योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में सब पर भारी क्यों पड़ रहे हैं ?

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योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में सब पर भारी क्यों पड़ रहे हैं। इसलिए कि वे राजधर्मुम निभाना बखूबी जानते हैं। उनके समर्थकों से ज्यादा विरोधी अभी मुखर हुए हैं।
योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में सब पर भारी क्यों पड़ रहे हैं। इसलिए कि वे राजधर्मुम निभाना बखूबी जानते हैं। उनके समर्थकों से ज्यादा विरोधी अभी मुखर हुए हैं।
योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश में सब पर भारी क्यों पड़ रहे हैं। इसलिए कि वे राजधर्म निभाना बखूबी जानते हैं। योगी मुसलमानों में भी लोकप्रिय हैं। उनके समर्थकों से ज्यादा विरोधी अभी मुखर हुए हैं। फिर भी योगी आदित्यनाथ का बाल भी बांका नहीं हो पाया। 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का चेहरा वही होंगे। आरएसएस ने अपनी ओर से यह स्पष्ट कर दिया है। आखिर योगी में ऐसी क्या खूबी है, जो उन्हें अपने विरोधियों पर हावी होने के लिए बाध्य करती है, आइए इसे जानते हैंः
  • राजीव सिंह जादौन

सीएए/ एनआरसी के प्रोटेस्ट के समय जब पूरा देश जल रहा था, गृह मंत्रालय जिसके सर्वेसर्वा अमित शाह जी हैं और जिनके अधीन दिल्ली पुलिस है, उसी दिल्ली पुलिस के रहते पिछले साल दिल्ली में भयंकर दंगे हुए। उत्तर प्रदेश, जिसमें की दंगे होने की संभावना सबसे ज्यादा बताई जा रही थी, योगी आदित्यनाथ के प्रशासनिक कौशल के कारण दंगा तो दूर, कोई बड़ा उपद्रव भी नहीं हो पाया। यह केवल एक उदाहरण है, जो बतलाता है कि योगी आदित्यनाथ गृह मंत्री अमित शाह से कहीं से भी उन्नीस नहीं हैं।

योगी आदित्यनाथ जिस नाथ सम्प्रदाय के अनुयायी हैं, उस नाथ सम्प्रदाय का उद्भव बहुत ही प्रोग्रेसिव कारणों से हुआ है। नाथ संप्रदाय का उदय हिन्दू धर्म में बढ़ चुके पाखंड और छुआछूत को दूर करने के लिए हुआ था। गोरखपुर के गोरक्ष पीठ के महंत का वही महत्व है, जो आदि शक्ति पीठों के शकराचार्य का होता है। गोदी मीडिया के सौतेले भाइयों द्वारा भले ही योगी को लेकर अनेक अफवाहें फैलाई जाएं, लेकिन सच्चाई यही है कि गोरखनाथ मंदिर के कैम्पस में बड़े पैमाने पर मुस्लिम दुकानदार रोजी-रोटी चलाते हैं। योगी जब तक गोरखपुर के सांसद रहे, उनके जनता दरबार में जो भी फरियाद लेकर आया, योगी ने उन्हें इंसाफ दिलाने में कभी जाति और धर्म नहीं पूछा।

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कुछ लोग कहते हैं कि योगी आदित्यनाथ तो संघ के औपचारिक सदस्य भी नहीं हैं। पूर्व के कई विधानसभा चुनाव में उन्होंने बीजेपी के खिलाफ अपना डमी कैंडिडेट खड़ाकर बजेपी को हराने का काम किया है। इसीलिए संघ उन्हें कभी उस तरह से नहीं स्वीकारेगा। मुझे ऐसा लगता है कि ऐसे भोथरे तर्क केवल योगी आदित्यनाथ को रोकने के तिकड़म भर हैं। क्योंकि मनोज तिवारी से लेकर हेमंत बिस्वा सरमा तक उदाहरण हैं, जो कल तक समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की बैटिंग करते थे और बीजेपी में शामिल होते ही उन्हें बड़ी जिम्मेवारी मिली।

कंटेम्पररी समय में देखा जाए तो संघ (आरएसएस) का सबसे बड़ा एजेंडा क्या था? जवाब होगा- अयोध्या में रामलला के भव्य मंदिर का निर्माण। योगी को राम मंदिर निर्माण में भी संघ की तरफ से एज मिलेगा, क्योंकि राम मंदिर का मुद्दा संघ से बहुत पहले गोरक्ष पीठ के महंथ रहे स्वर्गीय दिग्विजयनाथ ने उठाया था। उसी दिग्विजयनाथ की राजनीतिक विरासत के बाद में योगी आदित्यनाथ वारिस बने। इसीलिए योगी संघ के लिए बाहरी हैं, यह तर्क कारगर नहीं है। जम्मू कश्मीर से 370 को खत्म करवाना और तीन तलाक से मुस्लिम महिलाओं की आजादी। ये तीनों गंभीर समस्याएं खत्म हो गयी हैं। अब सवाल उठता है कि संघ का अगला एजेंडा क्या है। जवाब होगा- संघ में इस समय संक्रमण का दौर चल रहा है।

उपरोक्त तीनों गंभीर मामलों के खत्म होने के बाद संघ नए तरह के सांस्कृतिक भारत के निर्माण की तरफ आगे बढ़ेगा। मुसलमानों को लेकर अपनी नीति में थोड़ा बदलाव करेगा। मुसलमानों के मुद्दे पर संघ थोड़ा लचीला होगा। आरएसएस बीट को कवर करने वाले पत्रकार बताते हैं कि संघ बीजेपी के ऊपर यह दवाब बना रहा है कि आने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में कम से कम एक दर्जन मुसलमानों को बीजेपी टिकट दे।

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आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार की नाकामी के कारण हीरा-पन्ना की जोड़ी से संघ के अंदर भीषण नाराजगी है। ऐसे में नए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को मूर्त रूप देने की जिम्मेवारी संघ किसको सौंपेगा? जवाब है- योगी आदित्यनाथ। क्योंकि योगी आदित्यनाथ को राजधर्म निभाना आता है। योगी आदित्यनाथ लॉकडाउन में रमजान के दौरान रोजेदारों को कोई दिक्कत न हो, इसका भी ख्याल रखते हैं और योगी आदित्यनाथ को अतीक अहमद और मुख्तार अंसारी जैसे आताताई का इलाज कैसे करना है, यह भी अच्छी तरह आता है।

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