उसे मत मारो ओशो के निजी सचिव आनंद शीला की दास्तान

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  • नवीन शर्मा

ओशो रजनीश की पूर्व निजी सचिव मां आनंद शीला ने अपने संस्मरण ‘उसे मत मारो, भगवान रजनीश के साथ मेरे जीवन की कहानी में अपने उस समय के अनुभव, अवलोकन और भावनाएं व्यक्त की हैं, जब वे ओशो रजनीश के साथ काम कर रही थीं। वर्ष 1949 में बड़ौदा के एक गुजराती परिवार में जन्मीं शीला अंबालाल पटेल कहती हैं कि वे ओशो से बहुत प्रेम करती थीं और उन पर आंख मूंदकर भरोसा करती थीं। 1981 में ओशो रजनीश की सहायक के रूप में नियुक्त हुईं शीला ने 1985 में इस पद को छोड़ दिया था। इसके बाद वे यूरोप चली गईं। ओशो के पतन के बारे में शीला लिखती हैं कि उनका पतन ओरेगन में दर्दनिवारक दवाओं और अन्य नशीले पदार्थों पर उनकी निर्भरता से शुरू हुआ।

शीला ओशो से अपने इस अलगाव का कारण उनका एक साथ 15 राल्स रायस खरीदने की जिद तत्कालिक वजह बनी। इसके लिए पैसे जुगाड़ करने के लिए ओशो ने अपने कई संन्यासियों को आत्मज्ञानी घोषित कर दिया था। शीला इससे नाखुश थीं।

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शीला के अनुसार कथित तौर पर ओशो शीला के इस ‘विश्वासघात’ पर बहुत नाराज हुए थे और उन्होंने उस पर जैव-आतंकी हमले की योजना बनाने, हत्या का षड्‍यंत्र रचने और 55 करोड़ डॉलर लेकर भागने का आरोप लगाया था। शीला इनमें से कुछ आरोपों की दोषी निकलीं और उन्होंने 39 माह जेल में बिताए।

शीला कहती हैं कि ओशो बहुत करिश्माई, प्रेरक, शक्तिशाली, प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व वाले थे और साथ ही वे बेतुके ढंग से चालाक, प्रतिशोधी, खुद के बारे में सोचने वाले और हानि पहुंचाने वाले भी थे। उन्होंने हर समुदाय, समाज और देश के सभी नियमों, नैतिकताओं, नीतियों और वैधताओं का उल्लंघन किया, क्योंकि वे अपने नजरिए वाले ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें उनके अपने नियम और कायदे हों। ओशो व.उसके संन्यासियों की सेक्स के प्रति खुलेपन ने कई लोगों को उनका विरोधी बनाया था। शीला ने ओशो के उनकी नर्स विवेक से शारीरिक संबंधों के बारे में भी साफ साफ लिखा है। यहां तक की गर्भपात कराने तक जिक्र भी किया है। आश्रम के अन्य संन्यासियों के तो कईयों के साथ संबंध बनाने की बात लिखी है।

ओशो का उत्थान व पतन :  किताब में शीला लिखती हैं कि मैं इस बात की गवाह बनी कि इस खेल में बंबई और पूना में वे किस तरह शीर्ष पर थे, किस तरह उन्होंने अपना समुदाय खड़ा किया। किताब में मुंबई के छोटे से फ्लैट से पूना के कोरेगांव में आश्रम तक का विस्तार कैसे हुआ, इसकी एक झलक मिलती है। इसके बाद अमेरिका के ओरेगन में वीरान जगह पर जमीन खरीद कर कम समय में आधुनिक सुविधाओं से युक्त शानदार व सुंदर आश्रम किस तरह अस्तित्व में आया, इसका बड़ा रोचक व विश्वनीय विवरण दिया गया है। यह ओशो और उसके संन्यासियों की मेहनत और दौलत का शानदार उदाहरण था। मां आनंद शीला ने इस का बेहतर तरीक़े से नेतृत्व किया था।

ओशो के पतन के बारे में शीला लिखती हैं कि उनका पतन ओरेगन में दर्दनिवारक दवाओं और अन्य नशीले पदार्थों पर उनकी निर्भरता से शुरू हुआ। जिसके फलस्वरूप गिरावट आनी शुरू हो गई और फिर समुदाय का विघटन हो गया। किस तरह वे लोगों के साथ काम करते थे और किस तरह विवाद पैदा करके उन्होंने मीडिया को बरगलाया। ओशो ने विवादित बयानों से मीडिया की.सुर्खियों में रहकर मुफ्त का प्रचार पाया।

ओशो को अपनों ने ही लूट लिया :  शीला को लगता है कि ओशो को उनके अपने ही लोगों ने लूट लिया। वे कहती हैं- ‘मेरे दिल में उनकी शिक्षाओं के लिए बहुत आदर भाव है और आज भी मैं उनकी भक्त हूं।’ आज उनकी संन्यासी शिष्याएं भी रजनीशपुरम के बारे में बात करने में डर और शर्म महसूस करती हैं। मेरी राय में लोगों ने उनके जीवन के बहुत महत्वपूर्ण समय के बारे में बात न करके उन्हें कमजोर कर दिया।

ओशो की मौत के बारे में शीला दावा करती हैं, ‘आज भी मैं यह नहीं मानती कि वह एक प्राकृतिक मौत थी। अगर वह प्राकृतिक होती तो मैं उसे जरूर महसूस करती।’ किताब के शुरुआती अध्यायों में उस समय का जिक्र है, जब लेखिका रजनीशपुरम छोड़कर गईं और उन्हें कानूनी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। किताब के दूसरे भाग में शीला शुरुआत से कहानी बयां करती हैं, जब 1972 में 20 साल की उम्र में वे ओशो के अभियान में शामिल हुई थीं।

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