मुंबई में हरे वृक्षों का संहार रुक गया, आभार उच्चतम न्यायालय का

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मुंबई में हरे वृक्षों का संहार रुक गया, उच्चतम न्यायालय की पहल से
मुंबई में हरे वृक्षों का संहार रुक गया, उच्चतम न्यायालय की पहल से
  • के. विक्रम राव 

मुंबई में हरे वृक्षों का संहार रुक गया, आभार उच्चतम न्यायालय का। वर्ना छब्बीस हजार जानों पर आरे कालोनी में आरी चल गई होती। छात्रों और युवाओं ने मोर्चा लिया। जेल में रात गुजारी। अगले दिन कॉलेजों में परीक्षाएं थीं, छूट गयीं। पेड़ बचाने में सफल हुए। त्रस्त तो महाराष्ट्र की हिन्दुवादी सरकार ने किया। विप्रश्रेष्ठ देवेन्द्र फड़नवीस के शासन को ऐसा जघन्य आध्यात्मिक अपकृत्य करने में तनिक झिझक भी नहीं हुई। माता प्रकृति की आँतों को नवरात्र में काटा। वृक्ष प्राणधारी होते हैं। वेदों में युगों पूर्व (वनस्पति शास्त्री  डॉ. जगदीशचन्द्र बोस से बहुत पहले) यह सिद्ध हो गया था। सनातनी जन तो वृक्षों की पूजा करते हैं। आज भी।

पीड़ा इसलिए खास हुई कि साहित्य सेवियों ने इतने बड़े राष्ट्र में कहीं भी, कम से कम मीडिया के मार्फत ही सही, दर्द नहीं व्यक्त किया। हेनरी लोंगफेलो ने वृक्ष को ईश्वर द्वारा रचित कविता कहा था। अमरीकी कवयित्री जोइस खिलमर ने पेड़ में नैसर्गिक पद्य देखा था। कवि वियोगी होता है, अमूमन।

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इस बीच मोदी सरकार भारत भूमि पर बढ़ती बंजरीकरण से संतप्त दिखी। अवरोध हेतु विचार गोष्ठियां आयोजित हुईं। क्या नतीजा निकला? आरे कॉलोनी! बालुई इजराइल में पेड़ काटने वाले को सजा देता है। प्राणिवध के अपराध का दर्जा है। याद कीजिए, गोमती नगर (लखनऊ) कितना हरा होता था। मायावती के नीलेपन के कारण शुष्क हो गया। पत्थर वाला  श्मशान जैसा। प्रतिरोध में कोई भी विपक्ष की पार्टी सड़क पर नहीं उतरी। बिल्डरों से सबकी यारी जो थी।

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महाराष्ट्र विधान सभा के निर्वाचन के वक्त आज का यह जनसंघर्ष अपना रंग  दिखायेगा। सरकार में शामिल शिवसेना के तीसरी पीढ़ी के युवराज आदित्य (स्व. बाल ठाकरे के पोते) समीपस्थ वर्ली सीट से प्रत्याशी हैं। युवा विरोधीजन कटे पेड़ का प्रतिशोध लेने अब अभियानकर्ता बन गये हैं। अतः वर्ली वाला मतदान दिलचस्प होगा। राहुल गाँधी तो प्रधानमंत्री बनते-बनते बच गये। आदित्य मुख्यमंत्री का सपना संजोये हैं। उनके कांग्रेसी हरीफ सुरेश माणे का उद्घोष है कि शिवसेना ने पेड़ काटने का विरोध किया था, पर अपनी सरकार को रोका नहीं। माणे इसी दुहरे चरित्र को चुनावी मसला बना रहे हैं।

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आज की इस वनसंपदा रक्षा वाली घटना से मुझे मेरे पांच दशक के पत्रकारी जीवन की संदर्भित घटना याद आ गई। उस रात मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया (मुंबई) में नाइट ड्यूटी का (कनिष्ठ) रिपोर्टर था। फोन आया उधर से। आग्रह था, “अपना फोटोग्राफर लेकर मलाबार हिल्स के मोड़ पर आ जाइये।” मैंने कारण पूछा। जवाब आया, “यहाँ म्युनिसिपालिटी वाले एक पुराने पेड़ को काटने वाले हैं। मैं चिपका खड़ा हूँ। आप पत्रकार हैं, बचाइए।” यूं भी हमारा अख़बार वन-संरक्षण में अगुआ रहा है। फिर भी मैंने फोनकर्ता का परिचय माँगा। वे बोले, “मैं यहीं का निवासी हूँ। मेरा नाम डॉ. होमी भाभा है।” अचरज हुआ कि भारतीय अन्तरिक्ष विज्ञान का जनक, आज का चंद्रयान जिसकी देन है, वह डॉ. भाभा बस एक पेड़ बचाने में रात से जुटे हैं। पड़ोस के पुणेवासी प्रकाश जावड़ेकर आज मोदी काबीना में पर्यावरण मंत्री हैं। पिता केशव की भांति जागरूक पत्रकार रहे। भूमंडल में मौसमी असंतुलन का दुखड़ा व्यक्त करने से कभी नहीं अघाते। मगर आरे से अछूते हैं। वाह!

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