पार्टियों में कार्यकर्ताओं के घटने की वजह कहीं वंशवाद तो नहीं!

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– सुरेंद्र किशोर

यह खुशी की बात है कि जिस समस्या की ओर मैं लिख-लिख  कर वर्षों से लोगों का ध्यान खींचता रहा हूं, उस ओर जदयू के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर जैसी बड़ी हस्ती का भी ध्यान गया है। उनमें इस मामले में गंभीरता भी नजर आ रही है। किशोर यदि कांग्रेस के साथ अब भी जुड़े होते तो चाहते हुए भी इस नाजुक विषय पर नहीं बोल पाते। भाजपा का हाल भी इस मामले में लगभग वैसा ही है।

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प्रशांत किशोर के अनुसार  वंशवाद के कारण ही युवा राजनीति से दूर होते जा रहे हैं। उन्होंने इस संबंध में जो आंकड़ा दिया है, वह अच्छी मंशा वाले लोगों को चैंकाएगा। उनके अनुसार ‘पहली लोक सभा में परिवार की पृष्ठभूमि से राजनीति में आने वालों की संख्या सिर्फ 9 प्रतिशत थी।

लेकिन मौजूदा लोक सभा में अगर 40 वर्ष से कम उम्र के सांसदों पर नजर डालें तो इनमें 98 प्रतिशत सांसद परिवारवाद के उदाहरण हैं। सब किसी न किसी ऐसे परिवार से जुड़े हैं, जिनमें उनके दादा, नाना, पिता या भाई पहले सांसद या मंत्री रह चुके हैं। यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक स्थिति है।’

यह अच्छी बात है कि दैनिक भास्कर ने प्रशांत किशोर की यह अति महत्वपूर्ण बात  छापी है।

अब सवाल यह है कि परिवारवाद का यह काफिला बढ़ता ही क्यों जा रहा है? उसे दाना-पानी कहां से मिल रहा है?

मेरी मान्यता है कि सांसद-विधायक  क्षेत्र विकास फंड इसमें काफी मददगार हैं। साठ-सत्तर के दशकों में सिद्धांतों से प्रभावित होकर युवा विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़ते थे और कार्यकर्ता बनते थे। कुछ लोग सांसद-विधायक बनने के लिए भी आए।

ताजा अनुभव के आधार पर प्रशांत जी ने ठीक ही कहा है कि ‘बिना प्रभावी सरनेम वाले युवाओं का राजनीति में आना नामुमकिन हो गया है।’ मैं देख रहा हूं कि दरअसल सांसद-विधायक  फंड के ठेकेदार ही जब राजनीतिक कार्यकर्ताओं की भूमिका निभाने लगे हैं तो वास्तविक कार्यकर्ताओं की जरूरत ही कहां है?

यदि सांसद फंड बंद कर दिया जाए तो अधिकतर वंशवादी-परिवारवादी दलों, सांसदों या उम्मीदवारों को कार्यकर्ता नहीं मिलेंगे। मिलेंगे भी तो उन पर उन्हें काफी खर्च करना पड़ेगा, जो सबके लिए संभव नहीं है। उतना खर्च करने पर राजनीति मुनाफे का धंधा नहीं रह जाएगी।

अभी तो अधिकतर मामलों में, सभी मामलों में नहीं, सांसद फंड का लगभग 40 प्रतिशत ‘कमीशन’ में चला जाता है।

इस फंड से टिकाऊ निर्माण शायद ही कहीं बन पा रहा है। हालांकि कुछ सांसद ईमानदारी से इस फंड का इस्तेमाल भी कर रहे हैं। पर, इक्के -दुक्के ही। फंड की इस दुर्दशा के बावजूद  अधिकतर राजनीतिक दल इसे बनाए रखने के पक्ष में हैं, क्योंकि यह फंड उनको व उनके वंश को बना-बनाया कार्यकर्ता मुहैया कराता रहा  है। अपवादों की बात और है।

यदि वास्तविक यानी ईमानदार राजनीतिक कार्यकर्ताओं का अकाल दूर करना है तो प्रशांत किशोर जैसे प्रभावशाली लोग सांसद फंड के खिलाफ अभियान चलाएं। यदि अन्य दल राजी न हों तो कम से कम जदयू यह काम शुरू करे। शायद बाद में अन्य दल अनुसरण करें!

जदयू से भविष्य में उसे ही चुनावी टिकट मिले, जो यह लिख कर पार्टी को दे दे कि वह सांसद-विधायक फंड से खुद को अलग रखेगा। जदयू के भी मौजूदा सांसदों-विधायकों से ऐसा लिखवाना असंभव है।

अन्य अनेक लोगों के साथ-साथ इस फंड को समाप्त करने की सिफारिश वीरप्पा मोइली के नेतृत्व वाले प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी की थी। मेरी तो राय है कि केंद्र सरकार एक न्यायिक जांच आयोग बनाए जो इस बात की जांच करे कि इस फंड ने राजनीति को कितना नुकसान पहुंचाया है। यह नहीं भूलना चाहिए कि  इस फंड की शुरुआत हर्षद मेहता रिश्वत कांड के तत्काल बाद 1993 में की गयी थी। (फेसबुक वाल से साभार)

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