हेलमेट व किताबें बांट कर बच्चों का जीवन बचा व संवार रहा युवा

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हेलमेट और किताबें बांटना जिनका जुनून है
हेलमेट और किताबें बांटना जिनका जुनून है

पटना में अक्सर एक आदमी कभी हेलमेट बांटते दिखता है तो कई दफा जरूरतमंद छात्रों को किताबें देते। सेकेंड हैंड किताबों से उसने बुक बैंक बना लिया है। एक बार मुलाकात में अपने इस अभियान के बारे में उस आदमी ने विस्तार से बताया। युवक का नाम है राघवेंद्र कुमार। 32 साल के इस युवा के मन में शिक्षा का संस्कार बांटने की ललक इतनी है कि उसने नौकरी छोड़ अपने को इसी काम में समर्पित कर दिया है। उसकी कहानी पढ़ें, उसी की जुबानी।

मैं राघवेंद्र कुमार हेलमेट मैन के नाम से जाना जाता हूं। मेरा यह नाम लोगों ने दिया है और मेरे काम का दायरा पूरा भारत है। मैं बिहार के कैमूर भभुआ जिले के थाना रामगढ़, ग्राम बगाढ़ी का निवासी हूंl

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मेरे हेलमेट मैन बनने की कहानी ग्रेटर नोएडा से शुरू होती हैl मैं वहां लॉ की पढ़ाई कर रहा था। मेरा रूम पार्टनर कृष्ण कुमार इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। हम दोनों गहरे दोस्त थे। जब वाह फाइनल ईयर में था, रोड एक्सीडेंट में उसकी डेथ हो गयी। वजह बतायी गयी हेलमेट नहीं पहनना। वह मां-बाप का इकलौता बेटा था। माता-पिता ने शादी के 20 साल बाद उसकी वजह से आंगन में किलकारी सुनी थी।

जाहिर-सी बात है कि मां-बाप के बुढ़ापे का वही एक सहारा था। माता-पिता भी उसे दिलोजान से मानते थे। जब बाइक एक्सीडेंट में उसने अपनी जान गंवा दी, उसके बाद मां-बाप पर मुसीबतों का पहाड़ तो टूटना ही था।  इस घटना ने मुझे भी झकझोर कर रख दिया। तभी से मैंने सोच लिया कि हेलमेट की आवश्यकता-अनिवार्यता पर अभियान चलाऊंगा, ताकि भविष्य में किसी मां-बाप को अपनी संतान को खोने का दुख न झेलना पड़े।

आए दिन हेलमेट न पहनने के कारण ऐसी घटनाएं देखने-सुनने को मिलती रहती हैं। सिर्फ एक हेलमेट न लगाने के कारण ही तो ऐसे दिन देखने पड़ते हैं। मैंने अपने मित्र के साथ घटी घटना से सबक लेकर लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाना शुरू किया।

यह घटना मेरे दोस्त के साथ 2014 में हुई थी। 2015 से लोगों को हेलमेट देकर जागरूक करने का अभियान शुरू किया। जब लोग मेरे हाथ में देने के लिए लोग हेलमेट देखते थे तो उनके चेहरे पर खुशी झलकने लगती थी। शायद वे इस बात से खुश होते थे कि रास्ते में किसी अजनबी ने उन्हें हेलमेट दे दिया। मैं जितने हेलमेट बांटता, उतनी ही खुशी मुझे मिलती। सुकून भी मिलता। जब अपने दोस्त कृष्ण कुमार की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद मैं उसके घर गया था, तो उसकी किताबें मैंने किसी गरीब बच्चे को दे दी थी। किताबें मुफ्त में मिल जाने पर उस बच्चे के चेहरे की खुशी मुझे अब तक याद है।

इसके बाद हेलमेट और किताबें बांटना मेरा शगल बन गया। मैं अपने कार्य में आगे भढ़ता गया। एक दिन अचानक मेरे फोन पर कॉल आया, एक मां का। वह बता रही थी कि उसके जिस बेटे को मैंने अपने दोस्त की किताबें दी थीं, उसका बेटा उन्हीं किताबों को पढ़ कर पूरे जिले में प्रथम स्थान पाया हैl  यह सुनकर मुझे कितनी खुशी मिली, उसे बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं यह सोचने लगा कि जिस मां-बाप का बेटा दुनिया से चला गया, उसकी किताबों ने   एक और मां-बाप का घर आबाद कर दिया। यहीं से मेरे मन में बुक बैंक की परिकल्पना ने जन्म लिया।

