बाबूलाल मरांडी किधर जाएंगे, खुलासा खरमास के बाद

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बाबूलाल मरांडी
बाबूलाल मरांडी

रांची। बाबूलाल मरांडी किधर जाएंगे, खुलासा खरमास के बाद हो जाएगा। झारखंड में प्रमुख विपक्षी दल भाजपा की राजनीति में बड़ा खुलासा खरमास के बाद होगा। बाबूलाल मरांडी को लेकर कयास पर विराम भी लग जाएगा। अभी तक तो इस बात के कयास ही लगाये जा रहे हैं कि झारखंड विकास मोर्चा के सुप्रीमो बाबूलाल मरांडी खरमास बाद भाजपा का दामन थाम लेंगे और भाजपा नई विधानसभा में अपने नेता के रूप में उन्हें पेश करेगी।

विधानसभा सत्र के आखिरी दिन बाबूलाल मरांडी सदन में उपस्थित थे। हेमंत सोरेन सरकार को बिना शर्त समर्थन देने की भूमिका में वह थे। वे अभी तक यह कह कर इस कयास को खारिज करते रहे हैं कि भाजपा में लौटने की अटकलें पहले भी लगती रही हैं।

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वैसे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक बाबूलाल मरांडी कल दिल्ली जाने वाले हैं। उनकी भाजपा में वापसी पर फैसला कल के दौरे में ही हो जाएगा। इस कयास को इस बात से भी काफी बल मिला है कि बाबूलाल जी ने झारखंड विकास मोर्चा की कार्यसमिति 2 दिन पहले ही भंग कर दी थी। हालांकि उनके दूसरे दोनों विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की ने इसकी इतनी हड़बड़ी कोई जरूरत नहीं होने की बात कही थी। वैसे उनके दोनों विधायकों- प्रदीप यादव और बंधु तिर्की के बारे में राजनीतिक गलियारे में कई तरह की सूचनाएं तैर रही हैं। कोई कहता है कि दोनों कांग्रेस के संपर्क में हैं तो कुछ यह भी कहते हैं कि प्रदीप यादव ने राजद से भी बात की है। ये दोनों किसी दल के साथ जाएंगे या अपना दलीय अस्तित्व बनाये रखेंगे, इस बारे में साफ तौर पर कहीं से कोई सूचना नहीं है।

प्रदीप यादव ने चुनाव परिणाम की घोषणा के तुरंत बाद लालू प्रसाद से मुलाकात कर इस हवा को बल दिया था कि वे राजद में ठौर तलाश रहे हैं। कांग्रेस के लोगों से भी उनके निरंतर संपर्क की सूचनाएं आती रही हैं।

विधानसभा के सत्र के आखिरी दिन राज्यपाल के अभिभाषण पर बहस के दौरान कांग्रेस के विधायक इरफान ने जब टिप्पणी की कि झारखंड को कमल क्लब नहीं बनने देंगे, इस पर दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक हुई। भाजपा विधायक सीपी सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि आपको कोई आईएसआई एजेंट कहे तो कैसा लगेगा। लेकिन सदन चलता रहा। इससे एक बात तो साफ है कि विधानसभा में भाजपा का सबल पक्ष रखने वाला कोई नेता नहीं है। वैसे भी भाजपा ने अपने विधायक दल का नेता अभी तक नहीं चुना है।

बाबूलाल मरांडी को भाजपा अपने पास लाकर एक साथ तीन निशाने साधना चाहती है। अव्वल तो बाबूलाल मरांडी उसके लिए मजबूत आदिवासी चेहरा होंगे। भाजपा की इस बार पराजय का प्रमुख कारण भी यही रहा कि उसके बास कोई कद्दावर आदिवासी चेहरा नहीं था। दूसरा वे भाजपा के पुराने नेता रहे हैं और उनका एक साफ-सुथरा इतिहास रहा है। इसी बहाने विधानसभा में विपक्ष का एक मजबूत नेता भी होगा।

2014 में भी बाबूलाल मरांडी को भाजपा की ओर से साधने की कोशिश हुई थी, लेकिन उन्होंने भाजपा में विलय से इनकार कर दिया था। अलबत्ता सरकार को बाहर से समर्थन देने की बात पर उन्हें आपत्ति नहीं थी। तब रघुवर दास ने उनके छह विधायकों को तोड़ लिया था और काफी कमजोर बना दिया था। अब चूंकि न रघुवर दास की सरकार है और न वे सदन में हैं, इसलिए बाबूलाल मरांडी को भाजपा का प्रस्ताव स्वीकार करने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

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