बिहार में नीतीश का कोई तोड़ नहीं, काम से मनवा रहे लोहा

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बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का जातीय जनाधार राजद के मुसलिम-यादव (एमवाई) समीकरण जैसा भले न हो, पर उनके बिना बिहार की राजनीति फिलवक्त नीरस ही मानी जायेगी। बीच-बीच में उनकी पार्टी जदयू के प्रवक्ताओं-नेताओं के बयान वाणों से यह जरूर लगता है कि भाजपा के साथ उनकी जुगलबंदी को झटका लग सकता है। नीतीश को जानने-समझने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि नीतीश के जदयू में लोकतंत्र जरूर है, लेकिन निर्णय लेने की उनकी स्टाइल सुप्रीमो जैसी है। उनकी चुप्पी को समझ पाना किसी मजे हुए व्यक्ति या पार्टी के नेताओं के बूते की बात नहीं। यहां तक कि नीतीश क्या सोचते हैं और कब क्या करेंगे, इसकी भनक सरकार में उनके साथी दलों को भी नहीं होती।

राजद से रिश्ता तोड़ने पर एक सवाल आहिस्ता से उछाल कर कि तेजस्वी यादव अपने ऊपर जांच एजेंसियों द्वारा लगाये गये आरोपों पर जनता के बीच जाकर खुद सफाई दें, राजगीर प्वास पर वह चले गये। कुछ को लगता था कि मान-मनौवल से बात बगड़ेगी नहीं। अंत-अंत तक राजनीति के धुरंधर माने जाते रहे लालू प्रसाद भी हकीककत नहीं समझ सके और आनन-फानन नीतीश ने राजद से रिश्ता तोड़ अपनी पुरानी साथी भाजपा से गंठजोड़ कर लिया। हर बात पर टिप्पणी से बचना और सोच-समझ कर अपनी बात कहना नीतीश की ताकत है। यह खासियत इंदिरा गांधी, ज्योति बसु और जयललिता में थी, जो लंबे समय तक सत्ता में बने रहे।

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बहरहाल नीतीश की जाति की आबादी बिहर में बहुत कम है, लेकिन उन्होंने तुरुप के कई पत्ते ऐसे फेंके कि पिछले डेढ़ दशक से मुख्यमंत्री की कुर्सी खुद ब खुद उनके पास खिंची चली आती है। उन्होंने दलितों की दो श्रेणियां बना कर उनको साधा। मुसलमानों में पिछड़े (पसमांदा) और अन्य का विभाजन कर उनको अपनी ओर आकर्षित किया। स्कूली छात्राओं को साइकिल देकर उन्होंने हर घर में प्रवेश का रास्ता बनाया। दारूबंदी जैसा कदम उठा कर वह इससे तबाह परिवारों के महिलाओं-बच्चों को अपने पाले में किया। अभी जब हर दल दलितों को अपनी ओर खींचने की तरकीब सोच रहे हैं, उन्होंने अनुसूचित जाति और जन जाति के पढ़ाकू छात्रों को वजीफा का लाभ देने की घोषणा कर दी है। हाल ही में कुछ पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए उन्होंने पहल की है। उनके शासन में विकास की लंबी लकीर अलग से उनका पक्ष मजबूत करती है। ऐसे में यह कहना कि नीतीश बिहार की राजनीति में फिलहाल सब पर भारी हैं, कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

  • दीपक कुमार
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