नीतीश कुमार की सरकार क्राइम, करप्शन कंट्रोल में फेल ही तो है !

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नीतीश कुमार की सरकार क्राइम और करप्शन कंट्रोल के मामले में फेल है ! यह विपक्ष का आरोप नहीं, बल्कि जनता की जुबान से निकले सवाल हैं।
नीतीश कुमार की सरकार क्राइम और करप्शन कंट्रोल के मामले में फेल है ! यह विपक्ष का आरोप नहीं, बल्कि जनता की जुबान से निकले सवाल हैं।

पटना। नीतीश कुमार की सरकार क्राइम और करप्शन कंट्रोल के मामले में फेल है ! यह विपक्ष का आरोप नहीं, बल्कि जनता की जुबान से निकले सवाल हैं। जनता की जुबान अमूमन बंद रहती है, पर जब खुलती है तो वह विपक्ष की ताकत बन जाती है। मधुबनी में हुए नरसंहार के आरोपी पकड़े गये हैं। इस पर नीतीश कुमार अपने सुशासन का दंभ भर सकते हैं, लेकिन नरसंहार को अंजाम देने वाले दल के सरगना प्रवीण झा के संरक्षण का आरोप जिस विधायक पर लग रहा है, उस पर वे क्या कहेंगे।

गोपालगंज के रहने वाले विमान सेवा कर्मी रूपेश सिंह मर्डर केस के सिलसिले में जिस तरह गिरफ्तारी हुई और उसके वास्तविक अपराधकर्मी होने पर संदेह जताया गया, उस पर सरकार की ओर से कोई साफ जवाब नहीं आया। रूपेश की हत्या की पटकथा पुलिस ने जैसी लिखी, उस पर खुद रूपेश के घर वालों को ही विश्वास नहीं है। रूपेश के परिजन नीतीश कुमार से मिल कर जांच पर संदेह जता चुके हैं।

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नवादा में जहरीली शराब से दर्जन भर से ज्यादा मौत की सूटनाएं आईं। एक और जिले में कुछ मौतें हुईं। गोपालगंज के खजूरबनी में जहरीली शराब से हुई मौतों के मामले में आरोपियों को सजा होने के कुछ ही दिन बाद शराब से मौतों की ताजा घटना हुई। पुलिस ने पूरी जांच के बाद चौकीदार को दोषी पाया और उसे सस्पेंड कर दिया गया। क्या आम आदमी को इसे समझने में भी मगजमारी करनी पड़ेगी कि अवैध शराब का धंधा रोकना सिर्फ चौकीदार की जिम्मेवारी है, जो अमूमन स्थानीय होता है और शराब माफिया के आगे उसकी औकात ही कितनी है। जब शराब माफिया सशस्त्र पुलिस बल पर हमला बोलने से घबराते नहीं हैं, वहां चौकीदार की क्या बिसात।

नीतीश की पार्टी या सरकार में उसकी सहयोगी पार्टी के लोग भले यह कहते फिरें कि अपराधी तो आरजेडी में भी थे। वे नाम भी गिना रहे हैं कि शहाबुद्दीन और राजवल्लभ यादव का। लेकिन ऐसे लोग इन नामों का तर्क देते वक्त यह भूल जाते हैं कि आरजेडी के शासन को जंगल राज कह कर ही नीतीश कुमार सत्ता में आये थे। उसके बाद उन्होंने अपनी सरकार का ध्येय वाक्य बना लिया कि क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से कोई समझौता नहीं करेंगे। लेकिन उनके दूसरे और तीसरे शासन काल के हालात बता रहे हैं कि वे समझौता करें या न करें, लेकिन क्राइम और करप्शन करने वालों को ब उनसे कोई भय नहीं लगता।

नीतीश कुमार के शासन में ही लाखों खर्च से बने बांध बह गये। पुल ध्वस्त हो गये। मालखाने से जब्त शराब गायब हो गयी और ऐसा करने वालों ने सरकार को रिपोर्ट दे दी कि यह सब चूहों की करामात है। नीतीश ने इस पर लभरोसा भी कर लिया। ऐसे आरोपों पर क्या और कितनी कार्रवाई हुई, किसी को अभी तक नहीं मालूम। पटना जलभराव का दिल दहला देने वाला दृश्य देख चुका है। बैठकें हुईं, जांच हुई, पर कितनों के खिलाफ कार्रवाई हुई, यह किसी को अभी तक नहीं मालूम।

नल-जल योजना नीतीश कुमार के सात निश्चयों का सपना है। 6 साल से इस पर काम चल रहा है। अभी तक यह योजना पूरी नहीं हुई। कहीं पाइप लगे तो नल नहीं, जलमीनार बने तो पानी भरते ही भहराने लगे। कितने लोग इस भ्रष्टाचार में पकड़े गये, इस पर बिंदुवार नीतीश कुमार को जवाब देना चाहिए, ताकि जनता जान सके कि सच में नीतीश करप्शन से कोई समझौता नहीं करते।

शिक्षा दम तोड़ रही है। इसके स्टैंडर्ट का नमूना पहले भी नीतीश शासन में देखने को मिल चुका है। नकल कर कैसे बच्चे पास होते हैं। कैसे टापर घोटाला होता है। इस पर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर ने अपने फेसबुक वाल पर सटीक टिप्पणी लिखी है। उन्होंने दैनिक हिन्दुस्तान में छपी एक खबर के हवाले से लिखा है- दैनिक हिन्दुस्तान की खबर है कि इस साल पटना जिले के 20 भवन विहीन माध्यमिक विद्यालयों के सभी परीक्षार्थी मैट्रिक पास कर गए। यह बात मुझे थोड़ी अविश्वसनीय लगती है। मैं ओल्ड माडल (1963) का परीक्षार्थी जो ठहरा! क्या परीक्षा में कदाचार के बिना ऐसा चमत्कार संभव हुआ? क्या पढ़ाई का स्तर आसमान छू रहा है?

उन्होंने आगे लिखा है- ऐसे ही एक स्कूल के कुल 155 छात्रों में से 75 छात्र प्रथम श्रेणी में इस साल मैट्रिक पास हुए। आज के रिजल्ट तो कुछ अधिक ही अविश्वसनीय लगते हैं। कोई मुझे समझाए कि हाल के वर्षों में ऐसा कैसे होने लगा है? हमारे जमाने में तो सबसे कम प्रथम श्रेणी और उससे अधिक द्वितीय श्रेणी में परीक्षार्थी पास होते थे। तृतीय श्रेणी की संख्या तो बहुत बड़ी हुआ करती थी। क्या अब यह असंभव नहीं लगता कि कुल परीक्षार्थियों में सर्वाधिक परीक्षार्थी प्रथम श्रेणी में पास कर जाएं! उससे कम द्वितीय श्रेणी में और सबसे कम तृतीय श्रेणी में? मेधा की जांच का कौन सा नया फार्मूला आया है? ऐसी स्थिति पर चिंता और चिंतन स्वाभाविक है। इस मामले में ऐसे चमत्कारिक रिजल्ट देने वाले संबंधित अफसरों व शिक्षकों से मैं अपना ज्ञानवर्धन करने को तैयार हूं। शायद वे ही सही हों। मैं गलत साबित हो जाऊं! मेरी चिंता यह है कि आज राज्य में शिक्षा का हाल कैसा है? क्या रिजल्ट उसके समानुपातिक आते हैं?

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