कभी नींदभर सोने को न मिला ठाकुरप्रसाद सिंह को

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कभी नींदभर सोने को न मिला ठाकुरप्रसाद सिंह को। ठाकुर प्रसाद सिंह के जीवन के आखिरी वर्ष शारीरिक दृष्टि से बहुत कष्ट में बीते थे। ठाकुरप्रसाद सिंह के जीवन पर प्रकाश डाला है प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे ने।
कभी नींदभर सोने को न मिला ठाकुरप्रसाद सिंह को। ठाकुर प्रसाद सिंह के जीवन के आखिरी वर्ष शारीरिक दृष्टि से बहुत कष्ट में बीते थे। ठाकुरप्रसाद सिंह के जीवन पर प्रकाश डाला है प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे ने।

कभी नींदभर सोने को न मिला ठाकुरप्रसाद सिंह को। ठाकुर प्रसाद सिंह के जीवन के आखिरी वर्ष शारीरिक दृष्टि से बहुत कष्ट में बीते थे। ठाकुरप्रसाद सिंह के जीवन पर प्रकाश डाला है प्रोफेसर कृपाशंकर चौबे ने।

  • कृपाशंकर चौबे
प्रो. कृपाशंकर चौबे
प्रो. कृपाशंकर चौबे

हिंदी को ‘हारी हुई लड़ाई लड़ते हुए’, ‘वंशी और मादल’, ‘महामानव’ जैसे काव्य संग्रह, ‘चौथी पीढ़ी’ जैसा कहानी संग्रह, ‘पुराने घर नए लोग’ और ‘प्रदक्षिणा’ जैसे निबंध संग्रह, ‘कुब्जा सुंदरी’ और ‘सात घरों का गांव’ जैसे उपन्यास और ‘हिंदी निबंध और निबंधकार’जैसी आलोचना पुस्तक देनेवाले ठाकुर प्रसाद सिंह के जीवन के आखिरी वर्ष शारीरिक दृष्टि से बहुत कष्ट में बीते थे। शारीरिक कष्ट के अलावा अपने एक और कष्ट को उन्होंने 1994 के शुरू में मुझसे साझा किया था।

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उन्होंने कहा था, “दिल्ली में इलाज के दौरान जिनसे सहयोग की आशा थी, उन्होंने खोज-खबर नहीं ली। भला हो पंडित विद्यानिवास मिश्र का जिन्होंने मेरी चिकित्सा से लेकर हर व्यवस्था एक भाई की तरह की।” मुझे 7-8-1992 को लिखे पत्र में ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखा था, “मैं 12 को लखनऊ रहूंगा फिर वहां से आगरे जाऊंगा चेकअप के सिलसिले में। वहां से दिल्ली।”

26-03-1993 के पत्र में उन्होंने लिखा, “मैं दिल्ली से लौटकर बेचैन पहले जैसा ही हूं। यह किस्सा बहुत दिन चलनेवाला नहीं।” 28-03-1993 के पत्र में उन्होंने लिखा, “आगरे में लगता है 1-2 अप्रैल तक रुकना पड़ सकता है। पहलेवाले डाक्टर कुछ प्रयोग कर रहे हैं। संभल गया तो दिल्ली जरूरत नहीं।” मुझे 12-05-1993 को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था, “मैं दिल्ली से फरवरी 8-9 को लौटा एक पक्ष पर काम करके तो अप्रैल 6-7 को ब्लड यूरिया-किडनी पर दबाव को लेकर फिर सर सुंदरलाल हास्पिटल में चला गया। तीसरी बार यानी 6 महीने में कुल ढाई महीने वार्ड सेवा। बस जूझ रहा हूं। नियति जानता हूं पर जितनी शक्ति है, लड़ना है।”

18-12-1993 के पत्र में उन्होंने लिखा, “मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ। मियां गालिब यह बात मेरे लिए ही कह गए हैं। दिल्ली आने पर विशेष काम नहीं है। यानी तीसरे आपरेशन की तैयारी।”

दिल्ली में जिनसे उन्हें उम्मीद थी, उनका सहयोग न मिलने का टीस लेकर ही 1994 के अक्तूबर महीने में ठाकुर भाई ने महाप्रस्थान किया। हजारीप्रसाद द्विवेदी पर मेरी संपादित पुस्तक में ठाकुर प्रसाद सिंह का एक संस्मरणात्मक लेख छपा है। उसका शीर्षक है ‘उस महागाथा का मैं भी एक पात्र हूं’। उसमें ठाकुर प्रसाद सिंह ने लिखा है, “अकेले मैं ही अपनी याद्दाश्त पर जोर डालूं तो द्विवेदीजी का एक उद्धरण कोश संकलित कर सकता हूं। उनके वे शिष्य जिन्होंने विधिवत उनके निकट बैठकर शिक्षा प्राप्त की है, यह कार्य मुझ जैसे अंगूठाविहीन एकलव्य से कहीं अच्छी तरह कर सकते हैं, बशर्ते वे अपने-अपने महाभारत से उबरें।”

ठाकुर प्रसाद सिंह ने अपने संस्मरण का समापन इन पंक्तियों के साथ किया था, “पंडित जी, तीस वर्षों के मेरे-आपके लंबे संबंध का यह समापन बिंदु नहीं है। मैं पिछले वर्षों से बार-बार आपके निकट आने का प्रयत्न करता रहा और हर बार नियति के क्रूर हाथ मुझे आपसे दूर कर देते थे। हिंदी विभाग में प्रवेश करने का मेरा प्रयत्न तभी असफल हुआ, जब आप उस विभाग के द्वारपाल थे। काशी नागरी प्रचारिणी सभा की सदस्यता से आपके अध्यक्ष पद पर होते ही वंचित किया गया। आज आपके अध्यक्ष रहते हुए भी मैं आपकी इच्छा के विरुद्ध हिंदी संस्थान के निदेशक पद से हटा दिया गया हूं और एक अनिश्चित भविष्य मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। न तो मेरी वंश परंपरा में कुछ है न मेरे बैंक खाते में उल्लेखनीय अंकों की मुद्रा। मेरा कोई अधिकार किसी पर नहीं है, न आप पर न आपके चारों ओर फैली इस दुनिया पर। मुझे विधिवत अध्ययन करने का अवसर नहीं मिला और जीवनभर मैं तुलसीदास की भांति बिछाते ही रह गया, नींदभर सोने का अवसर मुझे कभी नहीं मिला।” इस एक वाक्य में ठाकुर प्रसाद सिंह ने संक्षिप्त आत्मकथा ही लिख दी है। ठाकुरप्रसाद सिंह का आज (1 दिसंबर) जन्मदिन है। जन्मदिन पर उन्हें सादर नमन।

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