3 फरवरी को राहुल तो 3 मार्च को मोदी गरजेंगे गांधी मैदान में

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नरेंद्र मोदी के निशाने पर राहुल गांदी
नरेंद्र मोदी के निशाने पर राहुल गांधी

एनडीए में सभी घटक दल देंगे साथ, महागठबंधन में दिख रही गांठ ही गांठ

पटना। कांग्रेस अध्यक्ष और देश भर में एकजुट हो रहे विपक्षी महागठबंधन की पटना के गांधी मैदार में 3 फरवरी को रैली है। बिहार में विपक्षी दलों का मजबूत महागठबंधन होने के बावजूद राहुल के मंच पर घटक दलों का कोई नेता नहीं होगा। पटना में कांग्रेस की रैली के महीने भर बाद 3 मार्च को एननडीए की सभा उसी गांधी मैदान में होगी, जहां जदयू के नेता नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी 9 साल बाद एक मंच पर दिखेंगे। यानी बिहार में साफ तौर पर विपक्षी एकता की हवा निकलती दिख रही है।

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लोकसभा चुनाव से महीने-डेढ़ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 3 मार्च को गांधी मैदान में सभा को एक साथ संबोधित करेंगे। लोजपा के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान भी रैली का हिस्सा बनेंगे। यानी एनडीए की एकजुटता तो दिखेगी ही, चुनावी बिगुल भी एनडीए बजा देगा।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की रैली 3 फरवरी को गांधी मैदान में ही होगी। महीने भर बाद 3 मार्च को मोदी की रैली है। दोनों रैलियों में जुटी भीड़ दोनों नेताओं को बिहार का मूड भांपने का औजार साबित होंगी। हां, राहुल की रैली की खासियत एक मायने में यह होगी कि तकरीबन तीन दशक बाद कांग्रेस अपने दम पर बिहार में इस तरह का आयोजन कर रही है।

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एनडीए की रैली की खास बात यह होगी कि 9 साल के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी चुनावी सभा में एक मंच पर होंगे। आखिरी बार 2010 में पंजाब के लुधियाना में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ने एनडीए के लिए टुनाव प्रचार किया था। जदयू 1998 से ही एनडीए का हिस्सा रहा है। बीच के दो-ढाई साल छोड़ दें तो नीतीश लगातार एनडीए के लिए चुनाव प्रचार करते रहे हैं। जून 2013 से जुलाई 2017 तक वह एनडीए से अलग रहे।

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नरेंद्र मोदी की रैलियों में वैसे भी भीड़ खूब जुटती है, लेकिन इस बार नीतीश का जदयू और राम विलास पासवान की लोजपा भी भाजपा के साथ है। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि भारी भीड़ जुटेगी। नीतीश खेमा यह दावा करता रहा है कि बिहार एनडीए में नीतीश बड़ा भाई हैं। यानी नीतीश के सामने भी यह चुनौती होगी कि वह गांधी मैदान की सभा को ऐतिहासिक बनाने का पूरा प्रयास करें। सीट बंटवारे में नीतीश को भाजपा ने बड़ा तो नहीं, लेकिन पिछले चुनाव में महज दो सीटें जीतने के बावजूद भाजपा ने उन्हें बराबर का हक दे दिया है।

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महागठबंधन की गांठ खींचतान में उलझती जा रही है। अभी तक सीटों के बंटवारे का स्वरूप महागठबंधन तय नहीं कर पाया। बिहार कांग्रेस इस हाल में नहीं है कि वह अपनी शर्तें थोप सके। वैसे भी कांग्रेस में सारे निर्णय आलाकमान के स्तर पर होते हैं। कांग्रेस के पास बिहार में एनसीपी से हाल ही में कांग्रेस में आये तारीक अनवर के अलावा कोई ऐसा चेहरा नहीं है, जो जीत की गारंटी दे सके। हां, अगर कांग्रेस का स्वाभिमान जागा और उसने उत्तर प्रदेश की तरह रवैया अपनाया तो कामयाबी भले उस अंदाज में न मिले, लेकिन यह साफ हो जायेगा कि कांग्रेस कितने पानी में है।

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