विश्वनाथ प्रताप सिंह वही नहीं थे, जैसे अब दिखते हैं

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वीपी सिंह वही नहीं थे, जैसे अब दिखते हैं…लेकिन इस बदलाव में एक अच्छाई है…एक राजनीतिक सूत्र है…
पिछले दिनों योगी आदित्यनाथ सरकार पर इधर उधर से अनमने से ढंग से आरोप लगाए कि अपराध नियंत्रण के नाम पर वंचित तबकों के लोगों को एनकाउंटर का निशाना बनाया जा रहा है….वी पी
ऐसा ही आरोप जमीनी आंच से तपकर निकले नौजवान समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव ने इससे ज्यादा तल्ख लहजे में और आंकड़ों के साथ लगाया था यूपी विधानसभा में…सामने थी मुख्यमंत्री वी पी सिंह की सरकार….उसके बाद विदाई हो गई सिंह साहब की….
वक्त बदला…अरुण नेहरू, वी पी सिंह, राजीव गांधी की दून मंडली के आहत लोगों और हथियार सौदों के अंतरराष्ट्रीय दलाल के साथी एक फाइव स्टार संत की अगुवाई में भ्र्ष्टाचार के खिलाफ देश भर में अभियान चला…राजीव सरकार लोगों की नजरों से भी गिर गई… लेकिन एक चैलेंज विजयी मोर्चे में उभरा…जीत के दावेदार कई थे…देवीलाल से लेकर चंद्रशेखर तक…मोर्चे का चेहरा लेकिन वी पी सिंह थे…..बाजी उनके हाथ लगी…
इस मोड़ के आगे वह हुआ, जो यू पी विधानसभा में लगे आरोप का जवाब था….ऐसा सियासी जवाब जिसने भारत को हमेशा के लिए बदल दिया….चुनावी नारा था राजा नहीं फकीर है…लेकिन फकीर को राजधर्म याद आया….कमंडली राजनीति की काट रही हो या मुलायम के सवाल से उबरने का निर्णायक कदम, मंडल कमीशन की सिफारिश लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय वी पी ने कर लिया…उस एक फैसले ने मुलायम ही नहीं, तमाम विरोधियों की आंच सोखकर वी पी सिंह में समाहित कर दी…फकीर अब असल राजा था..उस तेज के सामने आज के तमाम कथित समाजवादी नेता फीके हैं..
इसी फैसले के राजनीतिक सूत्र को अर्जुन सिंह ने पकड़ा बाद में…
अंबेडकर के बाद वी पी सिंह और अर्जुन सिंह ने जो किया, वैसा किसी ने वंचित समुदायों के लिए नहीं किया….उसके लिए उन्हें गालियां दी गईं…खुद मैंने पागल भीड़ में शामिल होकर जान का जोखिम लेते हुए गोरखपुर में वी पी के काफिले पर पथराव किया….न मैं उस बात को तब समझ सका था और न ही बाद में उभरे नेताओं में से ज्यादातर ने समझा…..
वी पी और अर्जुन सिंह को मैं राजधर्म के नजरिये से सम्मान देता हूं….जो ताकतवर है, वह कमजोर को सबल करे, उसे आगे ले आए, उसे नेतृत्व का मौका दे….यही राजधर्म है, यही नए भारत की सियासत का सूत्र है…

  • अखिलेश प्रताप सिंह
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