राम जी करेंगे बेड़ा पार, सरकार कोर्ट में तो संत शिलान्यस पर अड़े

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नयी दिल्ली। 2019 के लोकसभा चुनाव की दौड़ अपने अंतिम पड़ाव में एंट्री कर चुकी है। उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन मैदान मारने की ताल ठोंक रहा है। सबको मुद्दे चाहिए। चुनावी सर्वे में अपनी हालत कमजोर देख भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की दिशा में पहलकदमी की है तो कुंभ में संतों के समागम में 21 फरवरी को मंदिर की आधारशिला रखने का फैसला हो चुका है। यानी चुनाव में एक बार फिर राम मंदिर के बड़ा मुद्दा बनने के संकेत मिल रहे हैं। नरेंद्र मोदी नीत राजग सरकार के सहयोगी दल जदयू व लोजपा राम मंदिर पर आध्यादेश लाने पर विरोध जता चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में लगातार टल रही सुनवाई से भाजपा समर्थक वोटर निराश व हताश हैं। इस बीच केंद्र सरकार ने अयोध्या में राम मंदिर को बनाने के लिए अपनी एक और चाल चल दी है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अधिगृहीत भूमि में गैर विवादित भूमि राम मंदिर न्यास को लौटाने की अपील की है।

कानूनी सलाहकारों के अनुसार सरकार को सुप्रीम कोर्ट में चल रहे किसी मुकदमे में अध्यादेश लाने का पूरा अधिकार है, लेकिन देश की आजादी के बाद से कभी ऐसा नहीं हुआ है। ऐसे में अगर सरकार अध्यादेश लाती है तो उस पर न्यायपालिका के काम में हस्तक्षेप करने का आरोप लगेगा। लेकिन यदि सरकार गैर-विवादित ज़मीन को न्यास को सौंप देती है तो उसमें न्यास मंदिर के निर्माण का काम शुरू कर सकता है। बाकी की विवादित जमीन के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जा सकता है। दरअसल, सरकार के एक धड़े का मानना है कि बिना अध्यादेश के भी मंदिर का काम शुरू किया जा सकता है, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को चुनाव में मिलेगा। और नहीं तो भाजपा के पास यह कहने का अवसर मिल जायेगा कि उसने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी है। अंदरखाने की खबर है कि  कानून मंत्रालय ने जो रिपोर्ट सरकार को सौंपी है, उसके अनुसार सुप्रीम कोर्ट यदि जमीन न्यास को सौंप देता है तो उस पर जल्द से जल्द निर्माण कार्य शुरू किया जा सकता है। हालांकि, यह रास्ता इतना आसान नहीं है।

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सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सरकार की इस तरह की किसी भी पहल का विरोध करने का दावा कर रहा है। उसका कहना है कि अधिगृहीत जमीन में कुछ जमीन मुसलमानों की भी है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में अधिगृहीत जमीन के बारे में जो सलाह दी थी, उसके अनुसार वहां किसी भी हालत में सरकार मंदिर का निर्माण नहीं कर सकती। बोर्ड के नुमाइंदा जिलानी ने साफ किया कि एक बार सुप्रीम कोर्ट सरकार की अपील स्वीकार कर ले तो उसके बाद वह अपने कानूनी दांव खोलेंगे।

दरअसल अयोध्या में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाई थी। सरकार ने कहा था कि अयोध्या में सिर्फ 2.77 एकड़ जमीन पर विवाद है और बाकी जमीन पर कोई विवाद नहीं है, इसलिए जमीन का कुछ हिस्सा राम जन्मभूमि न्यास को दे दिया जाए।

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप की मानें, तो सरकार गैर विवादित जमीन पर जब चाहे मंदिर का निर्माण शुरू करा सकती है। इसके लिए सरकार को सिर्फ गैर-विवादित जमीन मंदिर निर्माण करने वाले ट्रस्ट को स्थानांतरित करनी होगी। निर्माण का काम शुरू होने के बाद सरकार चाहे तो अध्यादेश ला सकती है या सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर सकती है। हालांकि, अध्यादेश के मामले में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील लोहाटी का मानना है कि जब कोई मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा हो, तो ऐसे में सरकार को अध्यादेश लाने से बचना चाहिए। वैसे सरकार के पास अध्यादेश लाने का पूरा अधिकार है और सरकार जब चाहे अध्यादेश ला सकती है।

अब इतनी जल्दी में क्यों है सरकार

हिंदी पट्टी के हालिया हुए तीन प्रदेशों में भाजपा को मिली करारी हार के पीछे पार्टी समर्थक वोटरों में निराशा बताई गई थी। इसलिए मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए सरकारी नौकरियों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण देने का संविधान संशोधन बिल पारित किया। इससे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में बीजेपी को नाराज सवर्ण समर्थकों को मनाने में काफी हद तक मदद मिली। लेकिन बीजेपी को मिले फीडबैक में यह कहा गया कि राम मंदिर पर भी सरकार को कुछ करना होगा, ताकि उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन की काट खोजी जा सके।

रामलीला मैदान में मिल गया था संकेत

राम मंदिर को लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं की भावना  का एक नमूना दिल्ली के रामलीला मैदान पर पिछले दिनों हुई राष्ट्रीय परिषद की बैठक में अध्यक्ष अमित शाह के भाषण के दौरान देखने को मिला था। उन्होंने जैसे ही अयोध्या का नाम लिया था, देश के कोने-कोने से आए पार्टी के हजारों कार्यकर्ताओं ने इस कदर जयश्री राम के नारे और तालियां बजाईं कि शाह को अपना भाषण काफी देर तक रोके रखना पड़ा था। सबसे ज्यादा आवाज़ उस कोने से आई, जहां उत्तर प्रदेश और बिहार से आए बीजेपी  कार्यकर्ताओं को बैठाया गया था। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाने से इनकार किया था, लेकिन उत्तर प्रदेश-बिहार से मिले फीडबैक के बाद तय किया गया कि इस मुद्दे पर अब कोई न कोई ठोस कदम उठाना जरूरी है, ताकि हिंदुत्व के वोट बैंक को दुरुस्त किया जा सके।

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