मो. इलियास हुसैन : जनतंत्र को रखा ठेंगे पर रखा, सबको समझा रियाया!

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  • कृष्ण किसलय 

बिहार में शासन चलाने के सामंतशाही अंदाज का दो दशक पुराना एक मंजर देखिए। अवसर रोहतास जिला मुख्यालय सासाराम में प्रेक्षागृह के शिलान्यास का था। उस शाम सर्किट हाउस में हुजूर का अघोषित दरबार लगा। सासाराम के अनुमंडल पदाधिकारी तलब किए गए। जैसा कि चश्मदीदों ने बताया था, दरबारियों की भीड़ में हाजिर हुए एसडीओ को कुर्सी भी मयस्सर नहीं हुई। सवाल दागा गया, क्या मेरे विरोध में नारा लगाने की साजिश का पता नहीं था? एसडीएम का जवाब था- सर, मैंने डीएम साहब को बता दिया था। कड़क आवाज गूंजी, अगर डीएम बाप हैं तो मैं ग्रैंड फादर हूं (पदक्रम में)। एसडीओ किसने बनवाया? सर, आपने। तो फिर अपना बोरिया-बिस्तर बांध लो। वह हुजूर-ए-सरकार थे इलियास हुसैन, जो तब बिहार के पथ निर्माण मंत्री थे और नारा लगाने का इंतजाम करने के आरोपी थे सांसद छेदी पासवान। सड़कों का निर्माण कागज पर करने वाले बिहार के पूर्व पथ निर्माण मंत्री इलियास हुसैन की कहानी सत्ता के मद में सियासत में अच्छा-बुरा में फर्क नहीं देखने वाले एक ‘अंधे शाह के तख्तोताज के काफूर होने की सत्यकथा जैसी है। वह अपने निजी सचिव शहाबुद्दीन बेग और ट्रांसपोर्टर जनार्दन प्रसाद अग्रवाल के साथ फिलहाल 4 वर्ष की सश्रम कारावास भुगतने के लिए झारखंड जेल में हैं।

वह एक समय था, इलियास हुसैन की हैसियत थी कि बिना उनकी मर्जी के रोहतास में डीएम-एसपी का पदस्थापन नहीं होता था। उस वक्त वह पटना से रोहतास के दौरे पर आते थे तो उनके स्वागत में सासाराम और डेहरी-आन-सोन से दर्जनों गाड़ियों में भरकर उनके चाटुकार लोग जिले की सीमा (मुख्यत: शिवपुर) के पास उन्हें फूल-माला से लादते थे। पूरी दबंगता से जनतंत्र को ठेंगे पर रखने का दुस्साहस रखने वाले और जनता को अपनी जमींदारी मानने वाले इलियास हुसैन चाटुकारों के बीच रहना पसंद करते थे और कहा करते थे कि हम-लोग तो राज करने के लिए पैदा हुए हैं। उन्हीं हुजूरे-ए-सरकार को अदालत ने ठग-जालसाज होने की मुहर लगा कर जेल भेज दिया है।

