अब न आते हैं खत लिख कर, थोड़ा लिखना अधिक समझना

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मलिकाइन के पाती
मलिकाइन के पाती
  • मिथिलेश कुमार सिंह

आदमी बहुत आगे बढ़ चुका है। चांद, सूरज, मंगल, अमंगल- जाने कितने ग्रह-उपग्रह उसके रडार पर हैं। सूरज और चांद और जाने कितने असंख्य तारों की पूरी की पूरी जन्मकुंडली खंगाल रखी है उसने। पूरी दुनिया को उसने डिजिटल मोड पर डाल रखा है।

अमेरिका जाना हो तो खट एक बटन, फ्रांस जाना हो तो दूसरा, हिंदुस्तान के किसी गुफा-गह्वर की तलाश करनी हो तो तीसरा। कारनामे बहुत हुए हैं और फख्र कर सकने लायक कारनामे हैं ये। लेकिन इस रफ्तार ख़याली ने बहुत कुछ तोड़ा भी है।

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उसने हमसे हमारा स्वत्व छीन लिया। उसने हमारी औकात उस शेर की बना डाली, जिसके सारे दांत झड़ चुके हैं, जो चाहता तो है कि दहाड़े, लेकिन आवाज साथ नहीं दे रही। वह चाहता तो है कि वह जंगल जाए और शेरनियों को वंश वृद्धि की दावत दे, लेकिन पैर साथ नहीं दे रहे। तलवों में वो खम नहीं रहा।

इस भागाभागी और पूरी हतभागी दुनिया को अपना घर मान लेने के नये साइंटिफिक नजरिये ने हमसे हमारे रिश्तों की ऊष्मा छीन ली। अस्सी के दशक में पैदा हुए कितने बच्चों को (जो अब उम्र की ढलान पर होंगे) को पता है कि चिट्ठियां कभी हाथ से भी लिखी जाती थीं और उनके जवाब का बाजदफा महीनों इंतजार हुआ करता था।

‘जोग चिट्ठी लिखी’ से शुरू होकर ‘थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना’ पर खतम होने वाले ये ख़तूत कहां गायब हो गये? कहां गायब हो गये मोती जैसे अक्षर, चांद जैसे लिफाफे? कहां चली गयी वह बेकली? बूढ़े और रिटायर लोगों का फुल टाइम जाब हुआ करता था बैंक जाना, लंबी लाइनों में लगना, लगे रहना, क्लर्क की ठिठोली पर खीझ कर उसकी कई कई पीढ़ियों से आदमजात रिश्ते जोड़ना, ठेले और खोमचे वालों की नजरें चुराते हुए निकलना कि कहीं पिछली उधारी चुकाने का इसरार न कर बैठें।

कहां गयी वह बेचैनी? कहां गयी वह दीवानगी? कहां गया वह फितूर कि दुनिया की ऐसी- तैसी? चीजें उलट गयी हैं क्योंकि दिमाग और दिल के बीच संतुलन की जो बारीक रेखा हुआ करती थी, उसे साइंस की नयी खोजों और हाहाकारी उपलब्धियों ने तोड़ डाला है। हम एक तो हो गये, बहुत करीब भी चले आये, लेकिन कटे-फटे, मुड़े-तुड़े हो कर। या इलाही! क्या यही दिन देखना बदा था कि चांद-तारे मुट्ठी में और  दिलों के बीच वह दूरी जो पाटे नहीं पटे, दिगंतों का फासला?

निश्चिंत रूप से कहीं न कहीं बड़ी बेहूदा चूक हुई है। कुछ है जरूर जो बड़ा ही वाहियात है। आप भी सोचें इन सवालों पर, गोकि फुरसत मिल पाएगी- यह अंदाजा लगाना भी रिस्की है।

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