सड़  गई है हमारी जाति व्यवस्था

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भारतीय समाज में जाति व्यवस्था का काफी महत्व रहा है। ऐतिहासिक विकास क्रम में इसका भी विस्तार होता चला गया है। जाति व्यवस्था के उदभव की बात करें तो  इसकी जड़ें हमें वैदिक युग के समय से दिखाई देंगी। ऋग्वेद के दशवेंं मंडल के पुरुषसुक्त में वर्ण व्यवस्था का पहली बार विस्तार से वर्णन किया गया है। ब्रह्मा के शरीर के अलग-अलग अंगों से चार वर्णों की उत्पति के बात कही गई है। सिर से ब्रह्माण, भुजा से क्षत्रिय, मध्य भाग से वैश्य तथा पैर से
शुद्र की उत्पति मानी गई है।

वैदिक युग आज की तरह की जातियों की भरमार नहीं  थी। प्राचीन इतिहास में मेगास्थनीज ने  मौर्यकालीन समाज को सात भागों में विभाजित किया था।  वहीं कौटिल्य ने कई वर्णसंकर जातियों का उल्लेख किया है। ये जातियां चारों वर्णों के अनुलोम और प्रतिलोम विवाह से उत्पन्न हुईं। इनमें निषाद, रथकार, मागध, सूत, वेदेहक तथा चांडाल आदि शामिल हैं।  इनके अलावा तंतुवाय(जुलाहे) रजक(धोबी) दर्जी, सुनार, बढ़ई आदि व्यवसाय आधारित वर्ग भी जाति में तब्दील हो गए थे।

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ऊंच-नीच का भेदभाव महाभारत के शांति पर्व में भी दिखाई देता है। इसमें कहा गया है कि बढई, कर्मकार, रजक जैसी कारीगर जातियों का अन्न खाना ब्राह्मण के लिए अग्राह्य है। गुप्तकाल में यह भेदभाव ज्यादा स्पष्ट हो गया। इस काल के ग्रंथों में कहा गया है कि ब्राह्मण को शुद्र का अन्न नहीं ग्रहण करना चाहिए क्योंकि इससे आध्यात्मिक बल घटता है।
न्याय में भी वर्ण आधारित भेदभाव न्याय संहिता में कहा गया कि ब्राह्मण की परीक्षा तुला से, क्षत्रिय की अग्नि, वैश्य की जल से और शुद्र की विष से की जानी चाहिए। दंड विधान में भी भेदभाव था। उत्तर गुप्तकाल में जातियों की संख्या बढ़ती गई। अब चतुर वर्ण व्यवस्था ध्वस्त हो गई और जातियां ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो गईं। मध्यकालीन भारत में भी कमोबेश यहीं क्रम चलता रहा। जातियों के बीच ऊंच-नीच के दीवारें हम आधुनिक भारत यानि ब्रिटिश हुकूमत के शासनकाल में भी साफ तौर पर देख सकते हैं। खासकर दक्षिण भारत में यह खाई ज्यादा गहरी थी इसलिए दक्षिण में निम्न जातियों ने संगठित होकर अपने अधिकारों के लिए आंदोलन भी किए। तमिलनाडू और केरल में इस भेदभाव के विरोध में काफी संघर्ष हुआ। अछुत या हरिजनों की स्थिति ज्यादा बदतर थी इनको मंदिरों में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। ये गांव की मुख्य बस्ती के बाहर रहने को विवश थे। इन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी भी नहीं लेने दिया जाता था। यहां तक की कई सड़कों पर चलने पर भी प्रतिबंध लगा था। इन भेदभावों ने पिछड़ी जातियों दलितों को हिंदू धर्म से लगातार विमुख किया। कई कामगार जातियों खासकर जुलाहों, धोबियों ने मध्यकाल में इस्लाम के बराबरी के सिद्धांत से प्रभावित होकर इस्लाम अपना लिया था। डॉ. अबेडकर ने भी इसी भेदभाव से तंग आकर दलितों को बौद्ध धर्म अपनाने को प्रेरित किया था।

