जन्मदिन पर विशेषः एलके आडवाणी, अरमां अधूरे रह गये

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  • नवीन शर्मा

लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति के सबसे चर्चित और प्रतिभावान राजनेताओं में से एक हैं। वे प्रधानमंत्री पद के भी सबसे योग्य उम्मीदवार रहे हैं, लेकिन शायद उनके भाग्य में पीएम बनना नहीं लिखा था। यही वजह है कि भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में खड़ा करने में सबसे निर्णायक भूमिका निभाने वाले आडवाणी को  उपप्रधानमंत्री पद तक ही संतोष करना पड़ रहा है। 8 नवंबर, 1927 को वर्तमान पाकिस्तान के कराची में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता केडी आडवाणी और मां ज्ञानी आडवाणी थीं। विभाजन के बाद आडवाणी अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गए थे। वर्ष 1951 में डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। सन 1957 तक आडवाणी पार्टी के सचिव रहे।

आर्गेनाइजर में पत्रकार 

देश विभाजन के बाद आडवाणी ने राजस्थान और दिल्ली में आरएसएस के प्रचारक के रूप में काम शुरू किया था। जब इनके पिता रिटायर होनेवाले थे तो परिवार की जिम्मेदारी संभालने के लिए उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के सुझाव पर संघ के मुखपत्र आर्गेनाइजर में काम शुरू किया। 1947 में स्थापित अंग्रेजी पत्र आर्गेनाइजेर के संपादक केआर मलकानी थे। आडवाणी ने 1960 में सहायक संपादक के रूप में काम शुरू किया। उन्हें 350 रुपये प्रति माह मिलते थे। आडवाणी अपनी आत्मकथा में बताते हैं कि इस पेशे का वास्तविक लाभ मुझे 1962 में आरकेपुरम में सरकारी आवास के रूप में मिला। वे तीन अलग उपनामों से तीन स्तंभ लिखते थे। उनमें नेत्र नाम से सिनेमा पर भी नियमित स्तंभ लिखते थे। 1961 में मलकानी जब हावर्ड विवि की फेलोशिप पर अमेरिका गए तो आडवाणी कार्यकारी संपादक बन गए।

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दो लोगों के इनकार के बाद बने जनसंघ अध्यक्ष

वर्ष 1973 से 1977 तक आडवाणी ने जनसंघ के अध्यक्ष का दायित्व संभाला। आडवाणी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जुड़े रहे हैं। उन्होंने दिल्ली व राजस्थान में इसके प्रचार-प्रसार का काम किया था। 1971 के चुनाव के बाद  जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने अध्यक्ष पद छोड़ना चाहा तो उन्होंने आडवाणी को अध्यक्ष बनने के लिए कहा, पर आडवाणी राजी नहीं हुए। इस पर उन्होंने पूछा- किसे बनाया जाए, तो आडवाणी ने राजमाता विजयाराजे सिंधिया का नाम सुझाया। उनसे बात की गई तो अपने गुरुजी की सलाह पर उन्होंने इनकार कर दिया। इसके बाद डॉ. भाई महावीर को प्रस्ताव दिया गया, पर वे भी पत्नी की सलाह के बाद अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हुए। इसके बाद आखिरकार आडवाणी अध्यक्ष बनने को राजी हुए, जबकि उनसे कद्दावर कई नेता संघ में थे। आडवाणी को अध्यक्ष बनने में झिझक इस बात को लेकर भी थी कि वे अच्छे लेखक तो थे, लेकिन अच्छे वक्ता नहीं थे। इस पर अटल जी ने दीनदयाल जी का उदाहरण देकर समझाया था।

ज्योतिषी ने की थी जेल की भविष्यवाणी 

आडवाणी आत्मकथा में लिखते हैं कि उन्हें ज्योतिष पर ज्यादा यकीन नहीं था। जनसंघ के महाराष्ट्र के एक नेता थे डॉ. वसंत कुमार पंडित। वे 1977-84 तक राजगढ़ से लोकसभा के सदस्य रहे। इन्हीं ने आपातकाल के ठीक पहले आडवाणी से कहा था कि हम लोग दो वर्ष के लिए निर्वासित होनेवाले हैं। 1975  जून में आडवाणी को 19 महीने के लिए जेल जाना पड़ा। उन्हें बेंगलोर जेल में बंद किया गया था।  वर्ष 1977 से 1979 तक पहली बार जनता पार्टी की सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री रहे। उनका फिल्मों तथा साहित्य से लगाव रहा है।

भाजपा के अध्यक्ष बने, सोमनाथ से रथयात्रा निकाली

वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना के बाद से 1986 तक लालकृष्ण आडवाणी पार्टी के महासचिव रहे। इसके बाद 1986 से 1991 तक पार्टी के अध्यक्ष पद का उत्तरदायित्व भी उन्होंने संभाला।

वर्ष 1990 में राम मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा निकाली। आडवाणी को यात्रा के बीच में ही बिहार में गिरफ़्तार कर लिया गया था। इस यात्रा के दौरान पूरे देश में राममंदिर आंदोलन को लेकर भावनाओं का तूफान उफान पर था। आडवाणी का रथ रांची से भी गुजरा था। इस दौरान रात में रांची के अल्बर्ट एक्का चौक पर उनकी सभा हुई थी। इसी दौरान पहली बार उन्हें सुनने का मौका मिला था। अटल जी के बाद वाकई में आडवाणी भी अच्छे वक्ता लगे थे।

इस रथयात्रा ने लालकृष्ण आडवाणी की लोकप्रियता को चरम पर पहुंचा दिया था। इसी का नतीजा था कि राममंदिर आंदोलन का सहारा लेकर 1984 के लोकसभा  चुनाव में महज दो सीटें जीतनेवाली भाजपा ने लंबी छलांग लगाते हुए वर्ष 1990 में 85 तथा 1991 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद हुए चुनाव में 120 सीटें हासिल कर लीं। इसके साथ ही कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई थी। पार्टी के इस विस्तार में लालकृष्ण आडवाणी का योगदान सबसे अधिक रहा है।

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लालकृष्ण आडवाणी तीन बार भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं। वे चार बार राज्यसभा के सदस्य बने। वहीं पांच बार लोकसभा का चुनाव जीत कर सांसद बने।

गृहमंत्री और उपप्रधानमंत्री की महती जिम्मेदारी

वर्ष 1999 में केंद्र में एनडीए की सरकार बनी। इसमें अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे। वहीं आडवाणी केंद्रीय गृहमंत्री बने। इसी सरकार में उन्हें 29 जून 2002 को उपप्रधानमंत्री पद का दायित्व भी सौंपा गया। आडवाणी की कट्टर हिंदू छवि के कारण अटल को एनडीए के सर्वमान्य नेता बनने का मौका मिला था। खैर, उनका दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस नरेंद्र मोदी को उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के विरोध के बावजूद गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उसी मोदी ने उन्हें पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में डाल कर बहुत ही करीने से किनारे लगा दिया।

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