सरकार कहती ठीक है, पर बेहाल हैं बिहार में किसान

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पटना। बिहार के किसानों की बदहाली को सिस्टम ने मजाक क्यों बना लिया है। किसानों की किसी भी राजनीतिक पार्टी की चिंता नही है। हाल में तो केंद्रीय कृषि मंत्री ने किसानों के बारे में जो बयान दिया उससे किसान और मर्माहत हुए। यह सबको मालूम है कि पूरे देश में कृषि और किसानों की हालत तेजी से बद से बदतर होती जा रही है. किसानों के आत्महत्या करने की दर लगातार बढ़ती जा रही है. इस मामले में बिहार की स्थिति बेहतर है. 1995 से 2011 के बीच बिहार में 1318 किसानों ने आत्महत्या की है, जबकि महाराष्ट्र में 54 हजार 800 और मध्य प्रदेश में 28 हजार ने. देश में कृषि की बदतर हालत और लगातार इसमें आ रही गिरावट पर कृषि लेखक, पत्रकार और शोधशास्त्री पी सांईनाथ ने. वे एएन सिन्हा शोध संस्थान में ‘स्लमडॉग वर्सेज मिलियनेयर्स (विषमता के दौर में खेती और खाद्यान्न संकट)’ विषय पर आयोजित व्याख्यान में एक बार  उन्होंने कहा था कि 2001 से 2011 के बीच के आंकड़ों पर नजर डाले, तो प्रत्येक 32 मिनट में एक किसान ने आत्महत्या की है. किसानों के खुदकुशी करने की दर आम लोगों की तुलना में 47 फीसदी अधिक है. उन्होंने कृषि की बदहाली का सबसे बड़ा कारण बाजारवाद की बढ़ती दखल-अंदाजी और कॉरपोरेट घरानों का तेजी से बढ़ता कब्जा बताया. एक प्रतिशत लोग के पास देश की 49 प्रतिशत दौलत है. उन्होंने कहा कि पिछले तीन सालों से छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल यह दावा करने लगे हैं कि उनके यहां किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की. अचानक यह सुधार होने की बात समझ से परे है. उन्होंने भूमि अधिग्रहण जैसे कानून को भी कृषि क्षेत्र के लिए बेहद घातक बताया. उन्होंने यह भी  कहा कि देश में प्रति व्यक्ति अनाज की उपलब्धता लगातार घटती जा रही है. प्रत्येक पांच साल में इसमें काफी बड़ी गिरावट दर्ज की जा रही है. अनाज की उपलब्धता 1991 में 510 ग्राम प्रति व्यक्ति थी, जो 2010 में घटकर 444 ग्राम प्रति व्यक्ति हो गयी. 2001 की जनगणना की रिपोर्ट पर नजर डाले, तो पता चलता है कि खेती पर पूरी तरह से निर्भर रहने वाले लोगों की संख्या में 1.5 करोड़ की कमी आयी है. हर दो व्यक्ति रोजाना कृषि से जुड़े कार्य को छोड़ कर कोई अन्य रोजगार करने लगते हैं.

दरअसल कृषि ऋण का फायदा  बड़े व्यापारी उठाते है ।  कृषि ऋण का फायदा आजकल बड़े बिजनेस घराने या व्यापारी उठाते हैं. आरबीआइ के डाटा के अनुसार, 50 फीसदी कृषि ऋण गैर-कृषक लेते हैं. 2011 में महाराष्ट्र में 53 प्रतिशत कृषि लोन बैंकों की शहरी और मेट्रो क्षेत्र की शाखाओं ने जारी किया था. इनके लोन का आकार भी 10 करोड़ तक का था. 10 से 50 करोड़ के कृषि लोन लेने वालों की संख्या बढ़ी है.  खेती करने वाले किसानों को इतने अधिक रुपये लेने की जरूरत नहीं पड़ती है. मराठवाड़ा में मर्सिडिज बेंज लेने के लिए 7 प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मिलता है, जबकि ट्रैक्टर पर 14 प्रतिशत ब्याज लगता है. इससे साफ जाहिर होता है कि कृषि में पैसे की नहीं, नीति की जरूरत है.

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कृषि में बदहाली के मुख्य कारण यह है कि- कैश क्रॉप (नगदी फसल) उपजाने के प्रति तेजी से बढ़ती ललक – इससे अनाजों का उत्पादन तेजी से कम होता जा रहा है – कृषि का तेजी से होता जा रहा बाजारीकरण – कृषि उत्पादों पर मूल्य नियंत्रण निजी कंपनियों के माध्यम से करना – अच्छी नीतियों के स्थान पर कृषि ऋण को बढ़ावा देना – मनरेगा, जन वितरण प्रणाली जैसी योजनाओं को बर्बाद करना – पानी को बर्बाद करके इसका कृत्रिम संकट पैदा करना है। सरकार ऐसे मसलों पर ध्यान देती नही है।

IPS अरविंद पांडेय जी ने अपने फेसबुक वाल पर लिखा है 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य है तो उसके साथ खेतिहर मजदूरों की मजदूरी भी 4 गुनी रखने का लक्ष्य रखा जाना चाहिए। क्योंकि असली किसानी तो खेतिहर मजदूर ही करते हैं और किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी, आयकर में छूट आदि सारी सरकारी सुविधाओं में भी खेतिहर मजदूरों का कुछ हिस्सा होना चाहिए। जैसे आयकर में मिली कुल छूट का कुछ प्रतिशत उन्हें अपने खेतों में काम करने वाले मजदूरों के खातों में डालना होगा। इससे बिहार और उत्तरप्रदेश को विशेष फायदा होगा क्योंकि अधिकांश खेतिहर मजदूर इन्ही 2 राज्यों से होते हैं । जरूरत है सरकार किसानों की रीयल समस्या को समझे और ऐसी रणनीतिः बनाये जिससे किसान खुशहाल हो, आत्महत्या जैसे घातक कदम नही उठाये।

  • संतोष राज पांडेय
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