बिहार की पॉलिटिक्स समझनी हो तो जान लें ये बातें

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प्रेमकुमार मणि
प्रेमकुमार मणि
  • प्रेमकुमार मणि

आगे बढ़ने से पहले बिहार के बारे में हमें कुछ और जान लेना चाहिए। पिछले लगभग सौ साल में बिहार का भूगोल कई बार बदला। 1912 में यह बंगाल से अलग हो कर बिहार बना, जिसमें आज का झारखण्ड और उड़ीसा भी था। 1933 में उड़ीसा और 2000 में झारखण्ड इससे जुदा हो गया। आज के बिहार की आबादी लगभग साढ़े दस करोड़ है। 27 फीसद मर्द और 47 फीसद महिलाएं निरक्षर हैं। तकरीबन उनचालीस हज़ार गांवों और एक सौ तीस शहरों से गंथा-गुंथा बिहार मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है।  औद्योगीकरण बिलकुल नहीं हुआ है, बल्कि जो उद्योग-धंधे थे, वे भी ख़त्म हो गए। चीनी मिलें यहां काफी थीं, सब खत्म हो गयीं। डालमिया नगर, कटिहार, फतुहा, मोकामा आदि के सारे औद्योगिक ठिकाने ध्वस्त हो गए।

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नतीजा है कि बिहार की प्रति व्यक्ति औसत आमदनी भारत में सबसे कम है। प्रति व्यक्ति लगभग 38000 हज़ार रुपये। भारत के पिछड़े प्रान्त छत्तीसगढ़ से भी ढाई गुना कम। शिक्षा और स्वास्थ्य का स्तर बेहद कमजोर है। तमाम स्कूल-कॉलेज, यूनिवर्सिटियां, अस्पताल बदहाल हैं। ऐसे में यहां की सामाजिक स्थिति का आकलन करना कठिन नहीं है। दिन-रात जाति-बिरादरी, कुनबागीरी और जुगाड़ से कुछ कमा लेने की जुगत में लोग लगे रहते हैं। दुकानदारी के अलावा यहां के लोग ठीकेदारी, दलाली, ट्यूशन आदि को ही रोजगार मान कर बैठे हुए। नौजवानों में भयावह निराशा-हताशा है। यह अलग बात है कि यह गुस्से में नहीं बदल पाता। इसके लिए शायद सबसे अधिक जवाबदेह है तो यहां के लोगों की जातिग्रस्तता। क्योंकि बिहार के लोग जब यहां से बाहर जाते हैं तो तरक्की करते हैं। जाति एक ऐसी करेंसी है, जो बाहर में मूल्यहीन हो जाता है। इसलिए प्रान्त से बाहर जाता हुआ बिहारी नौजवान अपनी जाति यहीं छोड़ जाता है। बाहर जाकर ये अपनी मेधा का इस्तेमाल करते हैं। यहां रहकर रात-दिन अपनी जाति को सहलाते रह जाते हैं। इसीलिए मैंने बहुत पहले लिखा था कि बिहार को बदलना है, तो जाति को खत्म करो और इसे ख़त्म करने का एक ही उपाय है तेज औद्योगीकरण और शहरीकरण। गांव और खेती जातिवाद के आधार होते हैं। इनकी शस्य-श्यामलता एक व्याधि पालती है, जो इन्हें बढ़ने से रोकती है।.

जाति के व्याकरण को भी जान लेना बुरा नहीं होगा, क्योंकि स्थितियों को समझने में इसकी जरूरत पड़ सकती है। पूरे देश में जातिवार जनगणना 1931 के बाद नहीं हुई, लेकिन बाद की जनगणनाओं में भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों और मुसलमानों की गणना हुई। दोनों को मिलाकर जो सामाजिक ताना-बाना है उसके अनुसार बिहार में अनुसूचित जातियां और मुसलमान 16 .5 फीसद प्रत्येक, जनजाति और अन्य धर्मावलम्बी एक-एक फीसद, ऊँची जातियों की उपस्थिति 13 फीसद, उच्च पिछड़ा 20 फीसद और निम्न पिछड़ा 32 फीसद है।

कृषि उत्पादन पर केंद्रित समाज में भूमि का असमान वितरण बहुत मायने रखता है। वर्चस्व प्राप्त समाज के लोग उत्पादन के साधनों पर कब्ज़ा चाहते हैं, क्योंकि इसके बिना समाज पर दादागीरी नहीं चल सकती। बिहार में ज़मींदारी प्रथा थी। इस ज़मींदारी प्रथा ने धीरे-धीरे जातिप्रथा से गठजोड़ बनाया। कृषि भूमि का दो तिहाई हिस्सा गैर किसानों के पास था। ये न हल जोतते थे, न फाबड़ा चलाते थे। ये कृषि प्रबंधन का काम करते थे। जाति के हिसाब से ये ऊँचे कहे जाते थे। आजकल इन्हे सवर्ण कहने का प्रचलन हुआ है। गांवों में अन्य दलित-पिछड़ों की अपेक्षा इनकी स्थिति भले बेहतर हो, आधुनिकता ने इनकी भी कमर तोड़ दी थी। कृषि लाभकारी धंधा नहीं था। इसलिए कि आधुनिक तकनीकों का यहां इस्तेमाल नहीं हुआ था। जलप्रबंधन भी नहीं था। ऐसी हालत में गांवों में रहते-रहते भूमिधर किसान धीरे-धीरे दिमाग से जानवर बनने लगे। दादागीरी की रक्षा के लिए धर्म से लेकर हर तरह के छल-छद्म अपनाये।

