राजकिशोर को लोगों ने दी भावपूर्ण श्रद्धांजलि

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वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर निधन पर साहित्यकारों, पत्रकारों, प्राध्यापकों ने अलग-अलग तरीके से भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। पेश हैं उनके उद्गार, जो सोशल मीडिया पर उन्होंने व्यक्त किये हैं।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर गोपेश्वर सिंह ने लिखा है- आज शाम (4 जून) पांच बजे दिल्ली के निगम बोध घाट पर राज किशोर जी को अंतिम विदाई दी गई ! दिल्ली के पत्रकार , लेखक , अध्यापक और युवा बड़ी संख्या में इस अंतिम यात्रा में शामिल होने पहुँचे ! हमारे समय की हिंदी पत्रकारिता की सबसे योग्य और नैतिक आवाज अब हमें सुनने को न मिलेगी ! ‘रविवार’, ‘परिवर्तन, ‘ नव भारत टाइम्स , ‘रविवार डाइजेस्ट ‘ आदि पात्र – पत्रिकाओं में काम करते हुए राज किशोर जी ने जनपक्षधर पत्रकार की ऐसी पहचान बनाई, जिसकी बराबरी में शायद ही किसी को रखा जाए !
राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखी या संपादित उनकी किताबों से हिंदी की दुनिया कई अर्थों में समृद्ध हुई !
वे लगातार लिखने वालेऔर जनता को झकझोरतेरहने वाले वैचारिक योद्धा थे !
सोशल मीडिया पर भी वे निरंतर वैचारिक संघर्ष करते रहे !
उन्होंने कविता , उपन्यास , व्यंग्य आदि विधाओं में भी रचनात्मक योगदान दिया, लेकिन उनका मुख्य क्षेत्र राजनीतिक और सामाजिक विषय पर किया गया उनका विशाल लेखन है |
1947 में उनका जन्म कोलकाता में हुआ | वहीँ उनकी शिक्षा – दीक्षा हुई और वहीँ से उन्होंने पत्रकार जीवन की शुरुआत की | बाद में वे दिल्ली आ गए |
पिछले कई वर्षों से देश की समस्याओं से वे चिन्तित थे और नयी राजनीतिक पहलकदमी की बात करने लगे थे |
विचारों से वे समाजवादी थे | समाजवादियों में डॉ लोहिया उनके प्रिय थे \ लेकिन सचाई का आग्रह उनके भीतर इतना प्रबल था कि इसको कभी उन्होंने पग – बाधा न बनने दिया |
समता और धर्मनिरपेक्षता में उनकी अटूट आस्था थी | इन मूल्यों के लिए वे जीवन भर प्रतिबद्ध रहे |
उन-सा खरा और बेबाक बौद्धिक व्यक्तित्व हिंदी में दुर्लभ है !
इसी 22 अप्रैल को उन्होंने अपने एकमात्र बेटे को खोया था ! उस सदमें को वे झेल नहीं पाए और आज हमेशा के लिए महा यात्रा पर निकल गए !
विमला जी और बेटी अब अकेली पड़ गयीं !
अपने इस प्रखर बौद्धिक साथी को विदा देते हुए वर्षों का संग – साथ तो याद आया ही , यह भी याद आता रहा कि अभी कितना कुछ करने की उनकी योजनायें थीं !
विदा साथी राज किशोर ! आप हमें हमेशा याद आएँगे !

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वरिष्ठ पत्रकार ओमप्रकाश अश्क नेे कविता के माध्यम से उन्हें विदाई दी है-

अजब यह संयोग है
या कहें विधि का विधान इसे,
आने वाला जाता ही है।
आता भी अकेले और
जाता भी अकेले है।
बड़े जा रहे हैं,
बूढ़े जा रहे हैं,
बाज दफा नौजवान भी
चले जाते हैं,
न चाहते हुए भी।
किसी का घर सूना होता है,
कहीं घर का कोई कोना;
समाज भी सूना होता है,
जीवित रह जाते
उसके विचार,
व्यवहार की स्मृतियां;
तभी तो कई मरे लोग
गांधी जैसे
आज भी जिंदा हैं।
आप अब भी जिंदा हैं
आगे भी जिंदा रहेंगे
राजकिशोर जी!
क्योंकि कृति और विचार
कभी मरते नहीं।

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