सत्यपाल मलिक के बेढंगे बोल, अब अग्नवीर पर आपत्ति

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नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगातार अपने बेढंगे बोल के कारण मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक अक्सर चर्चा में आते रहे हैं.
नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगातार अपने बेढंगे बोल के कारण मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक अक्सर चर्चा में आते रहे हैं.
  • ओमप्रकाश अश्क

नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगातार अपने बेढंगे बोल के कारण मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक अक्सर चर्चा में आते रहे हैं. इस बार उन्होंने नरेंद्र मोदी से ‘अग्निवीर’ योजना वापस लेने की मांग की है. एक निजी चैनल से इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि मैं प्रधानमंत्री मोदी से हाथ जोड़कर अपील करता हूं कि वे इस योजना को वापस लें. अग्निवीर योजना नौजवानों के भलाई के लिए नहीं है. उन्होंने उन मुख्यमंत्रियों पर तंज भी कसा कि जो मुख्यमंत्री अग्निविरों को नौकरी देने का वादा कर रहे हैं, उनका ही भरोसा नहीं कि वे दोबारा मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं. उन्होंने तो यहां तक कहा कि वर्दी और न्यायालय की ही इज़्जत अभी तक बची हुई है. वर्दी वाले जनरल को टीवी पर बैठाना गलत है. न्यायालय और वर्दी की ही इज्जत बची रहनी चाहिए.

मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर सुर्खियां बटोरते रहे हैं. कुछ ही दिनों पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद बयान दिया था. उनके उस बयान से न सिर्फ पद की मर्यादा टूटती दिखी, बल्कि शब्दों की मर्यादा भी भंग हुई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद उन्होंने दोनों के बीच हुई बातचीत को सार्वजनिक कर दिया था. सभी जानते हैं कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के बीच क्या बातचीत हुई या होती है, उसे सार्वजनिक करना उचित नहीं. सीधे कहें तो मलिक के अब तक आये बयान किसी विरोधी दल या विरोधी गठबंधन के नेता के बयान से कम नहीं लगते. उन्होंने जो खुद बयान किया उसमें वह बार-बार प्रधानमंत्री के लिए “उन्हें” की जगह उसे” शब्द का प्रयोग करते दिखे थे. मलिक प्रधानमंत्री के कार्यकाल में उनकी ही कैबिनेट द्वारा नियुक्त राज्यपाल हैं. इसे सरल शब्दों में कहें तो अब तक की परंपरा के मुताबिक वह बीजेपी कोटे के तहत नियुक्त राज्यपाल ही कहे जाएंगे. उनके बोल यदि उसी भाजपा सरकार के फैसले के खिलाफ या सरकार के सर्वोच्च व्यक्ति के विरोध में निकलते हैं तो यह स्वीकार करने में किसी को हिचक नहीं होनी चाहिए कि उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा अभी खत्म नहीं हुई है. हालांकि मान्यता या धारणा यही रही है कि राज्यपाल के पदों पर वही लोग बिठाये जाते हैं, जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का पराभाव मान लिया जाता है. आखिर मलिक को शह कहां से मिलता है, जो वे सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने से बाज नहीं आते.

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किसान आंदोलन के दौरान पीएम से मिलने के बाद उन्होंने कहा था-  ‘‘मैं जब किसानों के मामले में प्रधानमंत्री जी से मिलने गया, तो मेरी पांच मिनट में लड़ाई हो गई उनसे. वो बहुत घमंड में थे. जब मैंने उनसे कहा, हमारे 500 लोग मर गए तो उसने (उन्होंने नहीं) कहा, मेरे लिए मर गए हैं? मैंने कहा, आपके लिए तो मरे थे, जो आप राजा बने हुए हो…..मेरा झगड़ा हो गया. उन्होंने कहा, अब आप अमित शाह से मिल लो. मैं अमित शाह से मिला.’

इसके बाद उन्होंने एक और बयान दिया कि मैं ईमानदार हूं, इसलिए अबतक आईटी और ईडी की कार्रवाई से बचा हूं. यानी मलिक ने यह भी साफ कर दिया कि जिन पर आईटी या ईडी की कार्रवाई होती है, वे बेईमान नहीं होते. उनकी इस पंक्ति पर फोकस करना इसलिए आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के करीबी लोगों के घरों पर जब छापे पड़ रहे थे और करोड़ों रुपये बरामद हो रहे थे, मलिक साहब के मुताबिक वे बेईमान नहीं थे. यानी समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव के उस दावे पर उन्होंने मुहर लगा दी थी कि चुन-चुन कर सपा के करीबी लोगों के यहां छापे डाले जा रहे हैं.

