, वह भी छीन लोगे क्या, सत्ता के लिए? अब यह नाद सुनाई दे रहा है।

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