विपक्ष की भूमिका बदल गयी है, अच्छे की भी आलोचना

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विपक्ष की भूमिका अब पहले जैसी नहीं। पूरी तरह बदल गयी है। सत्ता पक्ष के हर फैसले की आलोचना करना विपक्ष की भूमिका में शामिल हो गया है।
विपक्ष की भूमिका अब पहले जैसी नहीं। पूरी तरह बदल गयी है। सत्ता पक्ष के हर फैसले की आलोचना करना विपक्ष की भूमिका में शामिल हो गया है।
विपक्ष की भूमिका अब पहले जैसी नहीं। पूरी तरह बदल गयी है। सत्ता पक्ष के हर फैसले की आलोचना करना विपक्ष की भूमिका में शामिल हो गया है। फैसले राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े हों, तब भी विपक्ष को उसमें साजिश नजर आती है। देश के दुश्मन की भाषा और विपक्ष के स्वर में कोई फर्क नहीं। मौजूदा दौर के विपक्ष की भमिका पर चिंतनपरक टिप्पणी लिखी झारखंड के भवनाथपुर के विधायक भानुप्रताप शाही ने।
  • भानु प्रताप शाही

सत्तापक्ष के साथ-साथ विपक्ष की भी एक प्रकृति होती है। भारतीय राजनीति में 2014 के बाद विपक्ष की प्रकृति में लगातार गिरावट आती जा रही है। नीतियों के विरोध के बजाय व्यक्ति विरोध विपक्ष के लिए प्रमुख हो गया है। इसमें देशहित के खिलाफ मुखरता को भी लोकतंत्र की लड़ाई का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश में लोग लगे हुए हैं। इन्हीं कारणों से विपक्ष तथा विपक्षी नेता हाशिए पर खिसकते जा रहे हैं। अब तो हालत यह हो गई है कि विपक्ष ने अपनी पहचान खोनी शुरू कर दी है। सही पूछा जाए तो आज विपक्ष का सर्वमान्य तथा सक्षम नेता किसी को माना ही नहीं जा सकता।

हालांकि कांग्रेस राहुल गांधी को सर्वमान्य नेता बनाने की असफल कोशिश करती रही, लेकिन हर बार उसे निराशा ही मिली। यही कारण है कि पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने इतना तक कह दिया कि या तो परिवारवाद जिंदा रह सकता है या पार्टी, लेकिन आज भी कांग्रेस में पारिवारिक झंडा उठाने वालों की संख्या ज्यादा है। राहुल गांधी के नियमित नहीं रहने तथा अहम मौके पर सैर सपाटे पर निकल जाने से विपक्ष के दूसरे दल भी पचा नहीं पा रहे। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम के पहले छुट्टी पर चले जाना राजद (आरजेडी) को बुरा लगा था। यहां तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी उनकी योग्यता पर प्रश्नचिह्न लगाया था।

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कांग्रेस के नेतृत्व का संकट संपूर्ण विपक्ष के नेतृत्व का संकट बन गया है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के अलावा कोई राजनीतिक पार्टी बची भी नहीं है। निकट भविष्य में इस संकट का समाधान होता दिखाई नहीं पड़ रहा है, जो लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। मजबूत लोकतंत्र के लिए सत्तापक्ष के साथ-साथ मजबूत विपक्ष की भी आवश्यकता है।

कहने को तो भाजपा के खिलाफ तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी तथा कांग्रेस एक हैं, लेकिन बंगाल में इन तीनों दलों में अंदरूनी मतभेद भी कम नहीं हैं। वहीं केरल में कांग्रेस और वामपंथी अंदर से घोर विरोधी हैं। ओडिशा में बीजू जनता दल और आंध्र में वाईएसआर कांग्रेस भाजपा के बजाय कांग्रेस को अपना बड़ा दुश्मन मानती है। जाहिर है आपसी लड़ाई में विपक्ष की पहचान गुम होती जा रही है, जिसे हासिल करना निकट भविष्य में दिख नहीं रहा है।