बहरहाल यह पहला मौका नहीं है, जब किसी राज्यपाल ने उसी सरकार के मुखिया के खिलाफ इस तरह के कटु वचन बोले हों, जिसके कैबिनेट की अनुशंसा पर उसकी नियुक्ति हुई है. सत्यपाल मलिक की नियुक्ति नरेंद्र मोदी के ही शासन काल में हुई थी. मेघालय के पहले उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल बनाया गया था. ऐसे बयान राज्यपाल तभी दे सकता है, जब उसे यह आभास हो गया हो कि अब उसके दिन लदने वाले हैं या फिर उसके भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षा अभी बाकी हो. उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले कटु बयानों के चलते मलिक को ठिकाने लगाने की कोई मंशा मोदी सरकार में क्यों नहीं दिखती, जो अक्सर उन्हें या उनकी सरकार को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश करता है.

मलिक के समय-समय पर आये तल्ख बयान

तकरीबन साल भर चले किसान आंदोलन के दौरान सत्यपाल मलिक सरकार विरोधी अपने बयानों से मोदी सरकार को परेशान करते रहे. सबसे पहले उन्होंने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोनरत किसानों की मांगों को यह जानते हुए भी जायज ठहराया कि यह केंद्र सरकार द्वारा संसद से पारित और उनकी नियुक्ति करने वाले राष्ट्रपति के हस्तार से निर्मित कानून हैं. उन्होंने इसका भी समर्थन किया कि केंद्र सरकार को एमएसपी की गारंटी देनी चाहिए. साल भर से आंदोलनरत किसानों में 600 की मौत हो गयी. यह केंद्र सरकार की गलत नीतियों का नतीजा है. विपक्ष के किसी नेता की तरह उन्होंने संवैधानिक मर्यादा भूल कर यहां तक कह दिया कि मैं किसानों के साथ खड़ा हूं. उन्होंने यहां तक भविष्यवाणी कर दी कि किसानों के विरोध की अनदेखी भाजपा के लिए भारी पड़ेगी. किसानों की बात सरकार ने नहीं मानी तो बीजेपी पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी यूपी, राजस्थान और मध्य प्रदेश में विधासभा का चुनाव हार जाएगी.

लखीमपुर कांड के बाद तो उन्होंने यहां तक कह दिया था कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा का इस्तीफा उसी दिन हो जाना चाहिए था. वह मंत्री लायक हैं ही नहीं, यह अलग बात है कि इस कांड की जांच के लिए बनी एसआईटी ने अजय मिश्र के बेटे की संलिप्तता तो लखीमपुर कांड में स्वीकार की है, लेकिन अजय मिश्र का कहीं कोई उल्लेख नहीं है.

300 करोड़ रिश्वत की पेशकश की बात कही थी

जम्मू कश्मीर का राज्यपाल रहते 300 करोड़ रुपए की घूस के ऑफर की बात कह कर उन्होंने पहली बार सबको चौंकाया था. उन्होंने कहा था- मैं जब जम्मू कश्मीर में राज्यपाल था, तब मुझे 300 करोड़ रुपये की रिश्वत देने की पेशकश की गई थी. यह पेशकश दो फाइलों को मंजूरी देने के एवज में दी जानी थी, लेकिन मैंने यह डील निरस्त कर दी थी. आश्चर्य इस बात का है कि जब ऐसी पेशकश उन्हें की गयी थी, उस वक्त उन्होंने इसका रहस्योद्घाटन नहीं किया. उनके ज्ञान चक्षु मेघालय पहुंचने के कई महीनों बाद खुले. जम्मू कश्मीर छोड़ने के बाद उन्होंने अपने काउंटर पार्ट की कार्य क्षमता पर ही सवाल दाग दिया था. उन्होंने कहा था- मेरे रहते आतंकी घुसने की हिम्मत नहीं करते थेजब मैं जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल था, तब श्रीनगर के 50 किलोमीटर के दायरे में आतंकवादियों की घुसने की हिम्मत नहीं होती थी. अब खुलेआम आतंकवादी श्रीनगर में लोगों की रोज हत्याएं कर रहे हैं.

जानिए, कौन हैं सत्यपाल मलिक
24 जुलाई 1946 को सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गांव में हुआ. उनके पिता किसान थे. मलिक ने बताया था कि जब वह दो साल के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया था. प्राथमिक शिक्षा हासिल करने के बाद उन्होंने ढिकौली गांव के एक इंटर कॉलेज में दाखिला लिया. वहीं से 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की. मेरठ कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की. पिता के निधन के बाद वह खुद खेती करते थे. इस बीच पढ़ाई का क्रम भी जारी रहा. 1968 में मेरठ कॉलेज छात्रसंघ के वह अध्यक्ष चुने गए.

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