जयंती पर विशेष- हीरो से भी ज्यादा पैसे लेते थे खलनायक प्राण 

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  • नवीन शर्मा

हिंदी सिनेमा के सौ साल से लंबे इतिहास में वैसे तो दर्जनों खलनायक हुए हैं। उनमें से प्राण एक खास स्थान रखते हैं। उन्हें विलेन के बजाय चरित्र अभिनेता कहना शायद ज्यादा सही रहेगा। प्राण का पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था और उनका जन्म 12 फरवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके में एक संपन्न परिवार में हुआ था। बताते हैं कि अपने अभिनय क्षमता के कारण हीरे से भी ज्यादा पैसे फिल्मों के लिए लेते थे।  आजादी के बाद प्राण ने लाहौर छोड़ दिया और बांबे आ गए।

प्राण बचपन से ही पढ़ाई में काफी होशियार थे। बहुत कम लोगों को यह बात पता है कि अपने अभिनय से दर्शकों को कायल करने वाले प्राण अभिनेता नहीं, बल्कि एक फोटोग्राफर बनना चाहते थे, लेकिन भाग्य ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था। 12वीं की परीक्षा उन्होंने रामपुर के राजा हाईस्कूल से पास की। बहुत कम लोग जानते होंगे कि प्राण बड़े होकर एक फोटोग्राफर बनना थे और इस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने दिल्ली की एक कंपनी ‘ए दास & कंपनी’ में अप्रेंटिस भी की।

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1940 में लेखक मोहम्मद वली ने एक पान की दुकान पर प्राण को खड़े देखा तो पहली नजर में ही उन्होंने अपनी पंजाबी फ़िल्म ‘यमला जट’ के लिए उन्हें साइन कर लिया। यह प्राण की पहली फिल्म बनी और सुपरहिट रही। लाहौर फिल्म इंडस्ट्री में एक खलनायक के तौर पर उभरने वाले प्राण को हिंदी फिल्मों में पहला ब्रेक 1942 में फिल्म ‘खानदान’ से मिला। दलसुख पंचोली की इस फिल्म में उनकी एक्ट्रेस नूरजहां थीं। बंटवारे से पहले प्राण ने 22 फिल्मों में निगेटिव रोल किया। वे उस समय के काफी चर्चित विलेन बन चुके थे। आजादी के बाद उन्होंने लाहौर छोड़ दिया और बोंबे आ गए। यह उनके लिये संघर्ष का समय था।

प्राण ने पहली शूटिंग के दौरान अपने पिताजी को नहीं बताया था की वह  फिल्म में एक्टिंग कर रहे हैं। उन्हें लगता था कि  उनके पिताजी गुस्सा हो जाएंगे। यहां तक कि जब उनका पहला इंटरव्यू अखबार में छपा तो प्राण ने अपनी बहनों से वो अखबार छुपा देने तक को कहा। लेकिन बाद में जब उनके पिताजी को पता चला तो वह बिल्कुल गुस्सा नहीं हुए।

1942 में फिल्म निर्माता दलसुख पांचोली ने अपनी हिंदी फिल्म ‘खानदान’ में प्राण को काम करने का मौका दिया। देश के बंटवारे के बाद प्राण ने लाहौर छोड़ दिया और वे मुंबई आ गए। लाहौर में चाहे प्राण ने काफी नाम कमाया, लेकिन उन्हें हिन्दी सिनेमा में पांव जमाने के लिए एक‍ नए कलाकार की तरह संघर्ष करना पड़ा।

प्राण को लेखक शहादत हसन मंटो और एक्टर श्याम की सहायता से बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘जिद्दी’ में काम मिला। इस फिल्म के लीड रोल में देवआनंद और कामिनी कौशल थे। ‘जिद्दी’ के बाद इस दशक की सभी फिल्मों में प्राण खलनायक के रोल में नजर आए। 1955 में दिलीप कुमार के साथ ‘आजाद’, ‘मधुमती’, ‘देवदास’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘राम और श्याम’ और ‘आदमी’ जैसी फिल्मों के किरदार महत्वपूर्ण रहे। देव आनंद के साथ ‘मुनीमजी’ (1955), ‘अमरदीप’ (1958) जैसी फिल्में पसंद की गई।

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फिल्म ‘जंजीर’ के किरदार विजय के लिए प्राण ने ही निर्देशक प्रकाश मेहरा को अमिताभ बच्चन का नाम सुझाया था। इस फिल्म ने अमिताभ का करियर को एक नया आयाम  दिया था। इस किरदार को पहले देव आनंद और धर्मेन्द्र ने नकार दिया था। प्राण ने अमिताभ की दोस्ती के चलते इसमें शेरखान का किरदार भी निभाया। उन पर फिल्माया गया यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी गीत बेहद लोकप्रिय हुआ था। इसके बाद अमिताभ बच्चन के साथ , ‘डान’, ‘अमर अकबर अन्थोनी’, ‘मजबूर’, ‘दोस्ताना’, ‘नसीब’, ‘कालिया’ और ‘शराबी’ जैसी फिल्में महत्वपूर्ण हैं।

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गंभीर आवाज में ‘बरखुरदार’ कहने का वो खास अंदाज भला कौन नहीं पहचानेगा। वह अभिनेता प्राण हैं, जो अपने बेमिसाल अभिनय से हर किरदार में प्राण डाल देते थे. फिर चाहे वह ‘उपकार’ में अपाहिज का किरदार हो या ‘जंजीर’ में अक्खड़ पठान का। प्राण ऐसे एक्टर थे जिनका चेहरा हर किरदार को निभाते हुए यह अहसास छोड़ जाता था कि उनके बिना इस किरदार की पहचान मिथ्या है।

प्राण 1969 से 1982 के बीच सबसे ज्यादा फीस पाने वाले एक्टर थे। यहां तक की उनकी फिल्मों का मेहनताना सुपरस्टार राजेश खन्ना से भी ज्यादा हुआ करता था। ‘डॉन’ फिल्म के लिए जहां अमिताभ बच्चन को 2.5 लाख रुपये फीस मिली थी वहीं प्राण को 5 लाख रुपये फीस के तौर दिए गए थे।

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प्राण हर फिल्म के लिए भारी फीस लिया करते थे। उनकी फीस हीरो से भी ज्यादा हुआ करती थी लेकिन उन्होंने राज कपूर की फिल्म ‘बॉबी’ मात्र एक रुपए में साइन की थी। उस दौरान राज कपूर  आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। इसको देखते हुए प्राण ने फीस नहीं ली। प्राण जितना बिग स्क्रीन पर खतरनाक नजर आते थे, असल जिंदगी में उतने ही नरम थे।

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प्राण को तीन बार फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार मिला। 1997 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट खिताब से नवाजा गया।  प्राण को हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए 2001 में भारत सरकार के पद्म भूषण और इसी साल दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। प्राण ने तकरीबन 350 से अधिक फिल्मों में काम किया। कापते पैरों की वजह से वह 1997 से व्हीएल चेयर पर जीवन गुजार रहे थे। उन्होंने 18 अप्रैल 1945 को शुक्ला आहलुवालिया से शादी की थी। उनके तीन बच्चे हैं। अरविंद और सुनील और एक बेटी पिंकी। 1998 में प्राण में दिल का दौरा पड़ा था। उस समय वह 78 साल के थे। साल 2013 में 93 साल की उम्र में प्राण ने अंतिम सांस ली थी।

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