नीतीश की चुप्पी किसी बड़े तूफान का संकेत तो नहीं

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मजार पर चादर चढ़ाने जाते नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

नीरज सिंह

पटना। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हफ्ते भर से चुप हैं। आधिकारिक तौर पर यही एक लाइन की सूचना छन कर बाहर आयी है कि वे फिलहाल अस्वस्थ हैं। बताते चलें कि महागठबंधन से बाहर निकलने और भाजपा के साथ सरकार बनाने के पहले भी नीतीश कुमार अस्वस्थ हो गये थे। वह स्वास्थ्य लाभ के लिए राजगीर चले गये थे। राजद से तनातनी के बीच उनकी हफ्ते भर की चुप्पी और बीमारी का नतीजा यह निकला कि लौटते ही जदयू महागठबंधन से बाहर आ गया और भाजपा के साथ गंठजोड़ कुछ ही घंटे में हो गया। देखते-देखते एनडीए की राज्य में सरकार बन गयी।

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तब नीतीश के महागठबंधन से बाहर आने का आधार बना था तेजस्वी के खिलाफ दर्ज हुआ मामला। नीतीश ने इशारों-इशारों में कहा था कि जिन पर आरोप लगे हैं, उन्हें जनता के बीच जाकर जवाब देना चाहिए। इस बार भाजपा से खटपट के बहाने तलाशने में नीतीश कुमार का जदयू जुट गया है और नीतीश खामोश हैं। जानने वाले बताते हैं कि जदयू में नीतीश के इशारे के बगैर पत्ता भी नहीं डोलता। अगर जदयू के नेता-प्रवक्ता यह कहते हैं कि नीतीश की अगुआई में बिहार में लड़ा जायेगा चुनाव, जदयू को दूसरा चेहरा कबूल नहीं तो यह मानना चाहिए कि नीतीश की सहमति के बगैर यह बयान नहीं आया होगा। इस खींचतान की अगली कड़ी बनी जदयू के एक प्रवक्ता का यह बयान कि भाजपा चाहे तो लोकसभा की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर सकती है। तीसरी कड़ी बनी योग दिवस पर जदयू का भाजपा या ऐसे किसी भी संस्था के आयोजन में शामिल न होना। नीतीश ने भी मुनासिब नहीं समझा। उनकी कोई सफाई या पक्ष-विपक्ष में कोई बयान तक नहीं आया। अलबत्ता वह तीन दिन पहले ईद के मौके पर होने वाले इफ्तारी के आयोजनों में टोपी पहने नमाज पढ़ते या इफ्तारी करते जरूर दिखे। साफ तौर पर भाजपा के ऊसूलों के विरुद्ध नीतीश का यह कदम माना जा सकता है।

बिहार को विशेष दर्जा देने की मांग, नीति आयोग की बैठक में या उससे पहले बिहार के हक की मांग, बिहार को विशेष दर्जा देने के लिए सर्वदलीय बैठक कराना जैसे नीतीश के कुछ कदम इस बात की ओर संकेत करते हैं कि जदयू-भाजपा में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। लालू प्रसाद को फोन करना भी कयास लगाने वालों को मौका देता है। इस बीच उनकी अस्वस्थता और खामोशी को देखते हुए यह साफ है कि वह भाजपा के साथ वह सरकार चलाना तो चाहते हैं, लेकिन भाजपा के मनबुताबिक खुद नहीं चलेंगे। सीटों का पेंच सबसे बड़ा सिर दर्द है जदयू के लिए। इसलिए किसी तूफान की आशंका से उनकार नहीं किया जा सकता।

 

 

 

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