गोपालगंज का वो ‘थावे’ जहां मां दुर्गा ने भगत के मस्तक को फाड़कर अपना कंगन दिखाया था

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गोपालगंज का वो ‘थावे’ जहां मां दुर्गा ने भगत के मस्तक को फाड़कर अपना कंगन दिखाया था
  • राजा मनन सिंह को रहषु भगत जी की भक्ति नहीं थी पसंद
  • राजा के हठ पर भगत जी ने माता को बुलाने का किया था आह्वान

गोपालगंज: हिन्दू धर्म में माता रानी का देवियों में सर्वोच्च स्थान है। उन्हें अम्बे, जगदम्बे, शेरावाली, पहाड़ावाली आदि नामों से पुकारा जाता है। संपूर्ण भारत भूमि पर उनके सैंकड़ों मंदिर हैं। ज्योतिर्लिंग से ज्यादा शक्तिपीठ हैं। सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ये त्रिदेव की पत्नियां हैं। इनकी कथा के बारे में पुराणों में भिन्न-भिन्न जानकारियां मिलती है। पुराणों में देवी पुराण है जिसमें देवी के रहस्य के बारे में इसकी जानकारी मिलती है।

मां दुर्गा अपने भक्तों और धरती पर धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए अनेक रूपों के प्रकट हुईं। भक्तगण इनकों अलग-अलग रूपों और अलग-अलग नामों से पूजते हैं। उपर वर्णित नामों के अलावा माता दुर्गा को कोई शीतला माता, कोई काली माता, कोई मंगला माता तो कोई मां वैष्णवी के रूप में पूजता है। माता को थावेवाली के नाम से भी जाना जाता है।

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बिहार राज्य के गोपालगंज शहर से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर सिवान जानेवाले राष्ट्रिय राजमार्ग पर थावे एक स्थान है वहीं माता थावेवाली का एक प्रसिद्ध मंदिर है। मां थावेवाली को सिंहासिनी भवानी, रहषु भवानी और थावे भवानी भी कहा जाता है। मां थावेवाली असम के कामरूप से जहां मां कामख्या का बड़ा प्राचीन और भव्य मंदिर है, ऐसा माना जाता है कि माता रानी थावे आई थी।

प्राचीन कथा के अनुसार थावे में माता कामख्या के परम भक्त श्री रहषु भगत जी रहते थे। वो माता की बहुत सच्चे मन से भक्ति करते थे और माता भी उनकी भक्ति से प्रसन्न थी। माता की कृपा से उनके अन्दर दिव्य शक्तियां भी थी। लेकिन वहां के तत्कालीन राजा मनन सिंह को उनकी भक्ति पसंद नहीं थी। राजा रहषु भगत जी को ढोंगी और पाखंडी समझते थे।

एक दिन राजा ने अपने सैनिकों को रहषु भगत जी को पकड़कर दरबार में लाने का आदेश दिया। दरबार में आने पर राजा ने रहषु भगत जी को ढोंगी-पाखंडी आदि अभद्र शब्दों का प्रयोग कर अपमानित किया और उनके माता के सच्चे भक्त होने का मजाक उड़ाया था। तब रहषु भगत जी ने राजा को विनम्रता पूर्वक समझाया कि माता की कृपा से ही मैं सबकुछ करता हूं और मेरी भक्ति से प्रसन्न होकर वो मुझे दर्शन भी देती हैं।

उन दिनों राजा मनन सिंह के घर भी माता की पूजा होती थी लेकिन माता ने कभी दर्शन नहीं दिया था और चूंकि रहषु भगत जी एक अछूत जाति के थे और माता उनको दर्शन देती हैं ये बात सुनते ही राजा अत्यंत क्रोधित हो उठे। राजा ने भगत जी को चुनौती दी कि यदि तुम वास्तव में माता के सच्चे भक्त हो तो मेरे सामने माता को बुलाकर दिखाओ नहीं तो तुम्हे दंड दिया जायेगा।

भगत जी ने राजा को बार-बार और विनम्रता पूर्वक समझाया कि महाराज अगर माता प्रकट हो गई तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिए आप अपना हठ छोड़ दीजिये और सच्चे मन से माता की भक्ति कीजिये। लेकिन राजा मनन सिंह अपने हठ पर अड़े रहे। अब भगत जी के पास माता को बुलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नहीं बचा था।

फिर क्या था भगत जी ने माता का आह्वान किया। माता ने कामरूप से प्रस्थान किया और कलकत्ता (अब कोलकाता), पटना, आमी आदि स्थानों से होते, जो क्रमश: काली, पटनदेवी, अमिका भवानी आदि नमों से प्रसिद्ध है, थावे पहुंची। माता ने भगत जी के मस्तक को फाड़कर अपना कंगन दिखाया। उनके आगमन से पूरे राज्य में प्रलय जैसी स्थिति हो गई। राजा और उनके राज-पाट का अंत हो गया।

माता ने जहां दर्शन दिया वहीं उनके मंदिर का निर्माण किया गया। रहषु भगत जी मंदिर भी माता के मंदिर के पास ही है। यह कहा जाता है कि मां थावेवाली के दर्शन के पश्चात रहषु भगत जी का दर्शन भी अवश्य करना चाहिए तभी माता प्रसन्न होती हैं।

मां थावेवाली बहुत दयालु और कृपालु हैं। अपने शरण में आए सभी भक्तों का कल्याण करती हैं। हर सुख-दुःख में लोग मां के शरण में जाते हैं और करुणामई मां किसी को भी निराश नहीं करती हैं। सबकी मनोकामना पूरी करती हैं। थावे के आस-पास किसी के घर यदि शादी-व्याह जैसा शुभ कार्य हो या किसी को कोई दुःख बीमारी हो, हर परिस्थिति में लोग माता की शरण में जाते हैं और माता उनका कार्य सिद्ध करती हैं मंगल करती हैं। मां हर घड़ी और हर सुख-दुःख में अपने भक्तों पर करुणा और ममता की छांव रखती हैं।

देश-विदेश में रहने वाले लोग जब अपने घर आते हैं तो सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण काम होता है माता थावेवाली का दर्शन करना। उनसे अपने और अपनों के लिए सुखद और समृद्ध जीवन की कामना करना। प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने आते हैं और अपनी मनोकामनायें पूरी करते हैं। परन्तु अफ़सोस इस बात की है की इतना अधिक आस्था और श्रधा का केंद्र होते हुवे भी इस स्थान का विकाश और व्यस्था जितना बढ़िया होना चाहिए उतना नहीं हुआ है। आज भी तीर्थयात्रियों के लिए दर्शन और विश्राम आदि की संतोषजनक व्यवस्था नहीं हो पायी है।

थावे की चर्चा हो तो वहां के प्रसिद्ध और अति स्वादिष्ट मिठाई पुड़िकिया को कैसे भुलाया जा सकता है। आप जब भी थावे जायें तो पुड़िकिया मिठाई अवश्य खायें।

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