आरक्षण ने जातियों के बीच भेदभाव की खाई को किया चौड़ा
आजादी के बाद संविधान में हरिजनों (दलितों) और जनजातियों (आदिवासियों)  की सामाजिक औऱ आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था दस वर्ष के लिए की गई। इसके बाद से लगातार इससे बढ़ाया जाता रहा है। इस उपाय ने हालांकि इन वर्गों के कुछ लोगों का आर्थिक स्तर जरूर ऊंचा उठा दिया, लेकिन सामाजिक भेदभाव नहीं मिट पाया। आज भी दलित खुद दलित ही बने रहना चाहते हैं, जबकि  कई उच्च जातियों के लोगों की तुलना में उनका जीवनस्तर काफी ऊंचा हो गया है। मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू होने से पिछड़े वर्गों को भी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण मिला। हमारे समाज में शहरीकरण और शिक्षा के कारण जागरूकता बढ़ने से जातिगत भेदभाव की जो खाई खासकर शहरों में मिटती जा रही थी उसकों मंडल कमीशन ने फिर से बढ़ा दिया। तथाकथित समाजवादियों ने जाति व्यवस्था को किया मजबूत समाजवादी लोहिया ने हालांकि जाति व्यवस्था को खत्म करने की हिमायत की थी । उनसे प्रभावित होकर कई समाजवादियों ने अपने नाम के बाद प्रयोग किए जानेवाले सरनेम जैसे सिंह, शर्मा,वर्मा, राम, जायसवाल आदि का प्रयोग बंद कर दिया था लेकिन लालू प्रसाद और और मुलायम सिंह यादव जैसे उनके चेलों ने जातियों को ही अपना वोट बैंक बनाकर जाति व्यवस्था को काफी मजबूत कर दिया।

अब नहीं बढ़ रही नई जातियां
नदियों और बहते जलस्रोतों का पानी काफी स्वच्छ रहता है वहीं ठहरे हुआ जलस्रोत का पानी जल्दी सड़ जाता है उसी तरह हमारी जाति व्यवस्था भी ठहराव की वजह से सड़ गई है। मध्यकाल तक भारतीय समाज में सैकड़ों जातियां और उपजातियां अस्तित्व में आ गई थीं। लेकिन आधुनिक काल में नई जातियों का निर्माण रुक गया। आधुनिक शिक्षा और बढ़ते ्यवसायों ने कई नए पेशों को जन्म दिया। जैसे डाक्टर, इंजीनियर, मैनेजमेंट, सीए, आइसीड्व्यूए, पत्रकार, सरकारी और निजी नौकरियों में क्लर्क, असिस्टेंट आदि। इसी तरह से कई छोटे-मोटे रोजगार लोग करने लगे जैसे किराना दुकाने,  साइकिल, दोपहिया और चारपहिया वाहनों की मरम्मत आदि लेकिन ये पेशे और व्यवसाय जातियों में नहीं बदले। आज अगर कोई दलित या पिछड़ा वर्ग का व्यक्ति डॉक्टर इंजीनियर बन भी जाता है तो उसकी जाति वही रह जाती है। यानि डाक्टरों और इंजीनियर जैसे पेशों की जातियां नहीं बन पाईं ये लोग आज भी अपनी पुरानी जातियों से ही चिपके हैं।
जाति आधारित विवाहों की बाध्यता ने बढ़ाई मुश्किलें
हमारे समाज में अाधुनिक शिक्षा के बाद भी विवाह आज भी जाति पर जरूरत से ज्यादा आधारित हैं। कुछ युवा प्रेम करते हैं तो उनकों भी जातियों के भेदभाव की वजह से काफी परेशानी होती है। कई बार तो दूसरी जाति में विवाह करने को अपराध मानकर लोग ओनर किलिंग तक कर देते हैं। प्रेम विवाह को सहज स्वीकृति देने से हम जाति व्यवस्था को सहज रूप से समाप्त कर सकते थे लेकिन हम इस सड़ी गली व्यवस्था को हर कीमत पर कायम रखने पर तुले हुए हैं। अगर जातियों के लोग शादी भी करते हैं तो आमतौर पर इनकी अगली पीढ़ी को पुरुष की जाति का ही मान लिया जाता है जबकि वास्तव में होना ये चाहिए कि उससे कोई नई जाति बननी चाहिए।

  • नवीन शर्मा
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