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सड़कों का निर्माण कागज पर करने वाले बिहार के पूर्व पथ निर्माण मंत्री इलियास हुसैन की कहानी सत्ता के मद में सियासत में अच्छा-बुरा में फर्क नहीं देखने वाले एक ‘अंधे शाह के तख्तोताज के काफूर होने की सत्यकथा जैसी है। वह अपने निजी सचिव शहाबुद्दीन बेग और ट्रांसपोर्टर जनार्दन प्रसाद अग्रवाल के साथ फिलहाल 4 वर्ष की सश्रम कारावास भुगतने के लिए झारखंड जेल में हैं।  24 साल पुराने अलकतरा घोटाला के एक कांड में सीबीआई कोर्ट के विशेष जज एके मिश्र ने 27 सितम्बर को चार साल कारावास की सजा सुनाने के साथ चार व छह लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया, जिसे नहीं देने पर सजा अवधि बढ़ जाएगी। कोर्ट ने इलियास हुसैन को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13/2 का भी दोषी माना है। भारतीय दंड विधान की धारा 407, 420 व 120-बी के तहत तीनों अपराधियों को सजा सुनाए जाने के बाद कोर्ट परिसर से ही न्यायिक हिरासत (जेल) में भेज दिया गया था। इलियास हुसैन के खिलाफ अलकतरा घोटाले से जुड़े नौ कांड दर्ज किए गए थे। इनमें धोखाधड़ी के आठ, आपराधिक षड्यंत्र के सात, क्रिमिनल ब्रीच आफ ट्रस्ट के छह और दस्तावेज हेराफेरी-फर्जीवाड़ा के भी आरोप हैं। बिहार के तीन थानों डेहरी-आन-सोन, औरंगाबाद, जमुई थानों और झारखंड के पांच थानों चतरा, चाईबासा, गुमला, सरायकेला, जमशेदपुर में दर्ज हुए थे। जमशेदपुर में दो एफआईआर दर्ज हुए थे। सीबीआई ने सभी में अदालत में दायर अपने आरोपपत्र में दोष सिद्ध किया है कि इलियास हुसैन ने अलकतरा खरीद में  निर्धारित नियम के विरुद्ध आदेश दिया और ट्रांसपोर्टरों द्वारा अलकतरा खुले बाजार में बेच देने के बाद पथ निर्माण विभाग के गोदामों में अलकतरा आपूर्ति की झूठी संचिका तैयार कराई। सभी घोटाले तब के हैं, जब बिहार-झारखंड अविभाजित था। इनमें से सुपौल में 39 लाख रुपये की हेराफेरी के 1997 में दर्ज प्रकरण में 20 मई 2017 को उन्हें सीबीआई की विशेष अदालत ने बरी कर दिया और ट्रांसपोर्टर कृष्ण कुमार केडिया को सजा दी गई।

रोहतास जिले में डिहरी विधानसभा क्षेत्र भी उपप्रधानमंत्री जगजीवन राम के सासाराम संसदीय क्षेत्र की तरह अब्दुल कयूम अंसारी जैसे राष्ट्रवादी नेता के लिए अजेय रहा था। इलियास हुसैन की चाहत भी डिहरी विधानसभा क्षेत्र पर आजीवन वर्चस्व की रही। एक हद तक येन-केन प्रकारेण मुस्लिम-यादव फैक्टर को उन्होंने साधा भी। इसका उदाहरण दारोगा यादव हत्याकांड है। हत्या, डाका व अन्य संगीन अपराध के कुख्यात अभियुक्त बस एजेंट दारोगा यादव की हत्या 1990 में एक बस मालिक से रंगदारी (एजेंटी) मांगने के कारण हुई। वह हवाई जहाज से डेहरी-आन-सोन पहुंचे और दारोगा यादव के शव पर फूल चढ़ा शहीद की संज्ञा दी। जबकि सड़क दुर्घटना में घायल शहर के नामचीन शायर मीर हसनैन मुश्किल के लिए मदद की बुद्धिजीवियों की अपील उन तक नहीं पहुंच पाई। शायर की मौत दारोगा यादव से पहले हुई थी, मगर जरूरतमंद शायर परिवार की सुध उन्होंने डेहरी-आन-सोन पहुंचने के बावजूद नहीं ली। आखिर ऐसा क्यों?
इलियास हुसैन के मंत्री बनने के बाद उनके रवैया से डिहरी विधानसभा क्षेत्र और रोहतास जिले में पार्टी में अंदरूनी गुटबंदी उभरने लगी। इसीलिए मार्च 1991 में उन्होंने शिलान्यासी दौरा किया तो बांक नहर पुल शिलान्यास के वक्त काले झंडे दिखाए गए। मंत्री बनते ही मो. फारूकी हुसैन के इस बेटे के पैतृक गांव मुंजी (काराकाट थाना) और पटना (सगुना मोड़) में आलाशीन मकान खड़े हो गए। मुंजी के भवन में 63 केवीए का जेनरेटर लगा था। हुसैन परिवार ने मुंजी व पड़ोस के गांव, पटना व बिहार से बाहर भी अनेक भूखंड खरीदे। संदेह है कि अलकतरा घोटाला की रकम असम में भी छुपाई गई, जहां इलियास हुसैन की दूसरी बीवी सलमा खातून के परिवार का विचित्र तरह का कारोबार था। सलमा खातून हिन्दू परिवार की हैं, जिन्होंने शादी के बाद घरेलू नाम (अनीता हजारिका) बदल लिया। इलियास हुसैन की पहली बीवी दाउदनगर की हैं।