केंद्र की वर्तमान सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ जरूरतमंदों को मिल रहा है। इससे भाजपा का जनाधार दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। गैर भाजपा शासित राज्य जन कल्याणकारी योजनाओं को लटकाने तथा उनके क्रियान्वयन में बाधा पहुंचाने का कार्य कर रहे हैं, जिसका नुकसान उन्हीं को उठाना पड़ेगा। वर्तमान सरकार 9 करोड़ किसानों को हर 4 महीने पर पीएम किसान योजना के तहत ₹2000 की आर्थिक सहायता मुहैया करा रही है, लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने इस योजना को यह कहते हुए लागू होने नहीं दिया कि केंद्र सरकार किसानों के खाते में सीधे पैसा न डाल कर राज्य सरकार को दे दे। राज्य सरकार उस पैसे को अपने अनुसार बांटेगी। केंद्र सरकार ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया। इस लड़ाई में नुकसान तो किसानों का ही हो रहा है। इसका नुकसान बंगाल के चुनाव में तुलमूल कांग्रेस को ही उठाना पड़ सकता है।

2020 में सीएए, कोरोना संकट, चीनी घुसपैठ जैसे कई बड़े मुद्दे विपक्ष को मिले, लेकिन विपक्ष उसको भुनाने में कामयाब नहीं रहा। कोरोना संकट तथा चीनी घुसपैठ के समय देश के साथ खड़े होने के बजाय विपक्ष दुष्प्रचार में लगा रहा। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमले कई विपक्षी दलों को भी रास नहीं आये।

सीएए के मामले में विपक्षी दलों में एकता देखने को तो जरूर मिली, लेकिन मुसलमानों के एक तबके और  वामपंथी संगठनों के अलावा उसे आम लोगों का जन समर्थन नहीं मिला। नए कृषि कानून पर हो रहे आंदोलन में भी सैकड़ों किसान संगठनों में 30-40 किसान संगठन तथा वामपंथी- कांग्रेसी समर्थकों के अलावा व्यापक जनसमर्थन दिख नहीं रहा। सर्जिकल स्ट्राइक तथा एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाने की कीमत चुकाने के बाद भी कांग्रेस नहीं चेती। देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दे पर कांग्रेस का अकेले पड़ जाना कांग्रेस नेतृत्व की अपरिपक्वता को साफ दर्शाता है। नए साल में यह उम्मीद करना चाहिए कि विपक्ष अपनी पिछली गलतियों से सबक लेकर अपनी प्रकृति में आई इस गिरावट को दूर करेगा।

भारतीय राजनीति एक विचित्र दौर से गुजर रही है। सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच सार्थक संवाद की गुंजाइश भी नहीं बची है। सार्थक संवाद के लिए यह जरूरी होता है कि संवाद तर्क तथा तथ्य आधारित हो। बिना तर्क तथा तथ्य के संवाद का कोई नतीजा निकल ही नहीं सकता। यही वजह है कि किसानों के साथ बातचीत का कोई नतीजा अभी तक नहीं निकल पाया है। केंद्र सरकार उन सभी कथित कमियों पर विचार करने के लिए तथा आवश्यक संशोधन करने के लिए तैयार है। जैसे ही सरकार के द्वारा किसान कानून के विभिन्न हिस्सों पर चर्चा की पेशकश की गई, वैसे ही किसान नेताओं ने यह जिद पकड़ ली कि इस कानून की वापसी से कम उन्हें मंजूर नहीं। अब तो कोरोना वैक्सीन को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। तरीका वही कि जिनको विषय की जानकारी नहीं है, वे आज विशेषज्ञ बन गए हैं।

