अमिताभ को बनारसी पान खिलाने वाला गंगा किनारे का छोरा अंजान

0
682

जन्मदिन पर विशेष

  • नवीन शर्मा

अमिताभ बच्चन की डॉन फिल्म के मशहूर गीत खाईके पान बनारस वाला ने हिंदी सिनेमा के गानों की दुनिया में तहलका मचा दिया था। इस गीत को लिखने वाले अंजान ने नई शैली और अपनी ठेठ बनारसी बोली में गीत लिख कर एक नया ट्रेंड शुरू किया था। इनके पहले हिंदी सिनेमा के गीतों में उर्दू-फारसी के शब्दों का ज्यादा इस्तेमाल करनेवाले शायरों का ही बोलबाला था। अनजान ने कई फिल्मों के लिए गाने लिखे।

28 अक्टूबर 1930 को बनारस मे जन्मे अंजान का बचपन  से शेरो शायरी के प्रति गहरा लगाव था। वे बनारस में आयोजित कवि सम्मेलन और मुशायरों  में हिस्सा लिया करते थे। हालांकि मुशायरों में भी वह उर्दू का इस्तेमाल कम ही किया करते थे। एक बार गायक मुकेश बनारस आए हुए थे। वे मशहूर क्लार्क होटल में ठहरे थे। होटल के मालिक ने उनसे गुज़ारिश की कि वह एक बार अंजान की कविता सुन लें। मुकेश ने जब कविता सुनी तो वह काफ़ी प्रभावित हुए। उन्होंने अंजान को फ़िल्मों में गीत लिखने की सलाह दी। हालांकि उस वक्त अस्थमा  से जूझ रहे अंजान ने मुकेश की सलाह पर अमल नहीं किया, लेकिन बीमारी की वजह से आखिर उन्हें बनारस के पुरसुकून और ख़ुशगवार माहौल को छोड़कर मुंबई का रुख करना पड़ा।

- Advertisement -
अस्थमा ने मुंबई जाने को किया मजबूर

अंजान के बेटे गीतकार समीर ने  एक इंटरव्यू में बताया था कि पापा से डॉक्टरों ने कहा कि अगर ज़िंदा रहना है तो आपको यह शहर छोड़ना होगा। अस्थमा बहुत बढ़ गया था और उन्हें काफ़ी तकलीफ़ देने लगी थी। डॉक्टरों ने मशविरा दिया कि अगर किसी सागर के तट पर जाएंगे, तभी अस्थमा कंट्रोल हो पाएगा। ड्राइ क्लाइमेट में रहेंगे तो बचने की संभावना बहुत कम रहेगी।

बीमारी और बेहतर आबो-हवा के लिए वे 1953 में मुंबई आ गए। उन्होंने मुकेश से मुलाक़ात की।  मुकेश ने उन्हें निर्देशक प्रेमनाथ से मिलवाया, जो अपनी फ़िल्म के लिए किसी गीतकार की तलाश में थे। अंजान ने प्रेमनाथ की प्रिजनर ऑफ गोलकोंडा के लिए गाने लिखे।  फिल्म के लिये  उन्होंने अपना पहला गीत- लहर ये डोले कोयल बोले..गीत लिखा, लेकिन वह कुछ खास पहचान नहीं बना पाये।

दस वर्ष तक चला पहचान बनाने का संघर्ष

अनजान ने अपना संघर्ष जारी रखा। इस बीच उन्होंने  कई छोटे बजट की फिल्में भी की, जिनसे उन्हें कुछ खास फायदा नहीं हुआ। अचानक ही उनकी मुलाकात जी.एस. कोहली से हुई, जिनके संगीत निर्देशन में उन्होंने  फिल्म लंबे हाथ के लिये- मत पूछ मेरा है मेरा कौन…गीत लिखा। इस गीत के जरिये वह काफी हद तक अपनी पहचान बनाने में  सफल हो गये। लगभग दस वर्ष तक मायानगरी मुंबई मे संघर्ष करने के बाद वर्ष 1963 मे पंडित रविशंकर के संगीत से सजी प्रेमचंद के उपन्यास गोदान पर आधारित फिल्म- गोदान- में उनके रचित गीत- चली आज गोरी पिया की नगरिया… की सफलता के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नही देखा।

गीतकार अनजान को इसके बाद कई अच्छी फिल्मों के प्रस्ताव मिलने शुरू हो गये। जिनमें बहारें फिर भी आएंगी, बंधन, कब क्यों और कहां, उमंग, रिवाज, एक नारी एक बह्चारी व  हंगामा जैसी कई फिल्में शामिल हैं। साठ के दशक में अनजान ने संगीतकार श्याम सागर के संगीत निर्देशन में कई गैर फिल्मी गीत भी लिखे। अनजान द्वारा रचित इन गीतों  को बाद में मोहम्मद रफी, मन्ना डे और सुमन कल्याणपुरी जैसे गायकों  ने अपना स्वर दिया।  इनमें मोहम्मद रफी द्वारा गाया गीत- मैं कब गाता….काफी लोकप्रिय भी हुआ था।

भोजपुरी फिल्मों के लिए भी लिखे गीत

अनजान ने कई भोजपुरी फिल्मों के लिये भी गीत लिखे। सत्तर के दशक में बलम परदेसिया का- गोरकी पतरकी रे मारे गुलेलवा…. गाना आज भी लोगों  के जुबान पर चढ़ा हुआ है।

अमिताभ बच्चन के साथ याराना रिश्ता रहा

अनजान के सिने करियर पर यदि नजर डालें तो सुपरस्टार अमिताभ बच्चन पर फिल्माये उनके रचित गीत काफी लोकप्रिय हुए थे। वर्ष 1976 में प्रदर्शित फिल्म दो अनजाने के- लुक-छिप लुक-छिप जाओ ना….गीत की कामयाबी के बाद अनजान का अमिताभ बच्चन से एक ख़ास रिश्ता बन गया था। उन्होंने अमिताभ की कई फ़िल्मों के लिए गाने लिखे। इनमें डॉन, मुकद्दर का सिकंदर, याराना, नमक हलाल और शराबी उनके करियर में मील का पत्थर रहीं। अंजान ने उनके लिये कई सफल गीत लिखे, जिनमें- बरसों पुराना ये याराना, खून पसीने की मिलेगी तो खायेंगे, रोते हुए आते हैं सब, ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना, खईके पान बनारस वाला जैसे कई सदाबहार गीत शामिल हैं ।

अनजान ने अपने तीन दशक से भी ज्यादा लंबे सिने करियर में लगभग 200 फिल्मों के लिये गीत लिखे। लगभग तीन दशकों तक हिन्दी सिनेमा को अपने गीतों से संवारने वाले अनजान 67 वर्ष की आयु में 13 सितंबर 1997 को सबसे अलविदा कह गये। अनजान की रूमानी नज्म आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं। अनजान के पुत्र समीर ने भी बतौर गीतकार फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी खास पहचान बनायी है।

यह भी पढ़ेंः और गांव की गंध छोड़ चल पड़े काली के देस कामाख्या

- Advertisement -