कोर्ट का फैसला कारगर हो पायेगा केजरीवाल के रहते?

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सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर आम आदमी पार्टी की सरकार चाहे जितने भी दावे करे, लेकिन यह फैसला उलझन बढ़ाने वाला है। मसलन सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली सरकार अधिनियम 1991 के मुताबिक दिल्ली के प्रशासक उपराज्यपाल ही है, लेकिन वे हर मामले में टांग नहीं अड़ाएंगे। लेकिन अगर मतभेद होगा तो मामले राष्ट्रपति के पास जाएंगे।

फैसले के मुताबिक दिल्ली विधानसभा कानून-व्यवस्था, पुलिस और भूमि के अलावा दूसरे मामलों पर ही कानून बना सकती है। यानी इन विषयों में उसकी कोई भूमिका नहीं रहेगी। दिलचस्प यह है कि अधिनियम में पहले से ही ये बातें उल्लिखित हैं, सुप्रीम कोर्ट ने कोई नयी व्याख्या की ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने यह जरूर कहा है कि दिल्ली सरकार, अधिकारियों और उपराज्यपाल को मिलजुल कर काम करना चाहिए। वैसे भी कोई बड़ी और जिम्मेदार संस्था यह कह ही नहीं सकती कि इन्हें मिलजुल कर काम नहीं करना चाहिए।

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इन अर्थों में भी यह कहना कि फैसला ऐतिहासिक है, सही नहीं होगा। वैसे इस फैसले के बाद भी गुंजाइश है कि मामले लटकें। क्योंकि केजरीवाल सरकार का काम करने का जो तरीका है, उसमें मतभेद होंगे ही और उपराज्यपाल चाहें तो मतभेद की हालत में मामले राष्ट्रपति को भेजते रहेंगे। इस फैसले के बाद भी विवाद का एक और बिंदु बचा रह जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हर फैसले में उपराज्यपाल की सहमति जरूरी नहीं है। लेकिन ये फैसले कौन से होंगे, सुप्रीम कोर्ट ने इसे स्पष्ट नहीं किया है। यानी कुल मिलाकर फैसला साफ नहीं है।

जाहिर है कि फैसले के बाद आने वाले दिनों में बेशक कुछ दिनों तक संघर्ष विराम रहे, लेकिन विवाद होंगे ही। आखिर में एक सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि दिल्ली में बीजेपी के पांच और कांग्रेस के 15 साल के शासन के दौरान ऐसे विवाद क्यों नहीं हुए, जबकि बीजेपी की तकरीबन पूरी राज्य सरकार ने कांग्रेस की सरकार के अधीन और बाद में दिल्ली की कांग्रेस सरकार ने शुरूआती पांच साल का कार्यकाल केंद्र की बीजेपी सरकार के ही अधीन काटा।

  • उमेश चतुर्वेदी
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