बिलखती बहन ने भाई को मुखाग्नि देकर तोड़ी समाज की बेड़ियां

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शुभम की फाइल फोटो

पूर्णिया (बिहार)। जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर गढ़िया बलुआ पंचायत के गढ़िया गांव में सोमवार 14 जनवरी को एक बहन ने दर्दनाक हादसे में मृत 22 वर्षीय अपने बड़े भाई की चिता को मुखाग्नि दी। वैसे तो यह खबर एक सामान्य खबर की तरह है, मगर सामाजिक नजरिए से देखें तो बदलाव का यह बहुत बड़ा संदेश है, जो सामाजिक कुरीतियों को तोड़ने वाला, समाज में महिलाओं को बराबरी का हक देने वाला और समाज की प्रगतिशील होती विचारधारा का वाहक है। वह भी तब, जब इस तरह का बदलाव एक ऐसे इलाके में हो, जिसे सरकारी आंकड़ों में पिछड़े इलाकों में गिना जाता है और जहां की ज्यादातर आबादी पिछड़ों, दलितों और मुसलमानों की हो। ऐसे इलाके में इस तरह का सामाजिक बदलाव अपने आप में बहुत बड़ी बात है। कोई भी समाज अगर खुद ही अपनी कुप्रथाओं को तोड़ने आगे आता है और इस तरह की पहल करता है तो इससे बेहतर कुछ और नहीं हो सकता।

गढ़िया गांव के हजारी कुमार मेहता के 22 वर्षीय इकलौते बेटे शुभम कुमार की शनिवार 12 जनवरी को राजस्थान के जयपुर में करंट लगने से दर्दनाक मौत हो गई थी। शुभम जयपुर के ज्ञान विहार यूनिवर्सिटी में बीएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई कर रहा था। शनिवार को वह बाथरूम में नहाने गया था। नहाने का पानी गर्म करने के लिये उसने बाथरूम में इमर्सन रॉड लगा रखा था। उसी से उसे करेंट लग गया। बाद में उसे दरवाजा तोड़ कर बाहर निकाला गया और तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।

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शुभम के दोस्तों ने घटना की जानकारी शुभम के पिता को दी तो वे अवाक रह गए और उनके पैरों तले की जमीन खिसक गई। दिल्ली में रहने वाले शुभम के परिजनों को भी घटना की जानकारी मिली तो वे तत्काल जयपुर रवाना हो गए और वहां से शुभम की लाश लेकर गांव पहुंचे जहां उसका अंतिम संस्कार किया गया।

शुभम दो बहनों का अकेला भाई था। बड़ी बहन की शादी हो चुकी है और छोटी बहन शिखा कुमारी कोलकाता में पढ़ रही है। घर-परिवार में जब चिता को मुखग्नि देने की बात उठी तो सभी ने इस बात का समर्थन किया कि शिखा ही मुखाग्नि देगी। बाद में इस बात का गांव वालों ने भी बिना किसी प्रतिवाद के समर्थन किया। मुश्किल घड़ी में इस तरह का फैसला न सिर्फ बड़े सामाजिक बदलाव का प्रतीक है, बल्कि कुरीतियों के खिलाफ उठ खड़े होने और बेटियों को बराबरी का हक देने की बदलती मानसिकता का भी परिचायक है।

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बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश में अगर इस तरह की चेतनाएं सकारात्मक बदलाव ला रही हैं तो यह अच्छा संकेत है। हालांकि बदलाव की रफ्तार धीमी है और चुपके से हो रही है, फिर भी यह प्रदेश और देश के बेहतर भविष्य के लिए अच्छा है।

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