भारत यायावर अच्छे कवि के साथ ही संपादन कला में भी दक्ष

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भारत यायावर
भारत यायावर

भारत यायावर अच्छे कवि के साथ ही संपादन कला में भी दक्ष हैं। भारत यायावर ने महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली का संपादन बहुत श्रम के साथ किया। साहित्यकार और प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे ने उनके रचना कर्म और संपादन कला पर विवेचनात्मक टिप्पणी लिखी है।

  • कृपाशंकर चौबे
प्रो. कृपाशंकर चौबे
प्रो. कृपाशंकर चौबे

हिंदी को ‘झेलते हुए’, ‘मैं हूँ यहां हूँ’, ‘बेचैनी’, ‘हाल-बेहाल’ , ‘कविता फिर भी मुस्कुराएगी’ जैसे काव्य संग्रह देनेवाले भारत यायावर के लिए संपादन भी सर्जनात्मक कर्म जैसा रहा है। भारत यायावर ने महावीर प्रसाद द्विवेदी रचनावली का संपादन बहुत श्रम के साथ किया। यायावर एक धुनी खोजीराम हैं। इसका एक दृष्टांत उनकी संपादित पुस्तक ‘हिंदी की अनस्थिरताः एक ऐतिहासिक बहस’ है। उस बहस का सार संक्षेप यहां दिया जा रहा है।

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महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ के नवंबर 1905 के अंक में ‘भाषा और व्याकरण’ शीर्षक लिखकर अपनी भाषा चिंता जताई थी। उस लेख में द्विवेदी जी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र तक की व्याकरण की गलतियों पर टिप्पणी की है। द्विवेदी जी ने बाबू हरिश्चंद्र के जिस अवतरण का उदाहरण दिया है, वह है- “मेरी बनाई वा अनुवादित वा संग्रह की हुई पुस्तकों को श्रीबाबू रामदीन सिंह खड्गविलास के स्वामी का कुल अधिकार है और किसी को अधिकार नहीं कि छापै।”  भारतेंदु हरिश्चंद्र के इस वाक्य पर द्विवेदी जी की टिप्पणी है- “इस वाक्य में पुस्तकों के आगे कर्म का चिह्न को विचारणीय है। पुस्तकों को …स्वामी का कुल अधिकार है, यह वाक्य व्याकरण सिद्ध नहीं। यदि को के आगे छापने का ये दो शब्द आ जाते तो वाक्य की शिथिलता जाती रहती। फिर छापै के पहले एक सर्वनाम भी अपेक्षित है।”

महावीर प्रसाद द्विवेदी इसी लेख में राजा शिव प्रसाद, गदाधर सिंह, काशीनाथ खत्री, मधुसूदन गोस्वामी और बाल कृष्ण भट्ट के अवतरणों की गलतियां भी उद्धृत करते हुए उन पर टिप्पणी करते हैं। ‘हिंदी प्रदीप’ के संपादक बाल कृष्ण भट्ट के जिस अवतरण को द्विवेदी जी ने उद्धृत किया है, वह है- “जब तुम कुछ कर ही नहीं सकते तब मूंड़ मारकर घर क्यों नहीं बैठे रहते?”  इस पर द्विवेदी जी टिप्पणी करते हैं- “विचार्य्य शब्दों के प्रयोग में विधि निषेध का कुछ भी बंधन नहीं देख पड़ता। यहां तक कि जो के आगे कोई-कोई तब का भी प्रयोग करते हैं। भाषा की यह अनस्थिरता बहुत ही हानिकारिणी है।” द्विवेदी जी के इस एक शब्द अनस्थिरता को लेकर लंबा विवाद चला।