इनका एक हिस्सा पढ़-लिख कर, आधुनिक शिक्षा से होशियार होकर शहरी हो गया। आरम्भ में इनलोगों ने बिहारी समाज में नवजागरण लाने का सद्प्रयास किया था। राजनीतिक स्तर पर कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट आंदोलनों की आधारशिला रखी थी। लेकिन कालांतर में इन्हीं शहरी द्विजों के एक काहिल हिस्से ने भूमि सेना, रणवीर सेना, कुंवर सेना आदि के प्रस्तावक बनने में दिलचस्पी ली। इन सेनाओं के सिपाही गांव में रहते थे और नेता-मंत्रदाता शहरों में। अपने चरित्र में ये सेनाएं जनतंत्र विरोधी, आधुनिकता विरोधी और जातिवादी थीं। हिन्दू देवता गणेश जैसे आधा जानवर आधा मनुष्य होता है, उसी तरह ये शहरी द्विज आधे ग्रामीण आधे शहरी बनते गए। यह सब अचानक नहीं हुआ था .इसके पुख्ता कारण थे।

गांवों से निकला यह शिक्षित द्विज तबका उत्पादन के आधुनिक मिहनत केंद्रित तंत्र से नहीं जुड़ा। आधुनिक पेशों से जुडा। लेकिन यहां भी कामचोर होने की गुंजाइश बना ली। शारीरिक परिश्रम वाले पेशों से जुड़ने में इसे तौहीन महसूस होती है। अफसर, वकील, डॉक्टर, अध्यापक, पत्रकार आदि के पेशों को यह अपने लायक समझता है। इन पेशों पर इनका लम्बे समय तक एकाधिकार रहा। इनमें आरक्षण का जब बट्टा लगा, तब ये बौखला गए। इनकी बौखलाहट विकृत रूपों में प्रकट होती है।

इन अर्बन द्विजों की वैचारिक टक्कर अमूमन उच्च पिछड़े वर्गों के उस हिस्से से होती है, जो येनकेन शिक्षित होकर अर्बन समाज का हिस्सा हुआ है। इनकी संख्या कम है और अर्बन द्विजों के निर्लज्ज जातिवाद का मुकाबला करने की प्रक्रिया में ये भी अक्सर जातिवादी और फूहड़ हो जाते हैं। जीने और सोच के स्तर को ये भी अर्बन द्विजों की तरह रखना चाहते हैं। इन सब का नतीजा यह हुआ है कि गांव का जातियुद्ध थोड़े संशोधनों के साथ शहरी जीवन में भी पहुंच गया है। अंतर यही है कि गांव में जाति है तो शहरों में जातियों से बना वर्ग। मसलन अपर कास्ट या बैकवर्ड कास्ट या दलित आदि।

उपरोक्त विवरण हमें बिहार की पॉलिटिक्स को समझने में किंचित सहायक होंगे। अब हम कायदे से अपने विषय पर आवें। हम भावी राजनीति की चर्चा कर रहे थे। हम धीरे-धीरे और इत्मीनान से चलें।
बिहार की राजनीतिक बिसात अभी क्या है। असेम्बली में स्थिति के अनुसार बात करें तो यहां राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल यूनाइटेड, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, लोक जनशक्ति पार्टी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, हिंदुस्तानी अवामी मोर्चा हैं। वाम दल मुख्यतः तीन हैं- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की भी उपस्थिति दिखती है। पप्पू यादव और शरद यादव के भी राजनीतिक कुनबे हैं। इन एक दर्ज़न से अधिक पार्टियों के अलावा भी कोई संघटन शेष रह गया हो, तो कोई आश्चर्य नहीं।

इन पार्टियों से बने मोर्चे बस दो हैं। पहला एनडीए, जो अभी बिहार और भारत पर सत्तासीन है और दूसरा इसके विरुद्ध महागठबंधन। एनडीए में भारतीय जनता पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, लोजपा और रालोसपा है। महागठबंधन में राजद, कांग्रेस और अवामी है। इनके साथ कम्युनिस्ट पार्टियां और बसपा भी होना चाहती हैं। इन्हीं दोनों गठबंधनों में टक्कर होनी है। तीसरा पक्ष नहीं है। (क्रमशः )

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