फर्जी नक्सली सरेंडर मामले पर कोर्ट का झारखंड सरकार को फटकार

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  • विशद कुमार

 गृह सचिव को हाईकोर्ट ने जांच के आदेश दिये थे। उन्हें सात अगस्त को कोर्ट ने तलब किया है।

रांची। पिछले 11 जुलाई को फर्जी नक्सली सरेंडर मामले पर झारखंड हाईकोर्ट ने रघुवर सरकार को जहां जमकर फटकार लगाई, वहीं सरकार के गृह सचिव को 7 अगस्त तक मामले पर जवाब देने का आदेश दिया। उल्लेखनीय है कि झारखंड डेमोकेट्रिक संस्था की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी थी, जिसमें कहा गया था कि नक्सली सरेंडर नीति के आंकड़े बढ़ाने के लिए बेरोजगार युवकों को नौकरी का लालच देकर फर्जी सरेंडर कराया गया। जनहित याचिका इस फर्जीवाड़े पर कई बिंदु पेश किए गए थे।

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इसी फर्जी नक्सली सरेंडर के मामले की सुनवाई के तहत मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और जस्टिस रत्नाकर भेंगरा की बेंच ने इस मामले में राज्य सरकार के रवैये पर असंतुष्टि जतायी। कोर्ट ने रघुवर सरकार के गृह सचिव को 7 अगस्त तक जवाब देने करने का आदेश दिया है और साथ ही कहा है कि अगर सात अगस्त तक जवाब पेश नहीं होता है, तो सरकार के गृह सचिव को हाजिर होना होगा।

बता दें कि पूरे मामले में पूर्व में केन्द्र सरकार के जवाब पर कोर्ट ने राज्य सरकार को अपना जवाब पेश करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता झारखंड काउंसिल फोर डेमोक्रेटिक के अधिवक्ता राजीव कुमार ने कोर्ट से कहा कि चार डेट दिए गए, लेकिन सरकार की ओर से अबतक कोई जवाब नहीं आया। वर्ष 2019 में चुनाव होने वाला है और इस मामले से संबंधित कई अधिकारी रिटायर हो जाएंगे। राज्य सरकार की ओर से किसी प्रकार का कोई जवाब कोर्ट में पेश नहीं किया गया, जिसको लेकर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की। मामले की अगली सुनवाई 7 अगस्त को होगी।

इधर याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से इस मामले में सीबीआई जांच की मांग पर विचार करने और पूरे मामले के जल्द से जल्द निष्पादन के लिए उचित आदेश पारित करने का आग्रह किया है।

क्या है मामलाः उल्लेखनीय है कि राज्य पुलिस के अफसरों द्वारा नक्सली सरेंडर नीति में आंकड़ा बढ़ाने के लिए सेना में नौकरी देने की लालच देकर 514 युवकों को फर्जी नक्सली बनने को तैयार किया गया था और जब सच्चाई सामने आई तब कलई खुलने के डर से फर्जी सरेंडर कराने वाले केस की फाइल बंद कर दी गई। बता दें कि रांची, खूंटी, गुमला व सिमडेगा के भोले-भाले 514 युवकों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने के लिए एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करनेवाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले थे, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार उपलब्ध कराया जा सके।

 उल्लेखनीय है कि उन 514 युवकों को कोबरा बटालियन के जवानों की निगरानी में राजधानी की पुरानी जेल परिसर में रखा गया था और हथियार के साथ उनकी तस्वीरें भी ली गईं थी। यह सारा खेल तत्कालीन सीआरपीएफ झारखंड सेक्टर के आइजी डीके पांडेय के इशारे पर हुआ था। वही डीके पांडेय आज राज्य के डीजीपी हैं। वर्तमान में इस मामले में डीजीपी डीके पांडेय, एडीजी एसएन प्रधान समेत सीआरपीएफ के अन्य अफसर संदेह के घेरे में हैं।

वहीं मामले की जांच को लेकर रांची पुलिस पर लापरवाही बरतने का भी आरोप है। रांची पुलिस ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की उस रिपोर्ट पर गौर ही नहीं किया था, जिसमें कहा गया था कि पुलिस के सीनियर अफसरों ने सरेंडर का आंकड़ा बढ़ाने के लिए नक्सली सरेंडर पॉलिसी का दुरुपयोग किया है। अत: इस मामले को लेकर झारखंड डेमोकेट्रिक संस्था की ओर से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गयी ।

एनएचआरसी की रिपोर्ट में भी इस ओर इशारा किया गया है। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या रांची पुलिस ने डीजीपी डीके पांडेय को बचाने के लिए लोअर बाजार थाना में दर्ज मामले की जांच का दायरा समित रखा और मामले की जांच को बंद कर दी। क्योंकि डीके पांडेय और मुख्यमंत्री के रिश्तों की मधुरता सर्व विदित है। पिछले दिनों डीजीपी डीके पांडेय ने सार्वजनिक मंच से रघुवर दास की तारीफ मे काफी अच्छे अच्छे कसीदे कसे थे।

बता दें कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि एजेंट और अफसरों ने सरेंडर करने वाले युवकों से हथियार खरीदने के नाम पर लाखों रुपये वसूले थे, ताकि सरेंडर के समय उन्हें वह हथियार सहित सरेंडर कराया जा सके और फर्जी सरेंडर असली लगे। उल्लेखनीय है कि मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी)  ने डीजी (अनुसंधान) को मामले की जांच कराने का आदेश दिया था। एनएचआरसी के उच्चाधिकारियों ने रांची आकर मामले की जांच  की थी।

नक्सल सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर बनायी गयी थी

एनएचआरसी की जांच में 12 तथ्य सामने आये थे, जिसकी जानकारी राज्य सरकार और गृह मंत्रालय को दे दी गई थी और आयोग ने उन 12 बिंदुओं  पर सरकार से जवाब मांगा था। लेकिन सरकार के उच्चाधिकारी इस रिपोर्ट को दबाये बैठे रहे। आयोग को कोई जवाब नहीं भेजा गया। जांच के दौरान तत्कालीन आइजी स्पेशल ब्रांच एसएन प्रधान ने जांच अधिकारी को बताया था कि नक्सली सरेंडर की योजना गृह मंत्रालय के मौखिक निर्देश पर बनायी गयी थी, ताकि उन्हें मुख्य धारा में लाया जा सके। जांच में पुलिस के सीनियर अफसरों पर लगे आरोपों को सही पाया गया था।

 

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