गांव की संस्मरण कथा- सूरजमुखी के पीछे तितली और टोकरी में इन्द्रधनुष

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गांव की संस्मरण कथा की शृंखला शुरू की है वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार अरविंद चतुर्वेद ने। गांव की संस्मरण कथा की एक कड़ी आप पढ़ चुके हैं।
गांव की संस्मरण कथा की शृंखला शुरू की है वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार अरविंद चतुर्वेद ने। गांव की संस्मरण कथा की एक कड़ी आप पढ़ चुके हैं।
गांव की संस्मरण कथा की शृंखला शुरू की है वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार अरविंद चतुर्वेद ने। गांव की संस्मरण कथा की एक कड़ी आप पढ़ चुके हैं। पेश है एक और संस्मरण कथा।
  • अरविंद चतुर्वेद

जब पूरा गांव खा-पीकर फुरसत पा चुका होता और औरतें घर के सारे काम निपटाकर दो-तीन घंटे के लिए थोड़ा चैन की सांस ले पातीं, तब अलसाई उबासियों के बीच मेरे ननिहाल के पीछे वाले गांव से चलकर वे दोनों मियां-बीवी दोपहर ढले तीन बजे के आसपास आते थे। बांस की लचकदार बहंगी पर आगे-पीछे दो बड़ी और गहरी टोकरियों में मनिहारी का सामान लिए मनिहार और उनके पीछे उनकी बीवी। बहंगी की लचक से ताल मिलाती चाल और उसी से बंधी पीछे-पीछे लाल-पीली छींटदार साड़ी, नीला पेटीकोट और हरे ब्लाउज में दूध जैसी गोरी, पतले होठ, कजरारी आंखोंवाली बेहद दुबली चुड़िहारिन। हवा चलती तो उनके कपड़े फहराते थे। जैसे सूरजमुखी के पीछे रंग-बिरंगी तितली मंडराती चल रही हो। गांव की स्त्रियों-लड़कियों के मन में बसे स्थायी श्रृंगार के लिए संचारी भाव की तरह थीं चुड़िहारिन।

महीने-दो महीने में गांव का फेरा लगाने वाली यह मनिहार दंपति औरतों की दुनिया में एक हिलोर लेकर आती। मनिहार की बहंगी मेरे घर के दालान में उतरती थी। बहंगी की दोनों टोकरियां सामने रखकर चुड़िहारिन बैठ जाती थीं। मनिहार दरवाजे पर गमछे से पसीना पोंछते हुए चेहरे पर हवा करने लगते थे। मुझे पड़ोस के घरों में दौड़ा दिया जाता था, यह बताने के लिए कि चुड़िहारिन आई हैं। आधे घंटे में जब तक औरतों और लड़कियों का मजमा दालान में लगता, तब तक चुड़िहारिन एक स्पेशल पोटली में मां को ओठलाली, आलता, नाखून पालिश, अफगानी स्नो, टिकुली-बिंदी की चार-छह पत्तियां, सिंदूर की डिबिया, चोटी गूंथने वाली अच्छी चमकीली लच्छियां और चार सेट ब्रेशियर, जिसे हमारे गांव की औरतें बॉडी कहतीं, दे चुकी होती थीं।

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थोड़ी ही देर में चुड़िहारिन और उनकी दोनों टोकरियों के इर्दगिर्द औरतों और लड़कियों का झुंड जमा हो जाता था, तब किसी जादूगरनी की तरह तेजी से हाथ चलाते हुए वे टोकरी से एक-एक चीज निकाल कर दिखातीं। दो चोटी वाली लड़कियों के लिए लाल, पीले, हरे, सुनहरे फीते के गोले और छोटी बच्चियों के बालों में लगाने के लिए फुदने और क्लिप। छोटे और मझोले आकार के गोल व चौकोर आईना, कंघे-कंघियां, ओठलाली, आलता, बिंदियां वगैरह। एक टोकरी की गोलाई में लाल, हरी, काली, गुलाबी, नीली, सुनहरी चूड़ियों के गुच्छे और लाह के चटख-चमकीले कंगन, गोया टोकरी में सतरंगी इन्द्रधनुष कुंडली मारे पड़े हों जो कलाइयों में जाते ही मन के आकाश में तन जाएंगे।

चुड़िहारिन सबको सबकी पसंद के मुताबिक़ बड़े प्रेम से चूड़ियां पहनाती थीं- ए बहिनी, तोहार सांवली-सलोनी कलाई में ई गुलाबी और सुनहरी चूड़ियां खूब जंचेंगी। घूंघट काढ़े किसी औरत का हाथ खुद ही अपनी ओर खींचकर चुड़िहारिन कहतीं- बहुरिया की गोरी कलाइयों में तो कोई भी रंग हो, चूड़ियां फबेंगी ही फबेंगी। अधेड़ उम्र की किसी औरत से चुड़िहारिन मजाक-मजाक में बोलतीं- चाची तो पुरानी शौक़ीन हैं, जो कहेंगी, वही चूड़ियां पहनाऊंगी। किन्ही-किन्ही औरतों का मन इतना चंचल और अनिश्चित होता कि वे चूड़ियों का कोई एक रंग तय नहीं कर पाती थीं और दो-दो, चार-चार करके अलग-अलग रंगों की चूड़ियां पहनतीं। इसपर एक उम्रदराज मुंहफट काकी जरूर बोल देतीं- इन पर ढेर शौक चढ़ा है, चितकबरी चूड़ियां पहन रही हैं।

