कैंसर से जूझ रहे हैं कई अखबारों के संपादक रहे श्याम आचार्य

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अस्पताल के बेड पर श्याम आचार्य
अस्पताल के बेड पर श्याम आचार्य

कैंसर से जूझ रहे हैं कई अखबारों के संपादक रहे श्याम आचार्य। उनके साथ काम कर चुके पत्रकार प्रकाश चंडालिया ने अपने एक पोस्ट में बताया है। आचार्यजी के साथ पांच साल तक जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में काम करने का प्रकाश जी को मौका मिला। प्रकाश चंडालिया बताते हैं कि वे जितने अच्छे संपादक थे, उतने ही अच्छे अभिभावक।

  • प्रकाश चंडालिया

नवभारत टाइम्स एवं जनसत्ता जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के सम्पादक रहे वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम आचार्य इन दिनों जयपुर के साकेत अस्पताल में कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहे हैं। साकेत अस्पताल के संचालक स्वयं उनकी बेहतरीन चिकित्सा के लिए तत्पर हैं। पिछले दिनों राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उनसे मिलने अस्पताल आए और हालचाल पूछा। उन्होंने अस्पताल प्रबंधन को भी कहा कि आचार्यजी का बेहतर से बेहतर इलाज हो।

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मेरा सौभाग्य रहा कि जनसत्ता के कोलकाता संस्करण में आचार्य जी के सानिध्य में पांच साल तक काम करने का मौका मिला। जितने अच्छे सम्पादक, उससे कहीं अधिक एक नेक और हमदर्द इंसान। पूरी टीम के गार्जियन। संवाददाता या उपसम्पादक से कोई ऐसी भूल हो जाए कि दिल्ली खबर लेने लगे तो दोष खुद पर लेने को तत्पर।

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मुझ जैसा लेट लतीफ दर्जनों बार की चेतावनी के बावजूद सुबह 11 बजे रिपोर्टर्स मीटिंग में उपस्थित न रह पाए तो भी वर्षों तक झेलने का संयम। पांच साल की इण्डियन एक्सप्रेस की नौकरी में जब कभी एक पेज का चिट्ठा लेकर सर के चेम्बर में घुसा, तो बगैर देखे पेपरवेट से दबाकर रख देना और कहना कि क्या बात हो गयी, फिर इस्तीफा। यह क्रम दो-एक बार का नहीं, पांच साल में एक दर्जन से अधिक बार चला। आपको शायद ही यकीन हो, पर हर बार आचार्यजी ने बगैर पढ़े, मेरे चिट्ठे का मजमून भांप लिया औऱ सामने ही डस्टबीन में फेंका।

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27 वर्षों के बाद आज जब अतीत के पन्ने उड़ रहे हैं तो सोचता हूं, यदि कोई दूसरा सम्पादक होता तो क्या होता। अमित प्रकाश सिंह जैसे समाचार सम्पादक औऱ गंगा प्रसाद जैसे मुख्य संवाददाता की हरकतों और प्रपंचों पर साथी लोगों ने भले ठकुरसुहाती राग अपना लिया था, पर अप्पन तो पेंच ही लड़ाते रहे। वास्तव में आचार्यजी का व्यक्तित्व पिता-समान रहा। एक बार जब इस्तीफा देकर जिद्द पर अड़ा रहा तो मेरे सामने ही मेरी धर्मपत्नी को फोन लगाकर पूछना कि प्रकाश आज किस बात पर लड़कर घर से निकला…। और एक बार जब घुटन इतनी बढ़ गयी कि इस्तीफा सौंपकर तय कर लिया कि किसी हाल में जनसत्ता में नहीं लौटेंगे तो लगभग देसक दिन तक उस पत्र को इस प्रतीक्षा में दबाए रखना कि बन्दा आज नहीं तो कल, सुधर कर लौटेगा ही। आज सोचता हूं, वह इस्तीफा यदि प्रभाष जोशी के पास दिल्ली भेज दिया गया होता तो…।

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आचार्यजी दफ्तर में जितने वात्सल्यमयी व्यक्तित्व के धनी थे, निजी जीवन में उतने ही संकोची और स्वाभिमानी। सम्भवतः 1996-97 के आसपास जब जनसत्ता ने उन्हें रिटायर किया और वे जयपुर लौटने वाले थे। उन्हीं दिनों जुगलकिशोर जैथलिया अपने दो-एक अन्य साथियों के साथ मुझे साल्टलेक स्थित उनके घर लेकर गए। हमारा आन्तरिक उपक्रम था कि जैसे-तैसे उन्हें एक लाख रुपए की थैली स्वीकार करने के लिए राजी किया जाए। पर यह बात उन्हें सीधे-सीधे बताई भी नहीं जा सकती थी। बहरहाल, घर पहुंचने पर आचार्यजी ने अपने प्रिय गरम पराठे औऱ दही का नाश्ता करवाया।

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जब हम लोग उन्हें घेर कर जैसे-तैसे सम्मान के लिए राजी कराने के लिए इधर-उधर की बातें करने लगे, तो उन्होंने एक ही वाक्य में हम सभी को धराशायी कर दिया। साफ मना कर दिया। नहीं माने तो नहीं ही माने। जयपुर लौटने के बाद उन्होंने नवज्योति, पाथेय कण, दैनिक भास्कर जैसे समाचारपत्रों के लिए काम किया या लिखा। एक देसी पत्रकार- जो कलम और निजी जीवन के सिद्धान्तों में कभी फासला नहीं रखता था। सुविधाभोगी भी कभी नहीं रहे। प्रभाषजी के भक्तों को भले बुरा लगे, पर मैं दावे से कहना चाहूंगा कि प्रभाषजी ने जरूर सुविधाएं भोगीं, पर आचार्यजी इस मामले में भी संकोची रहे।

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ऐसे महान व्यक्तित्व का जीवन और भी कई मायनों में नियंता ने इम्ताहन के लिए बनाया। वर्षों पहले उनकी धर्मपत्नी चली गयीं। अभी कुछेक वर्षों पहले ज्येष्ठ पुत्र भूषण भी चले गए। जीवन में आयी तमाम दुश्वारियों को साहस और संयम के साथ परास्त करने वाले सर (आचार्यजी) कैंसर को भी परास्त कर दें, यही प्रार्थना है। सर, आप जल्द स्वस्थ हों, आपके श्रीमुख से बार-बार सुनना है..कैसे हो प्रकाश…सीमा कैसी है, चिराग-चमन कैसे हैं…और लाला…क्या चल रहा है….।

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साकेत अस्पताल के मालिकान की उदारता को नमन, जिन्होंने अस्पताल में ही हाल में उनके काव्य-संग्रह के लोकार्पण का प्रबन्ध किया। इसमें पद्मभूषण विभूषित, पूर्व सेबी चेयरमैन और आचार्यजी के मित्र डी.आर. मेहता सहित अनेकानेक लोग उपस्थित हुए।

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