अगस्त 1942 का वह दिन कभी भूल न पायेगा बिहार

0
631

सुरेंद्र किशोर

10 अगस्त, 1942 को पटना के कलक्टर आर्चर ने जेल में डा.राजेंद्र प्रसाद  से मिलकर उनसे एक आग्रह किया था। आर्चर ने कहा था कि आप लोग बाहर के लोगों के नाम यह अपील जारी कर दें कि वे शांति बनाए रखें। क्योंकि बाहर घड़ी-घड़ी लोमहर्षक दृश्य उपस्थित होने के लक्षण विदृयमान हैं। इस अपील पर नेताओं ने आपस में विचार-विमर्श किया। फिर तय हुआ कि इस अपील को ठुकरा दिया जाए। यानी आर्चर निराश हो गया।

- Advertisement -

डा. अनुग्रह नारायण सिंह को 10 अगस्त की सुबह ही गिरफ्तार करके आर्चर ने उन्हें पटना जिला जेल पहुंचा दिया था। उसका हाल खुद डा.सिंह ने लिखा है कि ‘दस अगस्त 1942 को मैं पटना जिला जेल में दाखिल हुआ। वहां पहुंचते ही राजेंद्र बाबू तथा अन्य साथियों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई। सभी प्रसन्न मुद्रा में आहलादपूर्वक मुझसे मिले। उसी दिन पटना के विद्यार्थियों ने सचिवालय पर झंडा फहराने का कार्यक्रम तय किया था। वे लोग लंबा जुलूस बना कर सचिवालय पहुंचे। वहां झंडा फहराने के प्रयास में  सात छात्र हंसते-हंसते गोली के शिकार बना दिए गए थे। फिर भी छात्रों ने हिम्मत नहीं हारी, एक-दो नौजवानों ने किसी प्रकार छत पर चढ़कर आखिर तिरंगा झंडा फहरा ही दिया।

उस ऐतिहासिक पलों का वर्णन अनुग्रह बाबू ने ‘मेरे संस्मरण’ में  इस प्रकार किया है, ‘सचिवालय के प्रवेश द्वार पर खून की धारा प्रवाहित हो उठी। हत-मृत और आहत व्यक्ति अस्पताल पहुंचाए गए, जहां पहले से ही डाक्टर उनके लिए मौजूद थे। शहीद छात्रों की लाशें जनता के हाथों में सौंपने में सरकार की ओर से पहले तो अड़चन डाली गई, लेकिन बाद में लाशें दे दी गईं। सारे शहर में जोश व उमंग की नदी उमड़ पड़ी। तमाम सनसनी फैल गई। उस दिन पटना शहर में रात भर जुलूस निकलते रहे। यद्यपि हमलोग जेल में बंद थे, फिर भी बाहर उमड़ते हुए जुलूसों के नारों को सुनने के लिए रात भर जगे रहे।

दूसरे दिन हमलोगों को यह आशंका हुई कि पटना के नागरिकों को तरह-तरह से सताया जाता होगा। दस अगस्त को स्वयं कलक्टर आर्चर  राजेंद्र बाबू और मुझसे मिलने जेल में आये।उन्होंने मुझसे मिलकर यह चेतावनी दे दी कि बाहर विस्फोटक स्थिति है,इसलिए आपलोग शांति की अपील निकालिए।

जब हमने अपील नहीं निकाली ,उसके बाद हमने सुना कि दूसरे दिन से ही सारे शहर में आतंक का साम्राज्य स्थापित कर दिया गया। तमाम लाठियां बरसने लगीं। प्रतिष्ठित से प्रतिष्ठित व्यक्ति भी पीटे जाने लगे। तरह-तरह की रोमांचकारी कहानियां जेल के भीतर सुनने को मिलने लगीं, जिनमें अनेक मनगढंत और दंत कथाएं भी थीं। प्रतिदिन गिरफ्तार होकर जेल में आने वाले कैदियों तथा उन्हें जेल तक पहुंचाने वाले सिपाहियों के मुंह से ऐसी ऐसी आतंकपूर्ण कहानियां सुनने को मिलती थीं कि उन्हें सुन -सुन कर रोंगटे खड़े हो जाते थे।

पटना का जिला जेल गिरफ्तार व्यक्तियों से ठसाठस भर गया। इनमें बहुतेरे विद्यार्थी  थे। जेल में इतने आदमियों के लिए जगह भी कहां थी? जगह के अभाव में लोग जेल के अहाते के भीतर जहां-तहां चक्कर काटने लगे। पटना जेल के भीतर दो मंजिला कोठी सड़क की ओर है। उस पर चढ़कर कैदी लोग रात-रात भर नारे लगाने लगे और उन नारों का उत्तर बाहर के नारों द्वारा मिलने लगा। जेल के भीतर के लोग पेड़ पर चढ़कर बाहर सड़क पर जाने वाले लोगों को  प्रोत्साहित करते रहे। अधिकारी जेल के भीतर के अनियंत्रित दृश्य को देख कर बहुत घबरा रहे थे। उन लोगों ने कुछ लोगों को पटना कैम्प जेल भेज देने का निर्णय कियां। विद्यार्थी कैदी को लेकर जैसे ही दो लारियां जेल परिसर से बाहर निकलीं, जेल के पास पहले से मौजूद भीड़ ने कैदियों को जबरन  छुड़ा लिया और लारियों  यानी बसों  में आग लगा दीं। कुछ कैदी तो वापस जेल में आ गये, पर कुछ भीड़ के साथ निकल गये। इस घटना के बाद एक जेल से दूसरे जेल में स्थानांतरण करने में पूरी सख्ती बरती जाने लगी।’

अनुग्रह बाबू ने लिखा कि पटना सचिवालय के सामने जो गोलियां चली थीं, जिनमें सात लोग शहीद हुए थे, पुलिस गोली कांड की उस घटना को अंजाम देने से पहले पटना के  कलक्टर आर्चर के साथ विचार विमर्श नहीं किया गया था। जेल बस कांड के बाद अफसर और भी घबरा गये थे। हमलोगों को जब हजारीबाग जेल स्थानांतरित किया जा रहा था तो भारतीय अफसर हमलोगों को खूंखार टामियों के हवाले करना चाहते थे। पर आर्चर ने मना कर दिया। अनुग्रह बाबू के अनुसार उस समय के भारतीय अफसर  कायर थे।’

उपर्युक्त कहानी पढकर आजादी के  सात दशक  बाद आज यह सवाल उठता है कि  क्या अगस्त क्रांति के  बलिदानियों ने आज की भ्रष्ट व्यवस्था लाने के लिए ही अपना तब का वर्तमान न्योछावर किया था?

यह भी पढ़ेंः मलिकाइन के पातीः ना रही बांस, ना बाजी बंसुरी

- Advertisement -