चुड़िहारिन हथेलियां दबा-दबाकर बड़ी सावधानी और निपुणता से दो-दो चूड़ियां एक साथ पहनातीं, फिर भी बीच-बीच में कुछ चूड़ियां पट-पट करके टूट ही जातीं। इससे चुड़िहारिन को कोई फर्क न पड़ता, वे दूसरी चूड़ियां उठा लेतीं। असल में सिल पर मसाला कूटने-पीसने, मूसल से ओखली में दाल छांटने, चकरी-जांता चलाने और कुएं की रस्सी से बाल्टियों में पानी भरने के कारण औरतों के पंजे चौड़े हो जाते हैं और हथेलियां तेल लगाने के बावजूद थोड़ी कड़ी और रूखी होती हैं। ऐसी हथेलियों को दबा-दबाकर कलाइयों तक साबुत चूड़ियां पहनाना एक बड़ा कौशल है। चुड़िहारिन कुशल तो थीं, इसके बावजूद कुछ औरतों के हाथ साबुन घुले पानी में भिगाने के बाद तेल लगाकर चूड़ियां पहनानी पड़ती थीं। किसी-किसी हथेली की पीठ पर खून तक चुहचुहा उठता था। मेहनती हाथों की तासीर और रंगत ही कुछ और होती है, वहां कल्पना के आकाश में तने नाजुक इन्द्रधनुष चूड़ियों की तरह चटखते-टूटते रहते हैं। चुड़िहारिन को यह खूब पता था।

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सिंगार-पटार की चीजें खरीद कर जब गांव की औरतें चली जातीं और चुड़िहारिन थोड़ी फुरसत में बची हुई चीजों को सहेज रही होती थीं, तब मां को वह मेरे ननिहाल वाले गांव की खोज-खबर देतीं। मां गांवभर की मामियों के बारे में पूछती और चुड़िहारिन एक-एक कर सबके घर का हाल बतातीं। कोई नई बात होती तो अपनी ओर से भी बता देतीं। उस समय मां और चुड़िहारिन के भीतर से शादी से पहले वाली दो किशोरी लड़कियां निकल आती थीं, जिनकी मुलाक़ात शिवरात्रि पर बघैला के पोखरे के पश्चिमी-उत्तरी भीटे के नीचे लगने वाले एकदिनी मेले में हुई थी। बघैला का मेला मुख्यतः जनाना मेला होता था, वहां शिवमंदिर में जल चढ़ाने आसपास के गाँवों से औरतें और लड़कियां जुटती थीं। वहीं पोखरे के भीटे के नीचे एक चादर पर सजाई मनिहारी की चीजों के साथ चुड़िहारिन भी अपनी मां के पास बैठी होती थीं। तभी से मां और चुड़िहारिन एक-दूसरे की सहेली थीं।

चुड़िहारिन जब चलने को होतीं तो मां उन्हें घर के भीतर से लाकर एक पोटली थमा देती- अगर घर में पक्की रसोई बनी हो तो पूड़ियां-कचौड़ी-पुए वगैरह, नहीं तो अचार और अमचूर ही सही। चलते-चलते चुड़िहारिन मेरा हाथ खींचकर हर बार एक काला गंडा कलाई में बांधतीं।

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एक बार चुड़िहारिन को निकलने में देर हो रही थी, उन्होंने पीने को पानी मांगा तो दौड़कर मैं एक गिलास पानी ले आया। हड़बड़ी में चुड़िहारिन ने गटागट पानी पीया, फिर हैरानी से कहा- अरे भइया, हम मुसलमानिन त तोहरे गिलास में पानी पी गए। मां बोली- कौनो बात नाहीं, ई गिलास हम रखि देब, अब से तूं एही गिलास में पानी पीया। मुझे बड़ा धक्कामार अचरज हुआ कि मां के बताए मुताबिक़ जिस चुड़िहारिन को मैं अपनी मौसी मानता था, उन्हें हमारे बर्तन में पानी नहीं पीना चाहिए। तबतक मैं नहीं जानता था कि हमारे बर्तन मुसलमानी नहीं होते।

चुड़िहारिन के जाने के बाद गांव के बीचोबीच चौरी माई की संझा-बत्ती के लिए औरतें निकलतीं तो उनकी कलाइयों में नई चूड़ियों की खनक होती। आंखों में काजल लगे छोटे बच्चे और बच्चियों के सिर पर बालों में गुंथे रंग-बिरंगे फीते और फुदने उनके चक्कर  काटने और उछल-कूद से ऐसा दिखते, जैसे तितलियां मंडराती हुई उड़ रही हों। मैं चबूतरे पर बैठा देखता रहता था।

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