हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर एक वरिष्ठ पत्रकार के तल्ख विचार

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भारत का पहला हिन्दी अखबार
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वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र मिश्र

हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर एक वरिष्ठ पत्रकार के तल्ख विचार आप भी पढ़ें। पत्रकारिता में जिन्हें बेबाकी की तलाश है, वे तो अवशय पढ़ें। तकरीबन पांच दशक से पत्रकारिता में अपना जीवन खपाने वाले पत्रकार का अनुभव यकीनन तब और अब की पत्रकारिता का फर्क ईमानदारी से महसूस करता होगा। हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर वरिष्ठ पत्रकार देवेंद्र मिश्र ने अपनी टिप्पणी फेसबुक पर चस्पा की है। उन्होंने लिखा हैः

प्रेस और कैसी उसकी स्वतंत्रता, जब सब कुछ बाजार के द्वारा नियंत्रित हो रहा है। पूंजीपतियों, बिल्डरों, शराब सिण्डिकेटों के निवेश ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के मूल तेवर को जमकर प्रभावित किया है। जाहर सी बात है कि इन हालात में पत्रकारिता और प्रेस से ईमानदारी की कल्पना बेमानी है।

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कोबरापोस्ट के हाल के स्टिंग ‘आपरेशन-136’ ने साबित किया है कि खबरों के कारोबार की कहानियां बड़ी रोचक और अंतर्विरोधों से भरी हुई हैं। ‘आपरेशन-136’ इस तथ्य की तस्दीक करता है कि अब पत्रकारिता जगत के मुख्यधारा के मीडिया हाउसों को राष्ट्र निर्माण का हिस्सा बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। विडंबना यह है कि विखंडन की किसी साजिश का अंग बनने को लेकर भी कोई हिचक नहीं है।

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दीगर है कि अखबारों/पोर्टलों/ इलेक्ट्रॉनिक चैनलों ने गांवों तक प्रवेश करके आम जनमानस को ताकतवर बनाया है। पाठकों और दर्शकों के साथ पत्रकार भी ताकतवर बनें। पत्रकारों का रसूख बढ़ा है, पर सम्मान कम हुआ है। पूर्व का ‘प्रशंसा-भाव’ बढ़ऩे के बजाय कम क्यों हुआ? शायद इसका सबसे बड़ा कारण पत्रकारों की आजीविका का असुरक्षित होना है। आखिर जब असुरक्षित हो आजीविका, तो कैसे आजाद होंगे कंठ और कलम?

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यह सर्वविदित है कि मीडिया जगत में वेतन की विसंगतियां बड़े पैमाने पर व्याप्त हैं। पगडण्डी और खड़ंजे से खबर बटोर कर लाने वाले संवाद सूत्र से लेकर रात के अंधेरे में खबरों के जंगल में भटकता उप संपादक महंगाई के इस युग में न्यूनतम वेतन पर अपनी सेवाएं देने को मजबूर है। जो मजबूर होगा, उसकी मजबूती की बात कैसे सोची जा सकती है।

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