बतौर मंत्री सत्ता की कमान संभालने के पांच साल बीतते-बीतते शहंशाह-हुक्मरान दिखने की अतृप्त कामनावश वह अलोकतांत्रिक तानाशाह बन गए। उनके रोहतास जिले के एकछत्र शहंशाह होने में डा. कांति सिंह ने सेन्ध लगा दी। डेहरी-आन-सोन की कांति सिंह 1995 में पीरो विधानसभा क्षेत्र से विधायक बनीं तो इलियास हुसैन असहज हो गए। महसूस करने लगे कि पार्टी में उनका कद उतना ऊंचा नहीं रह गया। हुआ भी ऐसा। 1996 में काराकाट संसदीय क्षेत्र से सांसद रहे राम प्रसाद कुशवाहा के बजाय कांति सिंह को टिकट मिला। कांति सिंह जीतकर केंद्र सरकार में कोयला राज्य मंत्री बनीं। कांति सिंह के अवतरण के पहले से ही इलियास हुसैन की सासंद छेदी पासवान से वर्चस्व की जगजाहिर जंग की वजह से पार्टी में वक्र समीकरण बना हुआ था।

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इलियास हुसैन की आंतरिक इच्छा के विरुद्ध कांति सिंह के राजनीतिक अवतरण, जिले में उनके बढ़ते कद और डिहरी विधानसभा क्षेत्र में चुनावी जीत के लिए यादव वोट बैंक का बड़ा महत्व होने के कारण इलियास हुसैन अपनी कुंठा प्रकट नहीं कर पाते थे। कांति सिंह के मिलने-जुलने के अनकूल सरल रुख और उनके भाई डा. राजेंद्र प्रसाद सिंह के स्थानीय परिचय होने से कांति सिंह की स्थानीय खबरें अखबारों में इलियास हुसैन से अधिक जगह पाती थीं। इलियास हुसैन को लगता था कि स्थानीय पत्रकार उन्हें अलोकप्रिय बनाने की मुहिम में हैं। यही वजह थी, 1995 में उनके प्रिय अफसर मो. सलाहुद्दीन खां ने चुनाव आयोग से जारी अनुमति-पत्र के बावजूद गड़बड़ी लीक होने के भयवश पत्रकारों को मतगणना स्थल के भीतर जाने से रोकने की कोशिश की थी।

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1998 में इलियास हुसैन पार्टी में टिकट बांटने वाली कमेटी में थे। बिक्रमगंज से कांति सिंह के नाम की घोषणा अंतिम समय में रुक गई। कांति सिंह मायके (डिहरी-आन-सोन) में थीं। तब तक इलियास हुसैन के सामने होने या याचक की स्थिति से बचती रहने वाली कांति सिंह को इलियास हुसैन के आवास पर जाना पड़ा। तब रुका हुआ उनका टिकट उन्हें मिला। इलियास हुसैन को यह बात खटकती थी कि स्थानीय पत्रकार उन्हें उतना तरजीह क्यों नहीं देते, जबकि पदक्रम में मुफस्सिल के पत्रकारों से बड़ा होने के बावजूद राजधानी के पत्रकार महत्व देते हैं। उन्हें यह जरूर पता होगा कि अपने बीट (विभाग) की खबरों के लिए वरिष्ठ संवाददाता के लिए संबंधित मंत्री-अफसर से नियमित संपर्क रूटीन कार्य है।
उन दिनों जनतंत्र को ठेंगे पर रखने की मानसिकता, आम लोगों को हथजोड़ रियाया समझने के सामंती चरित्र के कारण इलियास हुसैन की छवि कई तरीकों से उकेरी जाने लगी थी। बीती सदी के आखिर में भोजपुरी भाषा की यह वक्रोक्ति डेहरी-आन-सोन से पटना तक के राजनीतिक गलियारों में और सार्वजनिक मंचों पर चलन-कहन में आ चुकी थी- ‘ए भइया, तोहार पेट ह कि ड्राम, पत्थर खा ल, अलकतरा पीये ल, तू कइसे जीये ल, ए भईया…।

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