कविता अखबारी दायित्व नहीं निभाती जिससे उसे सामयिकता की कसौटी पर परखा जाय

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कविता अखबारी दायित्व नहीं निभाती जिससे उसे सामयिकता की कसौटी पर परखा जाय

कोर्ट भला कविता के रुप में दी गई गवाही मानता है क्या ?

  • रविकेश मिश्रा

पटना: कविता की गवाही भला कोर्ट क्यों माने ? कविता तो कविता है। गद्य में लिखे गए ब्यौरे, दस्तावेज वगैरह माने जा सकते हैं (हालांकि कोर्ट को पता है कि सारे जाल दस्तावेजों में रचे जाते हैं।) बादशाहों के लिखवाए गए ब्यौरे, उनके ज़रखरीद दरबारियों के लिखे कसीदे विचार योग्य हैं, पर जंगलों में रहने वाले, मांग कर खानेवाले सत्तानिर्पेक्ष कवियों की बात पर भला क्या विचार करना! मज़ा यह है कि सनातन धर्म के समूचा का समूचा इतिहास, भूगोल, गणित,दर्शन, धर्म आध्यात्म विमर्श छंदोबद्ध काव्य है। गोया कुछ भी विचारणीय नहीं।

यूं दुनिया की हर भाषा के कवियों और काव्य समीक्षकों का दावा है कि कविता सामान्य राग-द्वेष से ऊपर भावातीत मनोदशा में रची जाती है। यह अगर धार्मिक संकीर्णताओं से प्रभावित, प्रेरित होती तो रहीम रस खानताज़ आदि कैसे डूब पाते ?

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बहरहाल, आज से एक सौ छत्तीस वर्ष पूर्व अयोध्या पर लिखी हुई एक कविता भारतेन्दु की मित्र मंडली के कवि स्व पंडित चन्द्रशेखरधर मिश्र की, जो बिहार बंधु में अप्रैल 1883 में प्रकाशित हुई थी। डॉ रामनिरंजन परिमलेन्दु के अनुसार ‘भारत के किसी भी धार्मिक नगर पर विरचित यह खड़ी बोली की सबसे पहली कविता है।’

अगर गोस्वामी तुलसीदास की कविताओं में किसी प्रसंग की तलाश की जा सकती है तो पं. चन्द्रशेखर र मिश्र की कविता क्यों न याद की जाय? वैसे भी कविता कोई अखबारी दायित्व तो निभाती नहीं कि उसे सामयिकता की कसौटी पर परखा जाय। हां, एक गृहस्थ कवि और एक गृहत्यागी कवि के विषयवस्तु में भिन्नता स्वभाव-सिद्ध है। कुछ अंश….

अयोध्या

सब पुरियों में अवध पुरी अति सुन्दर राजै।

बासी देवी देव सरिस जिसके छवि छाजै।

धवल धार सरयू की जिसने यों धारी है।

मुक्त्ति कामिनी के तनु जनु शुभशित सारी है।

धाम धाम सुरधाम बने सुंदर यों सोहैं।

सबही ज्यों सुरधाम आये भूतल मन मोहैं।

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यद्यपि है यह पुरी अजौं वह गौरव मंडित।

मानी धनी प्रतिष्ठित बहुविद्या के पंडित।

संस्कृत भाषा कवि की जो सुविहार थली है।

सुभग साधु-संतों से बहुधा राजत भी है।

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रहे जहाँ इक्ष्वाकु आदि नरपाल विराजित।

नृप दिलीप से रघु अज दशरथ सम शुचि राजित।

जिसकी महिमा समधि समधि गुन गन अति भाये।

जगदीश्वरहूं मनुज देह धर कर जहं आये।

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जहं दशरथ के भवन सुमित्रादिक जहं रानी।

जहं जनमें श्रीरामचन्द्र शुभ शोभा खानी।

वही राम के जन्म भवन नहिं परै दिखाई।

जिसै गिरा कर यवनों ने आपत्ति मचाई।

जहां राम को शुभ निवास अति शोभित सुंदर।

केवल काक शृगाल तहां वहिं कूदैं बंदर।

तोड़ि भवन यवनों ने मसजिद भी बनवाई।

देखि समुझि यह थान रोकि नहीं सकै रुलाई।

राजसदन के जहाँ रहे खंभे अति सुंदर।

तहाँ खड़े इमली के हैं अब पेंड़ भयंकर।

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आज वही है पुरी मुसलमानों ने जिसकी।

कौन दुर्दशा नहीं करी है भीषण तिसकी।

तोड़ि तोड़ि मंदिर पर अब मसजिद बनवाये।

गौरव के प्राचीन चिह्न सब खोदि बहाये।

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