मैंने सोचा, क्यों न लोगों से पुरानी किताबें लेकर हेलमेट दिया जाये और भारत के कोने-कोने तक एक अभियान के तहत सड़क सुरक्षा और शिक्षा दोनों में जागरूकता फैलायी जाये। फिर मैं अपने कार्य जुट गया। जो लोग मुझे पुरानी किताब देते हैं, उसके बदले में मैं उनको हेलमेट देता हूं।

अब तक भारत के 9 राज्यों को मैंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। 20000 हेलमेट बांट चुका हूं और डेढ़ लाख बच्चों तक इस अभियान से किताबें दे चुका हूं। इस कार्य में जो भी अब तक खर्च हुआ है, वह आम आदमी के शब्दों में अपनी संपत्ति की बर्बादी ही कही जाएगी, लेकिन मेरे लिए यह सेवा धर्म है। मैंने अपनी जेब से ही अभियान की शुरुआत की थी। मैंने दिल्ली में अपने लिए मकान खरीदा था, उसे भी बेच कर मैंने अपने मिशन पर खर्च कर दिया।

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इस सेवा कार्य की वजह से मैं काफी आर्थिक संकट में फंस गया था। इसीलिए मकान बेचना पड़ा। लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने नेक काम में ये पैसे खर्च किये। मेरे जीवन में इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव भी नहीं पड़ा है। मैं इसी से खुश हूं कि मेरी वजह से आज कई घरों में खुशियों की बरसात हो रही है।

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मैंने सोच लिया है कि आजादी के 70 साल बाद भी 100% लोग साक्षर नहीं हुए। आज भी 30% लोग शिक्षित नहीं हैंl मैं यह चाहता हूं जो शिक्षित लोग हैं, वे समाज में देखें कि कौन-सा बच्चा शिक्षा से वंचित हो रहा है। उसको साक्षर बनाने का प्रयास करें और उसे जागरूक करें। इससे हमारा भारत सशक्त और शक्तिशाली तो बनेगा।

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इस कार्य में जब मेरे पास पैसे की कमी हो गई तो अब शहर में जगह जगह ER11  बुक बैंक बॉक्स लगाना चालू किया कर दिया है। इस बॉक्स की एक खासियत है। आपके पास कोई भी पुरानी किताब है, उसको बॉक्स में डाल दीजिए और जब यह बॉक्स भर जाता है तो किताबें निकाल कर हम लोग अलग-अलग क्लास के लिए अलग-अलग पुस्तकों का बंडल बनाते हैं और सिक्स क्लास से ट्वेल्थ क्लास के बच्चों को निःशुल्क देते हैं।

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आपको किसी भी क्लास की किताब लेनी है तो आप अपने पिछले क्लास की किताब दें और जरूरत की किताब ले जाएं। अभी ऐसे बॉक्स दिल्ली महानगर में हरिद्वार, फरीदाबाद, बनारस, पटना में लगे हुए हैं। यह बॉक्स सड़क सुरक्षा और शिक्षा दोनों का कार्य कर रहा है। मैंने अपने कार्यक्रम को ER11 बुक बैंक के नाम से चलाता हूं।

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जो बच्चा हमसे किताब ले रहा है और दे रहा है, उसका हम एक लिस्ट तैयार कर रहे हैं। अगर वह बच्चा आगे चलकर पढ़ने में अपने मुकाम हासिल करता है। अगर आईआईटी क्वालीफाई करता है तो उसके लिए हम राज्य सरकार से सिफारिश करेंगे कि उसकी फीस सरकार दे और इस तरह से 11 बच्चों को शिक्षा में आगे बढ़ाये। हम जागरूक करेंगे कि जो बच्चे पास हो गए हैं, अपनी पुरानी किताबें बुक बैंक को दे दें, ताकि ऐसे बच्चों को मदद मिले। जो किताब खरीदने में असमर्थ हैंl ER11 का मतलब है 11 बच्चों का भविष्य बनाना पुरानी किताबों से।

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