एमलिन बोदरा की सादरी भाषा में लिखी कविताएं……

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उत्तर बंगाल के चाय बागानों में नयी रचनात्मक पौध खड़ी हो रही है। इसमें एमलिन बोदरा एक खास नाम है। एमलिन कविताएं लिखती हैं। इनकी कविताओं में चाय बागान का जीवन एवं उसकी त्रासद परिस्थितियों की अभिव्यक्ति हुई है। एमलिन सादरी भाषा में कविताएं लिखती हैं। चाय बागान से निकलने वाली यह नयी पीढ़ी है, जो अपने समय और समाज को लेकर प्रश्न खड़े कर रही है। वह यथास्थिति से बाहर निकालने के लिए प्रयास कर रही हैं। इस प्रयास में वह अपने वर्तमान को लेकर सशंकित है, जिसकी अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में हम देख सकते हैं। तो आइये पढ़ते हैं एमलिन बोदरा की कविताएं।

बोनस

आलक रे आलक कुँवर -कातिक केर महीना
आवाथे बोनस पावेक केर बेला
खिलाथे शनियारो,जतरु, करमी केर चेहरा
केऊ किनबैं मोबाईल,साड़ी,
कुर्ता और पावडर
केऊ कराबैं घर केर मराम्मत
किनबै नया टीना और खूंटा
केऊ करबै एडमिशन स्कूल-कॉलेज केर
इंतिज़ार कराथैं छुवा-पुता
मांस-मछली और लज़ीज भोजन केर भी
पालै बोनस 18%
नाम से 20%केर
आवाथैं आयो बाँटते बोनस रास्ता-रास्ता
ट्रेड यूनियन,दुर्गा पूजा,काली पूजा,
फलना-चिलना पार्टी के देते चन्दा
बोनस केर बण्डल होलक पतला
आयो केर हालात भी होलक पतला
चुवाथे लोर पानी सोचते सोचते
की पिंधाई नया लुगा बेटा बेटी के
की रखी पैसा स्कूल एडमिशन लागिन,
कैसन बदली घर केर टोका टीना
कैसन घुराबैं जतरा छुवा-पुता के
बड़की मईया भी होवाथे रूसिया
कंदाथे सिसइक दुरा कोना
आयो कहेल ना कांद बेटी
आगे साल किन देबू नया लुगा और मोबाईल
बेटी कहेल,आयो तोर आगे साल
नी होई कहियो खतम।।

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बोनस (हिंदी अनुवाद)

आया रे आया कुँवर-कातिक का महीना
आया बोनस पाने का बेला
खिल उठा शनियारो,जतरु,करमी का चेहरा
कोई लेगा मोबाईल,साड़ी,कुर्ता और पाउडर
कोई करेगा घर की मराम्मत
खरीदेगा नया टीना और खूंटा
कोई करेगा एडमिशन स्कूल-कॉलेज की
बच्चे भी कर रहे इंतिज़ार
मांस-मछली और लज़ीज भोजन की भी
मिला बोनस 18%
नाम पर 20%की
ट्रेड यूनियन,दुर्गा पूजा,काली पूजा
और फलाँ-फलाँ पार्टी को देते चन्दा
बोनस का बण्डल हुआ पतला
माँ की भी हालात हो रही पतली
भींग उठी आँखे सोचते सोचते
की पहनायेगी नए कपड़े बच्चों को
की रखेगी पैसे स्कूल एडमिशन के ख़ातिर
कैसे बदलेगी घर का फटा टीना
बेटी सिसक रही कोने में बैठे
माँ कहती,”मत रो बेटी
अगले साल जरूर खरीद दूंगी
नए कपड़े और मोबाइल भी”
बेटी कहती,”माँ तुम्हारा अगला सा
न होगा कभी खत्म”।।

ए रे संगी

ए रे संगी मोर
काले आहिस एतना बेबस
काले साहिस अत्याचार चुपचाप
काले कराथिस गुलामी
पीढ़ी दर पीढ़ी तोय
कताईय दिना रहबे
बाईन के बंधुआ मजदूर संगी
काया गतर होवाथे जर्जर
खून होवाथे पानी तोर
युग बिताथे खटते
नाखे एको बित्ता ज़मीन तोर नाम
कतई दिना रहबे छेछरा घरे संगी
काले साहिस चुपचाप सबकुछ
कहाँ हेराय गेलाक आवाज़ तोर
जे गुंजत रहलक चाइरो कोना
करम सरहुल केर गीत से
दिलकत रहलक अखड़ा भी
भुलाय गेले का खुद के तोय?
तोहे तो, हाँ तोहे तो
सजले धरती के
हरियार चायबगान से
ढोंगा लाखे धरती के कोईड़
बनाले स्वर्ग जइसन सुन्दर
आहे तोर भुजा में दम
सृष्टि नया बनाएक केर संगी
अब उईठ भी जा नींद से
आहे तोर हक़ भी संगी
पूरा करेक ले ,सपना अपन
कइर ले आवाज़ बुलंद अपन
पुछेक ले सवाल और
लेवेक ले हिसाब
कइस ले कमर अपन अब
एक और उलगुलान ले अब
कइर ले याइद तोय
बिरसा आबा केर
हेकिस तोय खून
ना रहु अनकर भरोसे अब
करेक पड़ी तोके ही अब
उलगुलान हक़ ले अपन
उलगुलान नया जिनगी ले अपन
उलगुलान पहचान ले अपन
करेक पड़ी तोके ही
उलगुलान ,उलगुलान ,उलगुलान।

ना हेरावा

ना हेरावा हाड़ी दारू में
हे मोर आयो आबा
देखा डूईब जाथे
समाज हमार इकरे में
मूंदय जाथे घर केर दुरा
टुवर होई जाथे छुआ पुता
बिधवा होई जाथे आयो हमर
बेचाय जाथे बेटी बहिन
बोहाय जाथे समाज हमर
आंधार होवाथे जीवन हमर
केकर जीवान बाइनहे
बेईच के ईके ?
छोइड देवा हाड़ी दारू
बनावा सुन्दर घर परिवार
आगे बढ़ावा बेटा के
पढ़ावा लिखावा बेटी के भी
ना हेरावा जिनगी के
आंधार चाय बुदा तारे
मेहनाती और ईमानदार ही
हेके हमर पहचान
ना भुलावा ईके कभी
भाषा संस्कृति केर पाठ
सिखावा छुवा पुता के
गौरवशाली इतिहास हमरे केर
बतावा समाज के
देखा पहचान हमर ,आहे खतरे में
साजिश होवाथे मेटैक हमरे के
साहेब बाबू नेता लुटाथैं
हमरे के सोभे
मिलीजुली करा विरोध इकर
अधिकार ले अपन
उठावा आवाज़ सोभे होइके एक
सुन्दर बनी भविष्य हमर भी एकदिन
अगर छोड़बा हाड़ी दारू ।।

 

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