‘भारतमित्र’ के तत्कालीन संपादक बालमुकुंद गुप्त ने आत्माराम के नाम से दस लेख लिखकर द्विवेदी जी की तीखी आलोचना की। हर लेख के अंत में गुप्त जी अनस्थिरता के सवाल को खड़ा कर देते थे। पहली ही टिप्पणी के आखिर में में बाल मुकुंद गुप्त ने चुनौती दी कि द्विवेदी जी अनस्थिरता को व्याकरण से सिद्ध करें। दूसरी टिप्पणी के आखिर में गुप्त जी ने लिखा- “अनस्थिरता का क्या अर्थ है? स्थिरता और अस्थिरता के बीच में यह कहां से पैदा हो गई?” तीसरी टिप्पणी के आखिर में गुप्त ने लिखा कि “आशा होती है कि अगली हाजिरी तक द्विवेदी जी अनस्थिरता को व्याकरण से सिद्ध कर डालेंगे। दो सप्ताह में उन्होंने व्याकरण भली-भांति उलट-पुलट लिया होगा।” चौथी टिप्पणी के आखिर में गुप्त जी ने लिखा- “तीन सप्ताह हो गए अनस्थिरता का उद्धार आपने न किया। इसे जरा एक बार अपने व्याकरण की पोशाक पिन्हाकर सबके सामने लाइए।” पांचवीं टिप्पणी के आखिर में गुप्त जी ने लिखा- “कहिए अनस्थिरता की क्या दशा है? वह व्याकरण से सिद्ध हुई कि नहीं?” छठी टिप्पणी में गुप्त जी ने लिखा- “आशा है कि आपने अपनी अनस्थिरता को व्याकरण का लहंगा पिन्हाया होगा क्योंकि बहुत दिन हो गए।” सातवीं टिप्पणी में गुप्त जी ने लिखा- “अनस्थिरता का द्विवेदी जी के व्याकरण से क्या फैसला हुआ?” आठवीं टिप्पणी में गुप्त जी ने लिखा- “अनस्थिरता का फैसला झटपट हो जाना चाहिए क्योंकि वही सारी लिखा-पढ़ी की जड़ है।” नौवीं टिप्पणी में गुप्त जी ने लिखा- “अब तो आप अनस्थिरता का कोई ठौर ठिकाना कर दें।”

एक दूसरी टिप्पणी में गुप्त जी लिखते हैं कि द्विवेदी जी पहले सोचते रहे कि अनस्थिरता को हिंदी से सिद्ध किया जाए या संस्कृत से। कलकत्ते के टेंटेंराम (गोविंदनारायण मिश्र) ने जब बताया कि अनखानी, अनहोनी की तरह अनस्थिरता हिंदी से सिद्ध हो सकती है, तब द्विवेदी जी को भी यह कहने का साहस हुआ कि वह हिंदी से ही सिद्ध होती है। गुप्त जी के दसों लेखों के उत्तर भी द्विवेदी जी ने ‘सरस्वती’ के फरवरी 1906 के अंक में दिए। द्विवेदी जी ने लिखा- “भाषा की परिवर्तनशीलता के विषय में अस्थिरता की जगह अनस्थिरता शब्द लिखना अनुचित नहीं। अस्थिरता शब्द केवल स्थिरता के प्रतिकूल अर्थ का बोधक है। जो स्थिर नहीं है, वह अस्थिर है। परंतु जिसमें अतिशय अस्थिरता है, जिसमें अस्थिरता की मात्रा अत्यंत अधिक है, उसके लिए अनस्थिरता का प्रयोग हम अच्छा समझते हैं।” द्विवेदी जी के जवाब के बाद भी गुप्त जी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने ‘व्याकरण विचार’ और ‘हिंदी में आलोचना’ शार्षक लेख लिखकर द्विवेदी जी की फिर आलोचना की। तब गोविंदनारायण मिश्र सामने आए और उन्होंने ‘हिंदी बंगवासी’ में आत्माराम की टें टें शीर्षक से लेख लिखकर गुप्त जी की आलोचना की।

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किताब में अपनी संपादकीय टिप्पणी में भारत यायावर ने लिखा है कि डेढ़ साल तक चले उस ऐतिहासिक विवाद ने एक काम यह किया कि व्याकरणसम्मत भाषा और वर्तनी की एकरूपता के प्रति तब के लेखक व संपादक सजग-सचेत रहने लगे। आज वह सजगता है क्या?

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