प्रफुल्ला मिंज की कविताएं…..

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आज जिस कवि को हम आपके समक्ष लेकर आए हैं, उसकी कविताओं का रंग चाय के रंग में घुला हुआ है। उत्तर बंगाल के चाय बगानों से उठती एक ऐसी ही आवाज है- प्रफुल्ला मिंज की। प्रफुल्ला दार्जिलिंग के गयागंगा चाय बागान की रहने वाली हैं और वर्तमान में कार्सियांग के संत जोसेफ बालिका उच्च विद्यालय में बतौर सहायक शिक्षक कार्यरत हैं। प्रफुल्ला की कविताओं में चाय बागान में काम करने वाले कामगारों से लेकर वहाँ की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की मुखर अभिव्यक्ति हुई है। इनकी कवितायें चाय बगान की वर्तमान त्रासदियों, उसकी चिंताओं को उभारती हैं। ऐसा पहली बार हो रहा है कि उत्तर बंगाल के इस क्षेत्र से हिन्दी कविता के रचनात्मक पटल पर प्रतिरोध की आवाज सुनाई दे रही है। चलिये रूबरू होते हैं      प्रफुल्ला मिंज की कविताओं से।  

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1. टपकते छत

हर साल सबको रहता है इंतज़ार!
बारिश के मौसम का

पर मुझे नहीं,
जब चारों ओर हरियाली होती है

मेरे घर होता है

बरसात के कीचड़ का पानी |

जब सभी बारिश की बूंदों का
आनंद ले रहे होते हैं,

गहरी नींद में मैं!

टप – टप – टप चूते छत से
बचने के लिए

कमरे के एक कोने से दूसरे कोने पर

जानवरों की तरह
सिकुड़ – ठिठुर कर रात बिताती हूँ|

बहुत मुश्किल से इस झोपड़ी को
घर बनाया है।

अपना पेट काट कर
एक-एक सामान जुटाया है।
सामान भी क्या हैं?
एक गुदड़ी, एक बक्सा, एक चटाई
कुछ चार-पांच बर्त्तन और
वही फटे-पुराने कपड़े|

जिस बरसात की आमद का लय
सभी पर्व की तरह मनाते हैं

मैं इससे बचने की तैयारी करती हूँ।
मुर्गियों, बकरियों, सूअरों के
बाड़े की मरम्मत करती हूँ|

मेरे आंसू बारिश के बूंदों की
सहचरी होती है,

इन दिनों ईश्वर से
बस यही अर्ज रहती कि

किसी तरह
हवाएं उड़ा ले जाए

काले बादल के घेरे को
ताकि अपनी थकान मिटाने

चैन की नींद सो पाऊं
सूखी पोटली के तकिये पर|

2. बंधुआ मजदूर

एक कहानी चाय मजदूर की जुबानी
पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही घर में
खप गयी हैं कई पीढ़ियाँ!
एक सौ पैंसठ सालों बाद भी
कोई खास परिवर्तन नहीं आया
हमारे जीवन में |
घिसे चप्पल, फटे झोले,
सूखी रोटी, पुराने छाते,
प्लास्टिक-तिरपल-रस्सी बांधे
बीत रही हमारी जिंदगी|
अपने आहार के लिए
चाय-फूल, मछली-केकड़े,
कच्चू के पत्ते, फर्न- खुखड़ी की
खोज में  जंगल जाना|
किसी बड़ी बिमारी को अपने
पास फटकने नहीं देना,
क्योंकि जानता हूँ,
अस्पताल के पैसे भरने के लिए
नहीं है कोई रकम मेरे खाते में।
अपनी तकदीर पर रोने,
और भाग्य बदलने की आस लिए
कभी-कभी लॉटरी का टिकट काटता हूँ।
अंग्रेज़ भले ले आए थे हमें चाय के बागानों में,
लेकिन हम बंधे हैं,
अपने ही लोगों के हाथों में।
हमारे कुटुंब भी हमारी सुध नहीं लेते,
जो रहते हैं दूर कहीं व्यस्त,
छत्तीसगढ़ – झारखण्ड में, और
यहाँ संम्पति के नाम पर यह झोपड़ी है!
जो मुझे अपने बाबा से मिली
और उन्हें उनके बाबा से।

3. लोग कहते हैं

कुछ लोग कहते हैं-
ये कैसी बर्बर जाति है जो
जहाँ-तहाँ कहीं भी रुके हुए
छी!
कुएं का पानी पीती है|

मैं कहती हूँ- हम ऐसे ही हैं!
जमीन पर यहाँ-वहाँ सोने वाले
बासी,  अधपके चावल खाने वाले
पसीने से हरदम लथपथ रहने वाले
लेकिन!
किसी का हक ना छीनने वाले|

हम जैसे भी हैं, खुश हैं
अपनी जीवन-शैली से
हमेशा प्रकृति की सेवा करते
फिर भी न जाने क्यों
लोग कहते हैं!
असभ्य समाज के नमूने |

सामान्य-सा जीवन जीकर
घास-फूस की सब्जियां खाकर
मेहनत से रोजी-रोटी कमाकर
पर, अपना स्वाभिमान बचाकर
लड़ते हैं!
हर रोज एक सभ्य समाज से|

लोग कहते हैं- अजीब है इनका ढंग
आपत्ति हमारे रंग,  पहनावे,

भाषा और संस्कृति से भी है
जबकि सदियाँ बिता दी हमारे पूर्वजों ने
जंगलों, पहाड़ों, और पठारों में

फिर भी संदेह है हमारे होने में
फिर कौन हैं हम इस धरती के?

 

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