हिंदुस्तान के इतिहास में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सत्ता पक्ष आज के पहले इतना मजबूत नहीं हुआ था। कांग्रेस का लंबे समय तक एकछत्र राज था। केरल में पहली बार वामपंथी सरकार बनी थी, वह भी बहुमत से, जिसे बर्खास्त कर दिया गया था। संविधान की धारा 356 का दुरुपयोग कई बार कांग्रेस के द्वारा किया गया, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। कांग्रेस ने अपने सत्ता काल के दौरान लगभग तीन दशक तक विपक्ष को प्रतिपक्ष का नेता पद भी नहीं दिया। 1977 में पहली बार लोकसभा में विपक्ष का नेता मिला। वह भी पहली गैर कांग्रेसी सरकार में। हालांकि 2014 में कांग्रेस के पास प्रतिपक्ष पद के लिए पर्याप्त संख्या भी नहीं थी, फिर भी भाजपा ने कांग्रेस से दरियादिली ही दिखाई।

भाजपा के लोकसभा में पूर्ण बहुमत आने के बाद से ही राजनीति ही नहीं, राष्ट्र नीति के सारे नियम भी बदल गए। आजादी के बाद से सत्ता पक्ष तथा विपक्ष में एक अघोषित समझौता था कि राष्ट्रीय सुरक्षा तथा विदेश नीति पर देश के सत्ता पक्ष तथा विपक्ष एक स्वर में बोलेंगे। ऐसा नहीं था कि उस समय का विपक्ष इन मुद्दों पर सत्ता पक्ष की आलोचना नहीं करता था। परंतु उन्हें लक्ष्मण रेखा का एहसास था। लक्ष्मण  रेखा यह थी कि विपक्ष ऐसी कोई बात नहीं बोलेगा, जिससे देश विरोधी ताकतें इसका फायदा उठा सकें। लेकिन अब देश के दुश्मनों तथा कुछ विपक्षी दलों की भाषा लगभग उसी प्रकार की हो गई है। सबसे ज्यादा अफसोस की बात यह है कि देश की सबसे पुरानी तथा सबसे लंबे अरसे तक शासन करने वाली कांग्रेस में सबसे ज्यादा बदलाव आया है। कांग्रेस में यह नई इबारत वही लिख रहे हैं, जिन्हें न राजनीति की समझ है और न राष्ट्रीय मुद्दों की गंभीरता का अहसास है।

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पूर्व राष्ट्रपति स्वर्गीय प्रणव मुखर्जी ने भी अपनी किताब में लिखा है कि उनके राष्ट्रपति भवन जाने के बाद कांग्रेस को सही राजनीतिक दिशा देने वाला नहीं रहा। फिलहाल कांग्रेस Twitter की पार्टी बनकर रह गई है।

विपक्ष में कांग्रेस के अलावा अखिलेश यादव सरीखे नेता भी हैं, जिनको वैक्सीन के वैज्ञानिकों की इस शोध में भाजपा का अक्स दिखाई पड़ रहा है। इसे मानसिक दिवालियापन ही कहा जाएगा। कांग्रेस के शशि थरूर, आनंद शर्मा और जयराम रमेश जैसे नेताओं के बयानों से तो यही लगता है कि ये लोग उन वैज्ञानिकों से भी ज्यादा जानकारी रखते हैं, जो वैज्ञानिक इसको बना रहे और पूरी दुनिया में वैक्सीन के लिए बेचैनी है।

शोधकर्ताओं को तथा डॉक्टरों को इस बात का भरोसा है कि वैक्सीन सुरक्षित है, लेकिन विपक्ष के नेताओं को नहीं। विपक्ष के नेताओं को इसका भी एहसास नहीं है कि इस उपलब्धि पर सवाल उठाकर सरकार या प्रधानमंत्री को नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों का वे अपमान कर रहे हैं। दरअसल इसकी आड़ में उनके निशाने पर एक ही व्यक्ति है- वह नरेंद्र मोदी। मोदी राज में कुछ अच्छा हो रहा हो तो विपक्ष की समस्या बढ़ जाती है। खराब हो तो खुशी की बात है। देश के लिए कोई बात अच्छी है या बुरी, इससे उनका कोई सरोकार नहीं है। सच कहें तो वर्तमान हिंदुस्तान का विपक्ष समाधान में समस्या ढूंढ रहा है। पता नहीं, इनकी इन हरकतों को देखकर कौन आम हिंदुस्तानी खुश होता होगा।

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