आचार्य नरेन्द्र देव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की राजनीतिक नैतिकता

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आचार्य नरेन्द्र देव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की राजनीतिक नैतिकता का दिलचस्प उदाहरण है। हालांकि नयी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों को वह नहीं पचेगी।
आचार्य नरेन्द्र देव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की राजनीतिक नैतिकता का दिलचस्प उदाहरण है। हालांकि नयी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों को वह नहीं पचेगी।
आचार्य नरेन्द्र देव जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की राजनीतिक नैतिकता का दिलचस्प उदाहरण है। हालांकि नयी पीढ़ी के राजनीतिज्ञों को वह नहीं पचेगी। लेकिन नई पीढ़ी के बीच के आदर्शवादियों को वह ‘नैतिक कथा’ सुनाना जरूरी है।
  • सुरेंद्र किशोर

आचार्य नरेंद्र देव की नैतिकता राजनीतिज्ञों को बड़ी सीख देती है, पर आज के समय में मानेगा कौन. एक समय ऐसा भी था जब कुछ नेताओं ने सिद्धांत, नैतिकता और पार्टी के लिए विधानसभा की सदस्यता की परवाह नहीं की।  कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के 13 सदस्य सन् 1946 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गये थे। उनमें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापकों में एक आचार्य नरेंद्र देव भी थे।

आजादी के बाद कांग्रेस ने ‘कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी’ से कहा कि आप या तो सोशलिस्ट पार्टी  छोड़ दें या कांग्रेस। तनिक देर किए बिना साथी सहित आचार्य नरेंद्र देव ने कांग्रेस छोड़ दी। आचार्य जी और उनके 12 साथियों ने नैतिकता के आधार पर विधानसभा की सदस्यता भी छोड़ दी। जबकि, ऐसा करने की कोई संवैधानिक मजबूरी नहीं थी। वे सन् 1946 में कांग्रेस के टिकट पर चुने गये थे।

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इन लोगों ने उप चुनाव लड़ा। एक को छोड़ कर सभी हार गये। उससे पहले आचार्य जी से कुछ महत्वपूर्ण नेताओं ने कहा था कि कांग्रेस की अब भी हवा है। उप चुनाव नहीं जीतिएगा।

इस्तीफा मत दीजिए। आचार्य जी कहां मानने वाले थे ! उप चुनाव में कांग्रेस की ओर से यह प्रचार किया गया कि आचार्य जी नास्तिक हैं। इन्हें वोट मत दीजिए। आचार्य जी ने इस प्रचार का खंडन तक नहीं किया। क्योंकि वे सच में नास्तिक थे।

उनके कांग्रेसी  प्रतिद्वंद्वी बाबा राघव दास ने आचार्य जी को हरा दिया। जान-बूझकर कांग्रेस ने एक ‘बाबा’ को खड़ा किया था, ताकि तब की धर्मभीरू मतदाताओं को आचार्य जी के खिलाफ किया जा सके। आचार्य नरेन्द्र देव जी वही हस्ती थे, जिन्होंने जवाहरलाल नेहरू के कहने पर इंदिरा गांधी के दो बेटों का नामकरण किया था- राजीव और संजय। आचार्य जी ने ही नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ का संपादन किया था।

एक वे लोग थे, जिन्होंने हमें आजादी दिलाई और राजनीति में नैतिक होने की सीख दी।दूसरी ओर, आज के अधिकतर नेता हैं, जिनके बारे में कहना कम और समझना अधिक की उक्ति ज्यादा सटीक बैठती है ! यदि आप आचार्य जी की कसौटी पर कसेंगे तो पाएंगे कि शिव सेना के बागी विधायकों को पहले सदन की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए था।

वैसे भी बाल ठाकरे की राजनीति की मूल स्थापना को गद्दी के लिए त्याग देने वाले ठाकरे परिवार का चुनावी भविष्य अब अनिश्चित हो गया लगता है। पर, मैं जानता हूं कि वे इस्तीफा नहीं देंगे। क्योंकि आज ‘आचार्य युग’ नहीं बल्कि ‘भजन लाल युग’ है।

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